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अब गीले कचरे का भी उपचार, आईआईटी खड़गपुर ने निकाला रास्ता

अब तक सिर्फ सूखे कचरे पर ही ध्यान था। अब विकसित की गई नई प्रकिया में गीले और नम कचरे का भी रिसाइकल होगा। तकनीक के जरिए समूचे कचरे का इस्तेमाल पूरी तरह कर लिया जाता है।

By Vivek Mishra

On: Saturday 30 November 2019
 
Photo : IIT Khadagpur

आईआईटी खड़गपुर के शोधार्थियों ने हाइड्रो थर्मल कॉर्बेनाइजेशन (एचटीसी) नाम की ऐसी प्रक्रिया विकसित की है जिससे बिना किसी नुकसान शहरों से निकलने वाले जैविक कचरे के बड़े हिस्से को भी ऊर्जा हासिल करने का जरिया बनाया जा सकेगा। भारतीय परिदृश्य को ध्यान में रखकर यह प्रक्रिया विकसित की गई है। इस प्रक्रिया के तहत ठोस नगरीय कचरे में भी शामिल गीले और नम कचरे को बेहतर तरीके से प्रबंधित किया जा सकता है। ज्यादातर मिश्रित कचरे को बायोफ्यूल, मृदा संशोधन और अवशोषक के रूप में आसानी से परिवर्तित किया जा सकेगा।  

इस वक्त कचरे को जलाए जाने (इंसिनिरेशन) की जो प्रक्रिया विकसित देशों में अपनाई गई है वह मुख्य तौर पर सूखे कूड़े का ही उपचार करती है। साथ ही इस प्रक्रिया को संपन्न करने के लिए बेहद उच्च ताप की भी आवश्यता होती है। दरअसल भारत में पैदा होने वाले कचरे में बड़ा हिस्सा गीले कचरे का होता है। हमारे मौसम की परिस्थितियों के कारण पैदा होने वाले कचरे में जबरदस्त नमी होती है। नई तकनीकी से ताप क्षमता भी बढ़ जाएगी।

आईआईटी खड़गपुर के सिविल इंजीनियरिंग विभाग के बृजेश कुमार दूबे का कहना है कि मौजूदा कचरे के निपटारे की व्यवस्था में हम सिर्फ 20 से 30 फीसदी ऐसा कचरा रिसाइकल कर पाते हैं जो बायोफ्यूल के काम आए। नई विकसित तकनीकी के जरिए हम कचरे का 50 से 65 फीसदी तक संसाधन हासिल कर सकेंगे।

उन्होंने बताया कि तकनीक में बैच रिएक्टर का उपयोग किया जाता है जो कि शहरी कचरे के कार्बनिक अंश को हाइड्रो चार में परिवर्तित करती है। इस दौरान कचरे में नमी का उपयोग प्रक्रिया के लाभ के लिए किया जाता है। इससे सूखा ही नहीं गीला कचरा भी ज्यादा लाभकारी तरीके से आसानी से उपचारित किया जा सकता है। इस प्रक्रिया में किसी भी तरह का नम और गीला कचरा अलग नहीं किया जाता।

Photo : IIT Khadagpurशोधार्थी हरिभक्त शर्मा ने नई तकनीक के बारे में बताया कि एक ग्राम यार्ड कचरा और 4 ग्राम पानी प्रयोगशाला रिएक्टर में इस्तेमाल किया जा रहा है तो कचरे से एक ग्राम बायोफ्यूल का आउटपुट मिलता है जिसकी कैलोरिफिक वैल्यू 24.59 एमजे/ किलोग्राम होती है। वहीं, पानी भी दोबारा इस्तेमाल करने के लिए बचता है। एक अन्य शोधार्थी सागरिका पानीग्रही का कहना है कि एक बार कचरा इस प्रक्रिया में आता है तो उसका हर एक अंश इस्तेमाल हो जाता है। यदि कुछ बचता है तो उसे बायोगैस या मीथेन में तब्दील कर दिया जाता है।  भारत सरकार के जरिए वेस्ट से एनर्जी बनाने के अनिवार्य प्रावधान में यह प्रक्रिया काफी मददगार हो सकती है। वहीं, विकसित की गई इस नई प्रक्रिया से वायु प्रदूषण और मिट्टी के प्रदूषण को भी रोका जा सकता है। जुलाई 2017 के आंकड़ों के मुताबिक भारत में थर्मल आधारित कचरे से ऊर्जा बनाने वाले संयंत्रों में 5,300 टन कचरा रिसाइकल करने की क्षमता है। इससे प्रदितिन 53.5 मेगावाट ऊर्जा मिलती है।