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तीन करोड़ बच्चों-महिलाओं के लिए खतरा बना ई-कचरा: डब्ल्यूएचओ

दुनिया भर में 1.29 करोड़ महिलाएं कचरे से जुड़े अनौपचारिक क्षेत्र में काम करती हैं, जो उन्हें और उनके अजन्मे बच्चों को जहरीले इलेक्ट्रॉनिक कचरे के संपर्क में लाता है

By Lalit Maurya

On: Wednesday 16 June 2021
 

दुनिया में बढ़ते इलेक्ट्रॉनिक कचरे के चलते लाखों महिलाओं और बच्चों के स्वास्थ्य पर खतरा मंडरा रहा है। यह जानकारी विश्व स्वास्थ्य संगठन द्वारा जारी रिपोर्ट ‘चिल्ड्रन एंड डिजिटल डंपसाइट’ में सामने आई है। रिपोर्ट के अनुसार 1.29 करोड़ महिलाएं कचरे से जुड़े अनौपचारिक क्षेत्र में काम करती हैं, जो उन्हें संभावित रूप से जहरीले इलेक्ट्रॉनिक कचरे के संपर्क में लाता है। इससे न केवल उन महिलाओं के स्वास्थ्य पर साथ ही उनके अजन्में बच्चों को भी खतरे में डाल रहा है।

इसी तरह करीब 1.8 करोड़ बच्चे और किशोर, जिनमें से कुछ की उम्र तो पांच वर्ष से भी कम है वो अनौपचारिक रूप से औद्योगिक क्षेत्र में बाल मजदूरी कर रहे हैं। जिनमें वेस्ट प्रोसेसिंग भी शामिल है। अक्सर बच्चों के माता-पिता और उनका ध्यान रखने वाले उन्हें इलेक्ट्रॉनिक कचरे की रीसाइक्लिंग के काम में लगा देते हैं क्योंकि उनके छोटे-छोटे हाथ बड़ों की तुलना में कहीं ज्यादा कुशल होते हैं।

वहीं अन्य बच्चे जो इस इलेक्ट्रॉनिक कचरे के आसपास रहते हैं या स्कूल जाते हुए इनके संपर्क में आते हैं या फिर रीसाइक्लिंग सेंटर के आस-पास खेलते हैं उनके इस कचरे में मौजूद जहरीले केमिकल्स के संपर्क में आने का खतरा सबसे ज्यादा होता है। इस कचरे में मौजूद सीसा और पारा उन बच्चों की बौद्धिक क्षमता को नुकसान पहुंचा सकता है।

स्वास्थ्य को कैसे नुकसान पहुंचाता है ई-वेस्ट

ई-कचरे के संपर्क में आने वाले बच्चे छोटे आकार, अपने कम विकसित अंगों और विकास की तीव्र दर के कारण उनमें मौजूद जहरीले केमिकल्स के प्रति विशेष रूप से संवेदनशील होते हैं। वे अपने आकार की तुलना में अधिक प्रदूषकों को अवशोषित करते हैं। उनका शरीर विषाक्त पदार्थों को झेलने और शरीर से बाहर निकालने में वयस्कों की तुलना में कम सक्षम होता है।

इस कचरे की रीसाइक्लिंग में लगे लोगों के सोने और तांबे जैसी मूल्यवान धातुओं को पुनर्प्राप्त करने के लिए सीसा, पारा, निकल, ब्रोमिनेटेड फ्लेम रिटार्डेंट्स और पॉलीसाइक्लिक एरोमैटिक हाइड्रोकार्बन (पीएएच) सहित 1,000 से अधिक हानिकारक पदार्थों के संपर्क में आने का खतरा रहता है।

वहीं एक गर्भवती  महिला के इस कचरे के संपर्क में आने से न केवल उसके बल्कि उसके अजन्मे बच्चे के स्वास्थ्य और विकास पर भी खतरा होता है। इसके कारण बच्चे का समय से पहले जन्म, मृत्यु, और उसके विकास पर असर पड़ सकता है। साथ ही यह उसके मानसिक विकास, बौद्धिक क्षमता और बोलने की क्षमता को भी प्रभावित कर सकता है।

साथ ही यह बच्चों की सांस लेने की क्षमता और फेफड़ों के कार्यप्रणाली पर भी असर डालता है। यह बच्चों के डीएनए को नुकसान पहुंचा सकता है। इससे थायरॉयड सम्बन्धी विकार और बाद में उनमें कैंसर और हृदय रोग के खतरे को बढ़ा सकता है।

2019 में उत्पन्न हुआ था 5.36 मीट्रिक टन ई-वेस्ट

आज हम जिस इलेक्ट्रॉनिक कचरे की समस्या का सामना कर रहे हैं वो हमारी ही दें है जिस तरह से समाज में इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों के प्रति रूचि बढ़ रही है उससे   इसके कचरे की समस्या भी बढ़ती जा रही है। इसका ठीक से प्रबंधन न करना इस कचरे को और बढ़ा रहा है।

ग्लोबल ई-वेस्ट स्टैटिस्टिक्स पार्टनरशिप के अनुसार 2019 में वैश्विक स्तर पर करीब 5.36 मीट्रिक टन ई-कचरा उत्पन्न हुआ था, जोकि पिछले पांच वर्षों में करीब 21 फीसदी बढ़ गया है। यह इतना ई-कचरा है जिसके यदि कुल वजन का अनुमान लगाया जाए तो यह करीब 350 क्रूज जहाजों जितना भारी था और यदि इसे एक लाइन में रख दिया जाए तो इसकी लम्बाई करीब 125 किलोमीटर लम्बी होगी। अनुमान है कि आने वाले समय में जिस तरह कंप्यूटर, मोबाइल फोन और अन्य इलेक्ट्रॉनिक सामन के प्रति रूचि बढ़ रही है उससे इस कचरे में और वृद्धि हो जाएगी।

आंकड़ों के अनुसार इसमें से केवल 17.4 फीसदी कचरा ही औपचारिक रूप से प्रबंधन या पुनर्चक्रण सुविधाओं तक पहुंचा था। बाकी को अवैध रूप से कम या मध्यम आय वाले देशों में डंप कर दिया गया था जहां इसको अनौपचारिक तौर पर रीसायकल किया जाता है। पर्यावरण के दृष्टिकोण से भी ई-कचरे का उचित तौर पर संग्रहण और पुनर्चक्रण महत्वपूर्ण है। 2019 में जितना ई-कचरा औपचारिक रूप रीसायकल किया गया था उससे करीब 1.5 करोड़ टन कार्बनडाइऑक्साइड में कमी आई थी।

क्या है समाधान

ऐसे में दुनिया भर के लाखों बच्चों, किशोरों और गर्भवती महिलाओं की रक्षा के लिए यह जरुरी हो जाता है कि इस पर तत्काल प्रभावी कार्यवाही की जाए, इससे जुड़े नियमों को पूरी दुनिया में न केवल लागु किया जाना साथ ही उसपर कड़ाई से पालन भी जरुरी है।

इसके लिए इस कचरे को आयात करने वाले, निर्यातक और सरकारों को चाहिए कि इस ई-कचरे का पर्यावरण के दृष्टिकोण से सही तरीके से निपटान किया जाना चाहिए। साथ ही इससे जुड़े श्रमिकों और उनके परिवारों के स्वास्थ्य और सुरक्षा के लिए समुचित व्यवस्था भी जरुरी है। इसके लिए प्रभावकारी और बाध्यकारी कार्यवाही जरुरी है। वहीं इस कचरे के संपर्क में आने और उसके स्वास्थ्य पर पड़ने वाले असर की निगरानी करना भी जरुरी है।

डब्लूएचओ में पर्यावरण, जलवायु परिवर्तन और स्वास्थ्य विभाग की निदेशक डॉ मारिया नीरा ने बताया कि, "बच्चों और किशोरों को भी स्वस्थ वातावरण में बढ़ने और सीखने का अधिकार है, बिजली, इलेक्ट्रॉनिक कचरे और इसके जुड़े कई जहरीले घटकों के संपर्क में आने से निश्चित रूप से उस अधिकार पर असर पड़ता है।"  ऐसे में स्वास्थ्य क्षेत्र इसमें महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है। उनकी मदद से न केवल लोगों को जागरूक किया जा सकता है, साथ ही वो नीति निर्मातों को भी इससे जुड़े नियमों के लिए प्रभावित कर सकता हैं। वहीं वो आम जनता को भी इसके खतरों के प्रति जागरूक कर सकते हैं। 

यही नहीं इलेक्ट्रॉनिक सामग्री के निर्माण में गुणवत्ता को भी ध्यान में रखना जरुरी है जिससे वो उपकरण लम्बे समय तक काम करते रहें। इसके साथ ही समाज में इसके प्रति जागरूकता भी जरुरी है। इस मामले में आम लोगों की भी जिम्मेवारी है, इलेक्ट्रॉनिक सामान जरुरत को ध्यान में रखकर ही खरीदने चाहिए उनकी अनावश्यक खरीदारी से बचना चाहिए।