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मेरी जुबानी : कचरे की शर्म ने कराई वतन वापसी

हमने “शून्य कचरा शहर” का लक्ष्य रखा था जो साथियों की मदद से पूरा हुआ

On: Wednesday 04 November 2020
 

आप कितनी भी अच्छी अंग्रेजी बोल लें लेकिन लंदन में झंडा नहीं गाड़ सकते... भारतवंशियों के लिए बनी यह कहावत मुझ पर ही लागू होनी थी। एक तथ्य आंखों के सामने आते ही मेरी आंखें शर्म से झुक गईं। मेरी जन्मभूमि तिनसुकिया (असम) देश के सबसे गंदे शहरों (स्वच्छता सर्वेक्षण-2017) में शुमार थी। यह जानने के बाद मेरे अंदर बहुत ज्यादा बेचैनी होने लगी। उन्नीस साल हो गए थे मुझे अपना वतन छोड़ स्विट्जरलैंड में बसे हुए। इन दो दशकों में पहली बार मैंने अंत:मन से पूछा कि अपने गांव-देश-जिले के लिए क्या किया? अब तक जो भी काम किया वह अपनों के लिए किया। इसके बाद मैंने ठान लिया कि अपने जिले को साफ-सुथरा बनाने के लिए जो भी संभव होगा, वह करूंगा।

तिनसुकिया के लिए कुछ करने की ठान मैं स्विट्जरलैंड की 19 साल पुरानी नौकरी छोड़ तीन साल पहले भारत लौट आया। मेरा एक ही लक्ष्य था जिले को स्वच्छ बनाना। मैंने तिनसुकिया नगरपालिका के साथ काम शुरू किया। मुझे जल्दी ही समझ आ गया कि इसके लिए बाकायदा एक संगठन चाहिए होगा और साथ ही मेरी तरह सोच रखने वाले युवा साथी। इसके बाद मैंने “केयर नॉर्थ ईस्ट फाउंडेशन” नाम से एक गैर सरकारी संगठन बनाया। इसी संगठन के तहत हमने काम करना शुरू किया। कचरे को मैं अपने परिवेश के एक दुश्मन के तौर पर देखता हूं।

अपने जिले में सफाई को लेकर मेरा पहला प्रयोग सफल साबित हुआ। हमने “शून्य कचरा शहर” का लक्ष्य रखा था जो साथियों की मदद से पूरा हुआ। इसके लिए हमने अपने आसपास स्वयं सहायता समूह में काम करने वाली महिला साथियों व युवाओं को जोड़ा। देखते-देखते हमारे काम की चर्चा होने लगी व लोगों का समर्थन मिलने लगा। सबसे पहले हमने प्लास्टिक बैंक स्थापित किया और पानी की बोतलों, प्लास्टिक पैकेजिंग को इकट्ठा करने का लक्ष्य रखा। यह विचार इतना लोकप्रिय हुआ कि अब राज्य के 12 जिलों में वहां के स्थानीय निकाय द्वारा चलाया जा रहा है। यही नहीं, राज्य के पड़ोसी राज्यों ने भी इस अभियान को शुरू किया है। इसके बाद हमने जिले में घर-घर जाकर जैविक कचरा इकट्ठा करने की मुहिम चलाई। कचरे को अलग-अलग कर उससे खाद बनाने का काम शुरू किया। हमने 16 लाख पानी की बोतलों को इकट्ठा कर इसे तिनग्राई नदी का कचरा बनने से रोका। मेहनत का नतीजा निकला कि अब हमारा जिला उत्तर-पूर्व के दस सबसे स्वच्छ शहरों में शुमार है। इस काम में तीन साल लगे। अब हमने दो और जिलों में भी काम शुरू किया है। मेरे इस काम से प्रभावित होकर राज्य सरकार ने मुझे असम स्वच्छता भारत अभियान का वरिष्ठ सलाहकार नियुक्ति किया, साथ ही राज्य सरकार ने घर-घर दी जा रही सेवाओं के लिए विभिन्न प्रतिष्ठानों से सेवा शुल्क लेने संबंधी एक दिशा-निर्देश भी जारी किया है।

हमारे अभियान से अब तक जिले के 86 युवाओं को रोजगार भी मिला। साथ ही उन्हें अपशिष्ट प्रबंधन सेवा में प्रशिक्षण भी दिया गया। इसके अलावा हमने लगभग 30 नगरपालिका कर्मचारियों को भी इस कार्य के लिए प्रशिक्षित किया। इसका नतीजा निकला कि जिले में कचरा इकट्ठा करने के लिए इस्तेमाल में लाए जा रहे 42 छोटे-बड़े ट्रकों को हटा दिया गया है। इन ट्रकों से होने वाले वायु प्रदूषण से जिलेवासियों को राहत मिली। हमारा समूह जिले के 35 प्रतिशत कचरे को अलग-अलग करने में सफल हो सका है। उम्मीद है कि यह आंकड़ा जल्दी ही सौ को छुएगा। मुझे गर्व है कि उत्तर-पूर्व में पहली बार स्वयं सहायता समूह की महिलाओं ने नगरपालिका के लिए सेवाएं दीं। हमारे काम का ही नतीजा है कि जिले के दो कॉलेज व तीन स्कूलों के छात्रों ने इस काम के लिए प्रशिक्षण लिया है।