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नए सिरे से शुरू हुआ हिमालयी ग्लेशियर का अध्ययन, बर्फ के नीचे जीवन की तलाश

डेनमार्क के विशेषज्ञों का मानना है कि ग्लेशियर की बर्फ के नीचे भी जीवन है। आर्कटिक में उन्होंने इस पर शोध भी किए हैं। अब वे हिमालयी ग्लेशियर के बारे में भी जानकारी जुटा रहे हैं

By Varsha Singh

On: Friday 18 October 2019
 
Photo: Wikipedia
Photo: Wikipedia Photo: Wikipedia

डेनमार्क के कोपेनहेगन विश्वविद्यालय और पौड़ी-गढ़वाल के एचएनबी विश्वविद्यालय के विशेषज्ञों की टीम हिमालयी ग्लेशियर के बीच बनी झीलों के पानी के नमूने लेने गई है। वैज्ञानिक कहते हैं कि हिमालयी ग्लेशियर के बारे में अब भी हम बहुत कम जानकारी रखते हैं। इस पर अभी बहुत अध्ययन और शोध की जरूरत है। डेनमार्क के विशेषज्ञों का मानना है कि ग्लेशियर की बर्फ के नीचे भी जीवन है। आर्कटिक में उन्होंने इस पर शोध भी किए हैं। अब वे हिमालयी ग्लेशियर के बारे में भी जानकारी जुटा रहे हैं। हिमालयी क्षेत्र के जलीय जैव-विविधता पर दोनों टीमें शोध-परीक्षण करेंगी।

पौड़ी में हेमवती नंदन बहुगुणा गढ़वाल विश्वविद्यालय में जंतु विज्ञान और बायो-टेक्नॉलजी विभाग में कार्यरत प्रोफेसर डॉ प्रकाश नौटियाल बताते हैं कि आर्कटिक में बर्फ के नीचे जीवन को लेकर अध्ययन किया जा रहा है। डेनमार्क के वैज्ञानिकों के मुताबिक आर्कटिक में बर्फ के नीचे जैव विविधता की मौजूदगी है, लेकिन हम हिमालय के बारे में ऐसी कोई जानकारी नहीं रखते हैं। यहां पर ग्लेशियर को लेकर बहुत कम शोध हुए हैं। हिमालयी ग्लेशियर में फ्रेश वाटर बायोलॉजी पर हमने अभी तक काम नहीं किया है।

22 अक्टूबर तक दोनों देशों के वैज्ञानिक हिमालयी ग्लेशियर पर बनी झीलों के नमूने लेंगे। जिसका बाद में परीक्षण और अध्ययन किया जाएगा। नौटियाल बताते हैं कि उच्च हिमालयी क्षेत्र में ग्लेशियर से जुड़ी झीलों पर अध्ययन किया जा रहा है। जिन्हें हम प्रो-ग्लेशियर झीले कहते हैं। वह बताते हैं कि ग्लेशियर के बीच अलग-अलग तरह की झीलें होती हैं। जब ग्लेशियर की बर्फ़ पिघलती है तो इन झीलों में पानी आता है। चाहे वो पानी सीमित समय के लिए आता हो या लंबी अवधि के लिए। पर्यावरण में जो भी बदलाव आ रहे हैं उनका कुछ न कुछ असर हमको इन प्रो-ग्लेशियर झीलों पर देखने को मिलता है। 

डेनमार्क के कोपेनहेगन विश्वविद्यालय और पौड़ी-गढ़वाल के एचएनबी विश्वविद्यालय के विशेषज्ञों की टीम। फोटो: वर्षा सिंह

अगर ग्लेशियर के पास मौजूद झील साल भर उसे जुड़ी रहती है तो झील के पानी में कुछ भी दिखाई नहीं देगा। एक फीट की गहराई तक भी हम कुछ नहीं देख सकेंगे। उसमें पारदर्शिता नहीं होगी। इसी से हमें झील के ग्लेशियर से जुड़ाव के बारे में पता चलता है। इसके उलट, जिस झील में ग्लेशियर से बहुत कम पानी आता है, वो लंबे समय तक ग्लेशियर से कट जाती है। इनका अध्ययन करना जरूरी होता है कि ये झील समय के साथ स्थिर है, बढ़ रही है, या झील में ग्लेशियर से आने वाला पानी कम हो गया।

केदारनाथ में तबाही लाने वाली चौराबाड़ी झील को लेकर डॉ नौटियाल कहते हैं कि अभी तक ये नहीं पता कि ये झील ग्लेशियर से जुड़ी है या नहीं। सीजन के दौरान ग्लेशियर पिघलने के साथ झील में पानी आता है जो सर्दियों में काफी कम हो जाता है लेकिन खत्म नहीं होता। चौराबाड़ी झील में ग्लेशियर के पिघलने से पानी आ रहा है या नहीं, इस पर अभी शोध की जरूरत है।

चमोली में सतोपंथ ताल सुप्रा ग्लेशियर झील है जो ग्लेशियर के उपर बनी है। सतोपंथ ग्लेशियर ही अलकनंदा नदी का उदगम है। सतोपंथ ताल में पानी कैसे बना रहता है। इस पर भी अध्ययन की जरूरत है। 

कोपनहेगन विश्वविद्यालय और एचएनबी विश्वविद्यालय के वैज्ञानिक अभी प्रो ग्लेशियर झील और उससे निकलने वाली कुछ जल-धाराओं पर अध्ययन कर रहे हैं। डॉ नौटियाल बताते हैं कि छोटे-छोटे ग्लेशियर से भी जल धाराएं निकलती हैं, हम उस पर भी अध्ययन करेंगे। अभी हिमालयी क्षेत्र में मौजूद झीलों के पानी के नमूने लिए जा रहे हैं। उनके ग्लेशियर से जुड़ाव के बारे में पता किया जा रहा है। इन झीलों में जैव-विविधता की मौजूदगी अध्ययन के बाद ही पता चलेगी।

देहरादून में वाडिया इंस्टीट्यूट ऑफ हिमालयन जियोलॉजी में ग्लेशियर पर अध्ययन करने वाले डॉ डीपी डोभाल भी हिमालयी ग्लेशियर में इस तरह के अध्ययन का स्वागत करते हैं। वह भी मानते हैं कि अभी हमें हिमालय के बारे में बहुत कम जानकारी है। डोभाल कहते हैं कि हमें ये नहीं पता कि उच्च हिमालयी क्षेत्र में बदलते जलवायु का हिम तेंदुए या हिरन पर किस तरह असर पड़ेगा। वे और ऊपर को चल जाएंगे या खत्म हो जाएंगे, इस सब पर अध्ययन की जरूरत है।

डोभाल के मुताबिक जलवायु परिवर्तन का असर उच्च हिमालयी क्षेत्र में भी दिख रहा है। ट्री-लाइन उपर की ओर खिसक रही है। जो पेड़ दस-बारह हज़ार फीट की ऊंचाई पर होते थे वे तेरह हज़ार फीट की ऊंचाई पर ऊपर खिसक रहे हैं और नीचे की तरफ खत्म हो रहे हैं। ये भविष्य में चुनौतीपूर्ण होगा। उम्मीद है डेनमार्क के वैज्ञानिकों के साथ गए अध्ययन दल के सदस्य हिमालय को जानने-समझने में हमारी मदद करेंगे।