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वैज्ञानिकों ने बनाया एआई बेस्ड नया सेंसर, किसानों के लिए साबित हो सकता है वरदान

वैज्ञानिकों को भरोसा है कि ब्रूनल एल्गोरिथम पर आधारित यह सेंसर किसानों की जलवायु परिवर्तन सम्बन्धी खतरे से निपटने में मदद कर सकता है

By Lalit Maurya

On: Wednesday 04 December 2019
 
वैज्ञानिकों द्वारा बनाए गए सेंसर से मि‌ट्टी की जांच करना हो जाएगा। फोटो: क्रिएटिव कॉमन्स
वैज्ञानिकों द्वारा बनाए गए सेंसर से मि‌ट्टी की जांच करना हो जाएगा। फोटो: क्रिएटिव कॉमन्स वैज्ञानिकों द्वारा बनाए गए सेंसर से मि‌ट्टी की जांच करना हो जाएगा। फोटो: क्रिएटिव कॉमन्स

भारत में हर साल किसानों की गाढ़ी कमाई, मिट्टी के विषय में सही जानकारी ने होने के कारण बर्बाद हो जाती है। सटीक जानकारी के आभाव में फसलों का ठीक से विकास नहीं हो पाता, जिसके चलते किसान अनावश्यक रूप से उसमें उर्वरक डालते रहते हैं और सिंचाई करते हैं। इसका असर उनकी फसलों पर पड़ता है। पर किसानों की इस समस्या को हल करने के लिए ब्रूनल यूनिवर्सिटी, लंदन ने आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआई) आधारित एक नया सेंसर बनाया है, जो मिट्टी की सटीकता से जानकारी दे सकता है। जिसकी मदद से किसानों की लागत में कमी आ सकती है और मुनाफा बढ़ सकता है।

मिट्टी और बदलती परिस्थितियों के बारे में डेटा एकत्र करके यह 'मैजिक बीन' नामक सेंसर फसलों के विकास में मददगार हो सकता है। इसके साथ ही यह संसाधनों की बर्बादी को कम और किसानों के समय और पैसे की बचत कर सकता है। गौरतलब है कि इस वर्ष भारत के कई राज्यों में सूखा पड़ा था। जबकि फ्रांस में पारा 49.5 डिग्री सेल्सियस के पार चला गया था । 1995 के बाद से अमेरिका में बसंत का मौसम कभी भी इतना नम नहीं था। वहीं ब्राजील में पाले की मार से कॉफी की फसल खतरे में पड़ गयी थी। जोकि स्पष्ट तौर पर यह दिखाता है कि जलवायु परिवर्तन के चलते दुनिया भर में खेती-किसानी पर खतरा बढ़ता जा रहा है।

वैज्ञानिकों को भरोसा है कि ब्रूनल एल्गोरिथम पर आधारित यह सेंसर किसानों की जलवायु परिवर्तन सम्बन्धी खतरे से निपटने में मदद कर सकता है। ब्रूनल यूनिवर्सिटी में इलेक्ट्रॉनिक इंजीनियर डॉ तटियाना कलगानोवा तातियाना कलगनोवा ने बताया कि, "हमारे पास वो जरिया है जिसकी मदद से डेटा के सही उपयोग करके फसलों को बेहतर बनाया जा सकता है।"

कैसे काम करता है यह सेंसर

मिट्टी के सम्बन्ध में जानकारी प्राप्त करने के लिए किसानों को इस सेंसर को मिटटी में दबाना होता है, वो एक या उससे ज्यादा सेंसर एक खेत में लगा सकते हैं। जिसकी सहायता से वो हर घंटे बदलती परिस्थितियों के सम्बन्ध में डेटा इकठ्ठा कर सकते हैं। चूंकि यह सेंसर जीएसएम (मोबाइल सिम), वाई-फाई, या इंटरनेट कनेक्शन के बिना भी डेटा इकठ्ठा और अपडेट कर सकता है, इसलिए इसे दूरदराज के क्षेत्रों में भी इस्तेमाल कर सकते हैं। यह बहुत ही कम ऊर्जा पर चलने वाले तकनीक इंटरनेट ऑफ थिंग्स (आईओटी) का उपयोग करके डेटा को सीधे इंटरनेट पर अपलोड कर सकता है।

इंटरनेट ऑफ थिंग्स की सहायता से सभी गैजेट्स और इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों को इंटरनेट के माध्यम से आपस में जोड़ दिया जाता है। जिसकी मदद से जोड़े गए सभी स्मार्ट डिवाइस एक दूसरे को डाटा भेज सकते हैं और एक दूसरे से डाटा प्राप्त कर सकते हैं। यह सेंसर भी हवा और मिटटी के तापमान एवं नमी के स्तर में होने वाले परिवर्तन सम्बन्धी आंकड़ों को एकत्र करके किसी वेबसाइट या ऐप को भेज देता है। जहां इसे हीट मैप्स और अन्य तरह से चित्रित कर दिया जाता है। जिसकी सहायता से किसान आसानी से यह पता लगा लेते हैं कि मिट्टी को कब और कहां किस चीज कि जरुरत है।

उदाहरण के लिए, नमी के आंकड़ों से पता चल जाता है कि किस जगह कितना पानी देने की जरुरत है। जिसका सीधा अर्थ हुआ कि इससे सिंचाई की लागत और पानी दोनों की बचत हो जाती है। हर खेत से इकठ्ठा किये गए आंकड़े, एक मुख्य सर्वर को भेज दिए जाते हैं, जहां इनका ब्रूनल एल्गोरिथम की सहायता से इसका विश्लेषण करके हर घंटे के अंतराल में मिट्टी के तापमान और नमी के स्तर को माप लिया जाता है।

इस अध्ययन के शोधकर्ता लोरेंजो कुकराची ने बताया कि "वर्तमान में किसान पूरी जमीन पर सामान रूप से पानी, पोषक तत्व और कीटनाशकों का प्रयोग कर रहे हैं। लेकिन सभी जगह की मिट्टी एक जैसी नहीं होती और वो समान रूप से व्यवहार भी नहीं करती हैं।" "इस तकनीक का उपयोग, मिट्टी का विश्लेषण करके, यह समझने के लिए किया जा सकता है कि मिटटी में यह भिन्नता क्यों होती है, और यह नमी को कैसे और कितने समय तक संजो कर रख सकती है। यह जानकारी पौधों के लिहाज से बहुत महत्वपूर्ण होती है। जोकि संसाधनों के उपयोग और लागत में कटौती करने में मदद कर सकती है।"