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मूल विज्ञान को अनाथ होने से बचाने की चुनौती!

तकनीक प्रदर्शनी के युग में मौलिक विज्ञान को बचाने की चुनौती भारत के सामने अधिक है, राजनीतिक नेतृत्व को इसे स्वीकारना चाहिए 

By Richard Mahapatra

On: Thursday 12 December 2019
 

रितिका बोहरा / सीएसई

पड़ोसी देश पर हवाई हमला कर सैन्य कार्रवाई के प्रदर्शन से लेकर चांद तक यात्रा में तकनीक की महत्वपूर्ण भूमिका रही है। यह तकनीक अंतत: राजनीतिक इच्छाशक्ति को भी प्रभावित करने लगी है। तकनीक का प्रदर्शन लोगों की भावनाओं को बल प्रदान करने का एक मजबूत राजनीतिक टूल बन गया है। इस कॉलम में पहले भी कहा गया है कि तकनीक का ऐसा प्रदर्शन मतदाताओं की अपेक्षा लोगों के दिमाग पर मजबूती की भावनाएं पैदा करता है। लोग इससे खुद को ताकतवर महसूस करने लगते हैं। यह दुनिया भर में देखा गया है कि ऐसा प्रदर्शन करके कौन मजबूती की भावनाओं को बल देता है।

राष्ट्रवाद और आत्म गौरव के एजेंडे पर फलने-फूलने वाला राजनीतिक नेतृत्व इस तरह का प्रदर्शन करता है, चाहे वे विकसित देशों से हों या विकासशील देशों से। विकासशील देशों के उदाहरण में भारत को शामिल किया जा सकता है। शीत युद्ध और सोवियत संघ के विघटन के बाद रूस एक बार फिर सैन्य क्षेत्र में नई तकनीक का परीक्षण कर न केवल विश्व का ध्यान खींच रहा है बल्कि अपनी सरकार के एजेंडे को भी साध रहा है। देर से ही सही, अब अमेरिका भी इसका जवाब दे रहा है। ऐसा प्रतीत होता है कि दोनों देशों में शीत युद्ध के समय जैसी प्रतिद्वंद्विता छिड़ गई है लेकिन इस बार संदर्भ भिन्न है। चीन ने पहले ही तकनीक के मामले में महारथ हासिल कर ली है और वह धीरे-धीरे अपनी इस पहचान को पूरी रणनीति के साथ दुनियाभर में विस्तार दे रहा है।

भारत 7 सितंबर को पूरी रात जागता रहा ताकि वह अपने लैंडर को चांद पर उतरता देखकर इस क्षण का गवाह बन सके। हालांकि यह सफल नहीं हुआ लेकिन इसके बावजूद यहां तक पहुंचने के लिए देश की तकनीकी कुशलता जश्न मनाता रहा। राजनीतिक नेतृत्व ने भारत के इस “नए” अवतार को यथासंभव भुनाया। हर छोटी-बड़ी वैज्ञानिक उपलब्धि पर सीना चौड़ा करने में कोई हर्ज नहीं है। लेकिन चिंताजनक पहलू यह है कि ऐसी उच्च श्रेणी की तकनीकी का राजनीतिक इस्तेमाल क्या उस विज्ञान और तकनीक पर असर नहीं डालेगा जो लोगों की प्रतिदिन की समस्याओं से जुड़ी हैं। उदाहरण के लिए शौचालयों की तकनीक को ही लीजिए। भारत ने खुले में शौच न करने का निर्णय लिया लेकिन विभिन्न एजेंसियों की रिपोर्ट्स बताती हैं कि भारत में शौचालय की सही तकनीक अब तक विकसित नहीं हो पाई है। यह आने वाले समय में बहुत बड़ी चुनौती होगी, खासकर तब, जब देश खुले में शौच से पूरी तरह मुक्त हो जाएगा। ऐसी स्थिति में ठोस और तरल कचरे का प्रबंधन कौन और कैसे होगा? अगर शौचालय की मूल तकनीक प्रभावी नहीं है अथवा तकनीकी मापदंडों पर खरी नहीं है तो अपशिष्ट के निपटान की चुनौती बनी रहेगी।

इसी तरह पानी के संकट से निपटने के लिए राजनीतिक पहल हो रही है। जब खेती में कम पानी के इस्तेमाल की बात होती है, तब इजराइल की तकनीक के बारे में हमें बताया जाता है। ऐसे उदाहरण बहुत कम मिलेंगे जहां राजनीतिज्ञ पानी बचाने की परंपरागत तकनीक पर गर्व महसूस कर इसे प्रचारित करें। यह अलग बात है कि राष्ट्रीय समूहों में पानी बचाने की प्राचीन कुशलता और समझदारी की कहानियां सुनाई जाती हैं। लेकिन वह प्राचीन समझ समकालीन समस्याओं को सुलझाने के लिए राष्ट्रीय एजेंडे में नहीं आ पाती।

स्वच्छता अभियान के बाद हर घर तक पानी पहुंचाना प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का अगला बड़ा एजेंडा है। अंतरिक्ष और सैन्य तकनीक के अलावा उन्होंने जल संकट की चुनौती पर भी बात की है। इससे स्पष्ट है कि राजनीतिक नेतृत्व ने भारत की बहुत-सी चुनौतियों को नहीं नकारा है। लेकिन चुनी हुई सरकार के सामने चुनावी स्वीकार्यता का डर भी है। यह खुशी की बात है कि राजनीतिक स्तर पर तकनीकी दक्षता को स्वीकार्यता मिली है लेकिन इसके साथ मूलभूत विज्ञान को अनाथ होने से बचाने की चुनौती भी है।