Sign up for our weekly newsletter

सरकार पर खत्म होते भरोसे की बानगी है कोरोनावायरस और 5जी का षड्यंत्र

 यूके, ऑस्ट्रेलिया और अमेरिका में एक्टिविस्ट यह मानते हैं कि 5जी ही कोरोना महामारी की असल वजह है

On: Saturday 11 April 2020
 
Photo: Pixabay
Photo: Pixabay Photo: Pixabay

टिम हिल, रोबिन केनिफोर्ड और स्टीफन मर्फी

जिस तरह कोरोनावायरस महामारी ने गति पकड़ी है उसी तरह इसके शुरू होने और फैलने का कारण बताने वाले तमाम किस्से भी शुरू हो गए हैं। इन कहानियों में एक सिद्धांत ऐसा भी है जिसने 5जी तकनीकी के हालिया आगमन को ही दोषी मान लिया है। 

5जी के खतरों के बारे में चेतावनी देने वाले समूहों की संख्या बढ़ रही है और कई देश इसके गवाह बन रहे हैं। यूके, ऑस्ट्रेलिया और अमेरिका में एक्टिविस्ट यह मानते हैं कि 5जी ही इस महामारी की असल वजह है और विषाणु के प्रसार पर लगाम लगाने के लिए 5जी नेटवर्क में खलल डालना बेहद जरूरी है। 

चेतावनी देने वाले इन समूहों के चरम छोर पर वो लोग हैं जो कोविड-19 को एक छल मानते हैं। उनका कहना है कि एक अधिक नुकसान वाली कहानी है, जिसमें 5 जी एक अहम हिस्सा है।

लोग षड्यंत्रकारी सिद्धांतों पर यकीन क्यों करते हैं और इनकी बढ़ती लोकप्रियता का राज क्या है? इन यकीन की जड़ों में मिलता है कि ऐसे लोगों का मौजूदा सरकारों और स्वास्थ्य  संगठनों के प्रति अविश्वास का भाव है। इसके अलावा, संकट के समय लोग खासतौर पर इन वैकल्पिक सिद्धांतों को तैयार करते हैं। 

षड्यंत्रकारी सिद्धांतवादी

साजिश का सिद्धांत रचने वाले कई लोग खुद अपनी पहचान सच की खोज करने वाले के तौर पर करते हैं। वे अक्सर किसी व्यापक जन आंदोलन का हिस्सा होते हैं, जिससे यह माना जाता है कि वे स्वतंत्र खयालों वाले हैं और उनमें सच को कहने व जानने के लिए पर्याप्त साहस है। वे साहसी गुप्तचरों की तरह काम करते हैं। वे शक्तिशाली समूहों का खुलासा करते हैं जो गोपनीयता में दुर्भावनापूर्ण नतीजों को हासिल करने के लिए संचालित हो रहे हैं।  

अधिकांश षड्यंत्र सिद्धांत शक्तिशाली समूहों को एक परछाई में काम करने वालों के तौर पर देखते हैं। मतलब जो किसी परदे के पीछे काम करने वाले होते हैं और जिन तक नहीं पहुंचा जा सकता है। हालांकि 5जी और कोरोनावायरस के संबंध वाला षड्यंत्र सिद्धांत इस दृष्टि से बिल्कुल अलहदा है। इस बुराई का स्रोत दिखाई देने वाला है और हर उस व्यक्ति की पहुंच में है जो इन विचारों पर यकीन रखता है।

किसी अंधेरे समूहों और रहस्मयी ताकतों के उलट 5जी कोरोनावायरस षड्यंत्र को सीधी चुनौती दी जा सकती है। 5जी नेटवर्क एक आधारभूत संरचना है जिन्हें आसानी से पहचाना और उन तक पहुंचा जा सकता है। ऐसे लोग जो यह यकीन रखते हैं कि वे सच जानते हैं, उनका फोन टावरों और एंटीने को ध्वस्त करना यह दर्शाता है कि वे परेशान करने वाली घटनाओं पर कुछ हद तक काबू पाने के लिए ऐसा कर रहे हैं।  

संकट के दौर में षड्यंत्र

लोग इस जटिल और अप्रत्याशित स्थितियों को सरल करके समझ बनाना चाहते हैं। इसका मतलब है कि लोग इस महामारी को लेकर मौजूद आधिकारिक और षड्यंत्र सिद्धांत को समझना चाहते हैं। आधिकारिक सच सरल है: कोविड-19 मानव में जानवरों से स्थानांतरित हुआ है, जैसा कि पहले के कोरोनावायरस प्रसार में हुआ है। यह मुख्य रूप से किसी संक्रमित व्यक्ति के छींकने और खांसने के दौरान निकलने वाले बूंद-कणों (ड्रॉपलेट्स) से फैलता है।  

5जी से जुड़े हुए षड्यंत्र सिद्धांतों की लोकप्रियता यह जाहिर करती हैं कि लोगों का वैज्ञानिक दावों, सच और घटना पर विशेषज्ञों की व्याख्याओं के प्रति काफी स्तर तक अविश्वास है। हालांकि 5जी विरोधी सिद्धांतों को आए कुछ समय हो गया है फिर भी वे रोज नए-नए समर्थक जुटा रही हैं। यह सरकार के प्रति विश्वास में कमी है, कई सरकारें इस संकट से जूझ रही हैं हालांकि उन्हें बहुत जल्दी और बहुत देर कदम उठाने के लिए सवालों का सामना भी करना पड़ रहा है।  

यह और चिंताजनक है कि अविश्वास के इस माहौल में दक्षिण-पंथ की लोकप्रियता और तीव्र होकर पनपती है। पूरी दुनिया में लोकप्रिय हस्तियों ने अपनी ध्रुवीकरण वाली वैश्विक दृष्टि को और उन्नत बना दिया है कि भ्रष्ट व संभ्रांत राजनीतिज्ञ, व्यावसायी और वैज्ञानिक आम लोगों के जागरुक समुदाय के खिलाफ हैं। डोनाल्ड ट्रंप, मैटो सैल्विनी, जैर बोल्सोनारो और निजेल फैरेज गार्नर अपने संघर्ष की छवि ऐसे तैयार कर रहे हैं कि वे एक अच्छे नेता हैं जो बुरी संस्थाओं के खिलाफ लड़ रहे हैं। 

इसी के साथ यह वैश्वविक दृष्टि प्रतिष्ठानों को भी कमतर आंक रही है और अविश्वास के साथ षड्यंत्र सिद्धांतों को वैध बना रही है। यह काफी चिंताजनक हैं। इस सबके चलते, सरकार के उच्चतम स्तरों पर वैज्ञानिक तथ्‍यों और षड्यंत्र सिद्धांतों के बीच फर्क मिटते जा रहे हैं। बीमारियों को नियंत्रित करने के उपायों में साक्ष्‍य-आधारित हस्‍तक्षेपों के ऊपर अप्रामाणिक समाधानों को वरीयता दी जा रही है। यही नहीं, जिन-जिन देशों में लोकलुभावन राजनीति चढ़ान पर है, वहां टीकाकरण का प्रतिरोध बढ़ता जा रहा है। नतीजतन, समस्‍या-समाधान के लिए बने नीतिगत-हस्‍तक्षेपों को ही समस्‍या के एक हिस्‍से के बतौर देखा जाने लगा है।

जानकारी की महामारी

ये सब चिंताएं इस समय और भी महत्‍वपूर्ण हो जाती हैं जिसमें लॉकडाउन के चलते लोगों का ज्‍यादातर समय सोशल मीडिया पर गुजर रहा है। कुछ हद तक, इंटरनेट के चलते, अब तक जनमत के हाशियों पर रहे लोग, अपने हमखयालों को खोजकर उनसे बातचीत करने में सक्षम हुए हैं। ऐसे में, पारंपरिक संस्‍थाओं में भरोसे की कमी के चलते ऑनलाइन समूहों में मित्रों के बीच वैकल्पिक व्‍याख्‍याएं अपनी जड़ें जमाने लगी हैं।

एक ओर जहां लोग, इस महामारी को समझने और अपने बदले जीवनों की सार्थकता बूझने में लगे हैं, ख्‍़यातनाम यू-ट्यूब 'सत्‍य-अन्वेषकों' की शोहरत बढ़ती जा रही है। फेसबुक न्यजूफीड में शासन अधिकृत स्वास्थ्य परामर्श भी मौजूद होते हैं। तमाम निजी समूहों के जरिए बोगस दावों और भ्रामक सूचनाओं से आधिकारिक ज्ञान और राजनीतिक प्रक्रियाओं का खंडन किया जा रहा है। 

विश्‍व स्‍वास्‍थ्‍य संगठन ने इसे 'इंफोडीमिक' यानी सूचनाओं की महामारी का नाम दिया है। सोशल मीडिया कंपनियों पर दुष्‍प्रचार के इस प्रवाह को रोकने का दबाव बन रहा है। इसके बावजूद सत्‍यशोधक समूह सोशल मीडिया यानी फेसबुक, ट्विटर और वॉट्सऍप्‍प के हस्‍तक्षेपों को ताकतवर संस्‍थाओं व अभिजात वर्ग द्वारा 'असल सच' छुपाने के षड्यंत्र के बतौर देखती हैं।

5जी के खंभों पर हमले जैसी घटनाएं, एक ऐसे बैरोमीटर की तरह काम करती हैं जिससे हमें नेतृत्व और विशेषज्ञों के प्रति लोगों के अविश्‍वास की थाह मिलती है। ऐसे में, सरकारों और मीडिया के लिए यह चुनौती होगी कि वे लोगों का विश्‍वास फिर से पाने के लिए पारदर्शी तरीके से खुलेपन की मिसाल पेश करें न कि वैकल्पिक सत्‍यों को लेकर उनकी भूख को और बढ़ाएं।