नई सोच: अब कार से निकलने वाले दूषित जल और कार्बन डाइऑक्साइड से उगेंगी फसलें

एक औसत कार हर वर्ष करीब 4.6 मीट्रिक टन कार्बन डाइऑक्साइड उत्सर्जित करती है। वहीं ईंधन के जलने से हर वर्ष करीब 21,000 लीटर पानी बनता है, जो बेकार चला जाता है

By Lalit Maurya

On: Friday 17 September 2021
 

क्या आपने कभी सोचा है कि किसी वाहन से निकलने वाले वेस्ट वाटर और कार्बन डाइऑक्साइड को एकत्र करके खाद्य उत्पादन के लिए भी इस्तेमाल किया जा सकता है। लेकिन यह मुमकिन है हाल ही में टेक्सास ए एंड एम शोधकर्ताओं ने एक नया रास्ता सुझाया है जिसकी मदद से कार से निकलने वाले वेस्ट वाटर और कार्बन डाइऑक्साइड को एकत्र करके कृषि के लिए इस्तेमाल किया जा सकता है। यदि ऐसा मुमकिन हो जाता है तो एक तरफ जहां प्रदूषण में कमी आएगी। साथ ही इन दो बेकार चीजों से बढ़ती आबादी की खाद्य समस्या को हल करने में भी मदद मिलेगी। 

बहुत छोटे से लगने वाले इस विचार का प्रभाव कितना व्यापक हो सकता है, इसका अंदाजा आप इस बात से लगा सकते हैं कि 2019 के आंकड़ों के अनुसार दुनिया भर में उपयोग में आने वाले कुल वाहनों की संख्या करीब 140 करोड़ है। एक औसत कार हर वर्ष करीब 4.6 मीट्रिक टन कार्बन डाइऑक्साइड उत्सर्जित करती है।  वहीं एक कार में ईंधन के जलने से हर वर्ष करीब 21,000 लीटर पानी बनता है, जो बेकार चला जाता है।  इसी तरह हर साल इन वाहनों से निकलने वाली ग्रीनहाउस गैसें पर्यावरण को दूषित कर रही हैं। 

शोधकर्ताओं ने बताया कि ऐसे में इस बेकार सीओ2 और पानी का खासकर शहरों में अच्छा उपयोग किया जा सकता है। हाल ही में अमेरिका में जिस तरह से शहरों में कृषि का विकास हो रहा है उसके लिए ग्रीनहाउस गैसों की मदद की जरुरत पड़ती है। पौधों को स्वस्थ और फसल को बेहतर करने के लिए वहां सामान्य वातावरण में सीओ2 की मात्रा को कृत्रिम रूप से तीन गुना तक बढ़ाया जाता है। ऐसे में इन शहरी क्षेत्रों में कृषि के लिए इस बेकार पानी और सीओ2 का बेहतर इस्तेमाल क्या जा सकता है।

शोध के अनुसार आमतौर पर औसतन एक किलोग्राम पैदावार के लिए करीब 2 किलोग्राम से ज्यादा कार्बन डाइऑक्साइड और करीब 22 लीटर पानी को खरीदने की जरुरत पड़ती है। हालांकि इसमें फसलों के तैयार होने के बाद खाद्य प्रसंस्करण में लगने वाले पानी और सीओ2 को शामिल नहीं किया गया है।  

कैसे काम करती है यह पूरी प्रणाली

इसके बारे में शोध से जुड़ी शोधकर्ता मारिया बारुफेट ने बताया कि नामुमकिन सा लगने वाला यह विचार पूरी तरह से संभव है। इससे पहले भी ट्रकों और समुद्री वाहनों में इसके उपयोग पर शोध प्रकाशित हो चुके हैं। हालांकि उनमें से कोई भी अभी पूरा नहीं हो सका है। हमने अपने इस शोध को एक कदम और आगे ले जाते हुए इन्हें कारों और यात्री वाहनों में इस्तेमाल करने की बात सोची है। 

शोधकर्ताओं ने इसका जो खाका तैयार किया है उसके अनुसार वाहनों के इंजन से निकलने वाली गर्मी एक आर्गेनिक रैंकिन साइकिल (ओआरसी) प्रणाली को शक्ति प्रदान कर सकती है।  यह ओआरसी एक छोटी बंद इकाई है, जिसमें टर्बाइन, हीट एक्सचेंजर्स, कंडेनसर और फीड पंप होता है।  यह पुराने जमाने के भाप इंजन की तरह ही काम करता है, बस इसका आकार काफी छोटा होता है, ऐसे में इसे बिजली पैदा करने के लिए बहुत कम गर्मी की जरुरत पड़ती है।

यह ओआरसी इस प्रणाली के अन्य घटकों को भी शक्ति प्रदान करेगा। जैसे कि हीट-एक्सचेंज सिस्टम, जोकि कार्बन डाइऑक्साइड गैस को ठंडा और संपीड़ित करके तरल में बदल सकता है, जिससे इसे आसानी से बहुत कम जगह में भी एकत्र किया जा सकता है। 

इस शोध के जो प्रारंभिक नतीजे सामने आए हैं वो उत्साहजनक हैं। इस प्रणाली से कार के इंजन की शक्ति में कोई कमी नहीं दर्ज की गई है, न ही इससे ईंधन की खपत में किसी तरह की वृद्धि देखी गई है। सैद्धांतिक रूप से, इस प्रणाली की मदद से एकत्र किए पानी और सीओ2 को वाहन मालिक उन केंद्रों से बदल सकता है जिन्हें इसके लिए निर्धारित किया है या फिर वो इनकों अपने खुद के फार्म में प्रयोग कर सकता है।  

हालांकि देखने में यह तकनीक भले ही काफी रोचक लगे पर अभी भी कुछ ऐसे अहम सवाल हैं जिनके उत्तर ढूंढने बाकी हैं, जैसे कि गैस और पानी को एकत्र करने वाले कंटेनर कितने बड़े होंगें। जब पानी को संपीड़ित नहीं किया जा सकता तब इसे कैसे एकत्र किया जाएगा? साथ ही इस एकत्र की हुई सीओ2 और पानी के वजन का कार के प्रदर्शन पर क्या प्रभाव पडेगा। हालांकि शोधकर्ताओं को भरोसा है कि वो इन समस्याओं के हल भी ढूंढ लेंगें।   

बारुफेट ने इस बारे में बताया कि वर्षों पहले हमने नहीं सोचा था कि हम कार में एयर कंडीशन फिट कर सकते हैं। लेकिन आज यह कारों में एक आम चीज है। यह भी हमारी अवधारणा से मिलती जुलती है। इस तकनीक के बारे में पूरी जानकारी जर्नल सर्कुलर इकोनॉमी एंड सस्टेनेबिलिटी में प्रकाशित हुई है।