Climate Change

वैज्ञानिकों ने बताए ग्लोबल वार्मिंग का लक्ष्य हासिल करने के तरीके, एक तिहाई उत्सर्जन हो सकता खत्म

एक अध्ययन में कहा गया है कि विकसित देश खाना बर्बाद करना छोड़ दें और विकासशील देश जंगलों की कटाई छोड़ दें तो 2050 तक तापमान में 1.5 डिग्री सेल्सियस की वृद्धि का लक्ष्य हासिल किया जा सकता है

 
By Lalit Maurya
Last Updated: Wednesday 23 October 2019
Illustration: Tariq
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यदि विकसित देशों में रहने वाला हर पांचवा इंसान शाकाहार को अपना ले, और वर्तमान में वे जितना भोजन बर्बाद कर रहे हैं, यदि उसका एक तिहाई कम भोजन बर्बाद करें, जबकि विकासशील देश अपने जंगलों को संरक्षित करने और बंजर धरती को पुनः बहाल करने में कामयाब हो जाते हैं तो 2050 तक दुनिया में कृषि क्षेत्र कार्बन डाइऑक्साइड उत्सर्जन करने की जगह उसको सोखना शुरू कर देगा। जिसकी मदद से जलवायु में आ रहे बदलावों से निपटा जा सकता है और 1.5 डिग्री सेल्सियस का लक्ष्य हासिल किया जा सकता है। 

अंतराष्ट्रीय जर्नल नेचर क्लाइमेट चेंज में छपे अध्ययन के अनुसार कृषि भूमि और जंगलों का बेहतर प्रबंधन जलवायु के दृष्टिकोण से बड़ा महत्वपूर्ण है। इसकी मदद से वैश्विक उत्सर्जन में एक तिहाई तक की कमी की जा सकती है, जोकि जलवायु परिवर्तन से निपटने में एक अहम् भूमिका निभा सकता है।

शोधकर्ताओं के अनुसार ब्राजील, भारत, चीन और इंडोनेशिया जैसे कई देशों में ग्रीनहाउस गैसों के उत्सर्जन में कमी करने की अपार संभावनाएं हैं, अगर उनकी सरकारें जंगलों की अंधाधुंध कटाई को रोक दे और पर्यावरण के लिए हानिकारक कृषि पद्धतियों में बदलाव कर दे तो इस उत्सर्जन को काफी हद तक सीमित किया जा सकता है। साथ ही, यदि 2030 तक विकसित देश अपने आहार में परिवर्तन कर दे और हर पांच में से केवल एक व्यक्ति पौधों से प्राप्त होने वाले आहार का भोजन करे तो इसकी मदद से, जलवायु परिवर्तन के हानिकारक प्रभावों से बचने की संभावना काफी बढ़ जाएगी।

वर्तमान में वैश्विक रूप से किये जा रहे उत्सर्जन का लगभग एक चौथाई हिस्सा भूमि के कारण होता है। ब्राजील, चीन, इंडोनेशिया, यूरोपियन यूनियन, भारत, रूस, मैक्सिको, संयुक्त राज्य अमेरिका, ऑस्ट्रेलिया और कोलंबिया संयुक्त रूप से वैश्विक स्तर पर भूमि क्षेत्र से होने वाले उत्सर्जन के 54 फीसदी हिस्से के लिए जिम्मेदार है| गौरतलब है कि भूमि क्षेत्र के अंतर्गत कृषि भूमि, जंगल और अन्य भूमि उपयोग को सम्मिलित किया जाता है । यह सभी मिलकर वैश्विक रूप से हर वर्ष 10 से 12 गीगाटन कार्बन डाइऑक्साइड का उत्सर्जन करते हैं । जो कि मानव द्वारा उत्सर्जित की जा रही नेट ग्रीन हाउस गैसों के 25 फीसदी के बराबर है । जिसमें से लगभग आधा कृषि से और आधा भूमि उपयोग और उसके परिवर्तन और जंगलों द्वारा उत्सर्जित किया जाता है । इसलिए यदि हमें पेरिस समझौते के 1.5 डिग्री सेल्सियस के लक्ष्य को हासिल करना है तो इसमें कमी करना अत्यंत जरुरी हो जाता है । यदि उचित प्रबंधन किया जाये तो पेड़-पौधे और मिट्टी, प्रकाश संश्लेषण के माध्यम से कार्बन डाइऑक्साइड की भारी मात्रा को सोख सकते हैं।

संभव है उत्सर्जन में हर दशक 50 फीसदी की कटौती

जलवायु परिवर्तन से निपटने के लिए भूमि का उचित उपयोग कैसे करें, शोधकर्ताओं ने इसकी एक व्यापक रूपरेखा तैयार की है, जिसकी मदद से 2040 तक भूमि क्षेत्र से होने वाले उत्सर्जन को सीमित किया जा सकता है । वर्जीनिया विश्वविद्यालय के एक पर्यावरण वैज्ञानिक और इस अध्ययन के प्रमुख शोधकर्ता, स्टेफनी रो ने बताया कि "हमने एक रोडमैप बनाया है जिसकी सहायता से भूमि क्षेत्र से होने वाले उत्सर्जन में हर दशक लगभग 50 फीसदी की कटौती की जा सकती है, साथ ही 2030 से 2050 के बीच जमीन के कार्बन सोखने की गति को दस गुना बढ़ाया जा सकता है।"

शोधकर्ताओं ने इसके लिए जलवायु मॉडल और भूमि प्रबंधन से जुड़े दो दर्जन मामलों की जांच की है, जिन्होंने उत्सर्जन को रोकने के साथ-साथ समाज और पर्यावरण को भी लाभ पहुंचाया है | उसके बाद उन्होंने यह रोडमैप तैयार किया है कि कैसे वैश्विक स्तर अधिक से अधिक देश इन पद्धतियां को अपनाकर अपने उत्सर्जन में कमी ला सकते हैं। उन्होंने सबसे पहले जंगलों की कटाई पर रोक लगाने को अहम् बताया है | ग्लोबल वार्मिंग से निपटने के लिए 2030 तक ब्राजील, इंडोनेशिया और अफ्रीका के कांगो बेसिन में वनों की कटाई को 70 फीसदी तक कम करने की जरुरत है । दूसरा सबसे महत्वपूर्ण कदम कृषि क्षेत्र में सुधार करना है | खेती के तरीकों में सुधार करके, जिसके अंतर्गत जैविक खेती को बढ़ावा देना साथ ही मिट्टी के बेहतर प्रबंधन की मदद से हर वर्ष भारत के वार्षिक उत्सर्जन के बराबर कार्बन डाइऑक्साइड को कम किया सकता है ।

देशों को कृषिभूमि पर वनरोपण करके वन प्रबंधन में सुधार करना होगा, जिसकी मदद से हर वर्ष यूरोपियन यूनियन के कुल वार्षिक उत्सर्जन के बराबर ग्रीन हाउस गैसों में कमी की जा सके । साथ ही 2030 तक खाद्य पदार्थों की हो रही बर्बादी और हानि में 30 फीसदी की कटौती की जानी चाहिए । उनके अनुसार भूमि से होने वाले कुल उत्सर्जन में 85 फीसदी की कटौती की जानी चाहिए और सदी के मध्य तक जमीन के कार्बन सोखने की क्षमता में 10 गुनी वृद्धि होनी चाहिए । प्रोफेसर रो के अनुसार "आगे का काम चुनौतीपूर्ण है, लेकिन हमारे पास इसे अभी लागू करने के लिए सभी आवश्यक उपकरण और ज्ञान उपलब्ध हैं।

इंटरनेशनल पैनल ऑन क्लाइमेट चेंज द्वारा अगस्त में जारी रिपोर्ट के अनुसार बढ़ते तापमान को नियंत्रित करने के लिए अकेले वाहनों, उद्योंगो और पावर प्लांट्स से होने वाले उत्सर्जन में कटौती करना काफी नहीं होगा । कृषि पदातियों में बदलाव, मिट्टी और जंगल भी इसके लिए अत्यंत महत्वपूर्ण हैं | इस रिपोर्ट में इसपर भी प्रकाश डाला गया है कि कैसे 2050 तक 1000 करोड़ लोगों के खाने की जरूरतों को पूरा करने के साथ-साथ दुनिया में ग्लोबल वार्मिंग को सीमित किया जा सकता है |स्पष्ट है कि भूमि एक महत्वपूर्ण संसाधन है, जो न केवल अरबों लोगों के पेट भरने में सक्षम है, बल्कि जलवायु परिवर्तन से निपटने में भी अहम भूमिका निभा सकता हैI

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