Economy

राेजगार ढाबा से मिला पलायन रोकने और बेरोजगारी कम करने का मंत्र

बारह साल के एक बच्चे ने जब पलायन के कारण अपने चचेरे भाई को खो दिया, तब उसने पलायन रोकना और ग्रामीण स्तर पर ही रोजगार मुहैया कराना अपने जीवन का लक्ष्य बना लिया। 

 
By Bhagirath Srivas
Last Updated: Sunday 26 May 2019
रोजगार ढाबा
विनोद पांडे  (तारिक अजीज / सीएसई) विनोद पांडे (तारिक अजीज / सीएसई)

रोजगार ढाबा की अवधारणा क्या है और यह कैसे काम करता है?

रोजगार ढाबा ग्रामीण क्षेत्रों में बेरोजगारी की समस्या से जूझता है। यह ऐसी समस्या है जो प्रवास को असुरक्षित बनाती है। गांवों के लोग शहरों की ओर पलायन कर जाते हैं क्योंकि उनके पास अपने गांव या आसपास के क्षेत्रों में आजीविका के अवसरों के बारे में कोई जानकारी उपलब्ध नहीं है। लेकिन सच यह है कि अलग-अलग आजीविका के अवसर उपलब्ध होते हैं। रोजगार ढाबा मुख्य रूप से एक चाय की दुकान है, जो ग्रामीण समुदायों के साथ नौकरियों के बारे में जानकारी साझा करने के लिए सूचना विनिमय केंद्र के रूप में काम करती है ताकि लोगों को उनके स्थानीय इलाके में रोजगार मिल सके। हम चाय की बिक्री से कमाते हैं और उसी गांव में पुन: निवेश करने के लिए इसका उपयोग करते हैं। रोजगार ढाबा स्थानीय विक्रेताओं या नियोक्ताओं से नौकरियों के बारे में जानकारी एकत्र करता है। केंद्र नौकरी चाहने वालों से भी जानकारी एकत्र करता है और एकत्रित जानकारी प्रदर्शित करता है। रोजगार ढाबा में कृषि उत्पाद खरीदने और बेचने वालों की जानकारी दी जाती है। यहां उन ग्रामीणों की सूचनाएं होती हैं जो खेत या कृषि उपकरण किराए पर लेना चाहते हैं। सरकारी कार्यक्रमों की जानकारी भी मुहैया कराई जाती है।

इसका विचार आपके दिमाग में पहली बार कब और इसके पीछे की कहानी क्या थी?

मैं ग्रामीण परिवेश से आता हूं। मैंने अपने घर के लोगों को मजदूरी के लिए पलायन करते देखा है। जब मेरी उम्र 12 वर्ष रही होगी। मेरे एक चचेरे भाई की ऐसे ही असुरक्षित पलायन में स्वास्थ्य बिगड़ने के कारण मौत हो गई थी। तब मुझे पता नहीं था कि असुरक्षित पलायन क्या होता है। समय के साथ इसे समझा और सोचा कि आने वाले समय में इस पर काम किया जाएगा। बाद में दिल्ली स्थित लाभकारी संगठन सेंटर फॉर साइंस एंड एनवायरमेंट में इंटर्नशिप में दिल्ली में असुरक्षित पलायन और बेरोजगारी पर काम किया और रोजगार ढाबा मॉडल विकसित किया। पहले रोजगार ढाबा सूचना विनियमय केंद्र के रूप में करने का विचार था, लेकिन बाद में लगा कि लोग सिर्फ जानकारी लेने नहीं आएंगे। तब लगा कि गांवों में चाय की दुकान अपने आप में एक सूचना के आदान-प्रदान का केंद्र है। ऐसे में क्यों न चाय की दुकान को रोजगार ढाबा की शक्ल दी जाए। इसी के साथ रोजगार ढाबा की शुरुआत हुई।

रोजगार ढाबा बेरोजगार युवाओं के लिए आर्थिक रूप से कितना मददगार है?

रोजगार ढाबा का मकसद बेरोजगार युवकों एवं अन्य ग्रामीणों को स्थानीय तथा आसपास के शहरों में रोजगार के बारे में जानकारी देना है। हमारा अनुभव कहता है कि कई ऐसे रोजगार हैं, जिनकी जानकारी लोगों को नहीं है। बहुत से रोजगार हैं जिन पर हम कभी ध्यान ही नहीं देते क्योंकि ऐसे रोजगार का प्रचार-प्रसार कम होता है। रोजगार ढाबा गांव और आसपास के शहर के उपलब्ध बिना प्रचार प्रसारित रोजगार की जानकारी ग्रामीण युवकों को प्रदान करता है। इसमें ऑफिस, खेत, ट्यूशन पढ़ाना, मकैनिक, अकाउंटिंग आदि शामिल हैं।

ग्रामीण अर्थव्यवस्था के लिए यह विचार किस प्रकार अन्य आर्थिक गतिविधियों को बढ़ा सकता है?

रोजगार ढाबा का मॉडल चाय की दुकान पर आधारित है। इससे दूध के व्यवसाय को बढ़ावा मिलेगा। चाय मिट्टी के कुल्हड़ में दी जाती है। इससे गांव के कुम्हार का रोजगार सुरक्षित होगा। जब पलायन कम होगा तो किसान खेती पर अधिक ध्यान दे पाएंगे। इसमें सूचना तकनीक का सही मायने में इस्तेमाल होगा। यह कई तरीके से महिलाओं को रोजगार उपलब्ध कराता है। मसलन, हस्तशिल्प का सामान इसके माध्यम से शहरों तक पहुंचाया जा सकता है। इसके अलावा उपलब्ध आंकड़ों के आधार पर सरकार बेहतर विकास के कार्यक्रम बना सकती है।

आपका रोजगार ढाबा सूचना केंद्र की शक्ल ले रहा है। आज सूचनाओं का पूरा संसार मोबाइल पर उपलब्ध है। ऐसे में आपका प्रयास अलग कैसे है?

रोजगार ढाबा तकनीक से ज्यादा लोगों को जोड़ने का काम करता है। यह वास्तविक मानव मिलन है, आभासी नहीं। यह सिर्फ जानकारी ही नहीं देता बल्कि लोगों को भी वास्तव में एक-दूसरे से जोड़ता है। इस प्रकार यह जीवंत मॉडल है।

आप भारत में बेरोजगारी की समस्या को कितना गंभीर मानते हैं। क्या सरकारी नीतियां इस समस्या से निपटने में असफल हो गई हैं। यदि हां तो क्यों?

इसमें कोई शक नहीं है कि बेरोजगारी बड़ी समस्या है। लेकिन एक बड़ी दिक्कत यह भी है कि लोगों को यह पता नहीं होता कि रोजगार कहां है। इसी चक्कर में लोग असुरक्षित पलायन करते हैं। सरकार ने बेरोजगारी से निपटने के प्रयास किए हैं लेकिन ये प्रयास क्रियान्वयन में असफल हुए हैं। एक समस्या यह रही कि सब रोजगार सरकार से संबंधित रहे, जबकि रोजगार तो सरकार के अलावा भी हैं। बेरोजगारों को संस्थाओं और संस्थाओं को बेरोजगारों से जोड़ने का प्रयास बहुत कम हुआ। इसके अलावा शायद जरूरी और सही कौशल का प्रशिक्षण नहीं दिया गया।

ग्रामीण युवा तकनीकी रूप से इतने सक्षम नहीं है। साधारण डिग्री नौकरी नहीं दे पा रही है। ऐसे युवाओं में बेरोजगारी दूर करने में कौन-कौन से प्रयास मददगार साबित हो सकते हैं?

ग्रामीण युवा की ताकत उसका ग्रामीण ज्ञान है। वह खेती, पशुपालन, पर्यावरण टूरिजम पर अच्छा काम कर सकता है। अगर इनका सही इस्तेमाल हो तो काफी हद तक ग्रामीण युवा के रोजगार की समस्या का समाधान हो सकता है। डिग्री का मकसद नौकरी नहीं ज्ञान होना चाहिए। अगर सही ज्ञान दिया जाए तो ग्रामीण युवा अपने गांवों में आकर भी सही रोजगार पा सकता है या रोजगार खड़ा कर सकता है। वह शहरों में विज्ञान के क्षेत्र में भी अपनी सेवाएं दे सकता है। अभी हम डिग्री नौकरी के लिए ले रहे हैं, शायद ज्ञान की अभी कमी है।

आपके दिमाग में रोजगार ढाबा का विचार दस साल पहले आया था। इसे जमीन पर उतारने में इतना समय क्यों लग गया? आपके क्या अनुभव रहे?

हमारा पहला प्रयास सिर्फ जानकारी देने का था और यह बताना बहुत मुश्किल था कि हमारे पास रोजगार की जानकारी है। चाय की दुकान पर आप को किसी को बुलाने की जरूरत नहीं है। चाय सबकी जरूरत होती है। दूसरा कारण था नौकरी छोड़ना इतना आसान नहीं होता। रोजगार ढाबा को चलाने के लिए नौकरी छोड़नी पड़ती। आधे मान से कोई काम नहीं हो सकता था। तीसरा, इसकी शुरुआत करने से पहले कई सारे ट्रायल करना चाहते थे।

आप बिहार से हैं लेकिन आपने मध्य प्रदेश में पहला ढाबा क्यों स्थापित किया? आपके गृह राज्य में यह बेरोजगारी की समस्या तो मध्य प्रदेश से अधिक है। बिहार में आपने इसकी पहल क्यों नहीं की?

दरअसल, मैं बिहार में कम रहा हूं। एनजीओ कार्यकाल में मैंने दस साल मध्य प्रदेश में बहुत काम किया है। मध्य प्रदेश को चुनने का यह भी एक मुख्य कारण रहा। मुझे यहां की समझ ज्यादा थी। यहां मेरे पास काम करने वाली टीम थी। बिहार में भी जल्द रोजगार ढाबा शुरू होगा।

आमतौर पर चाय की दुकान चलाना मजबूरी का काम माना जाता है? क्या यह टिकाऊ और आर्थिक रूप से अच्छा विकल्प बन सकता है?

मजबूरी तब है जब यह एक सिर्फ चाय की दुकान तक ही सीमति हो। जब यह चाय के साथ जानकारी का केंद्र बन जाएगी तो यह बेहतर मॉडल होगी। आज हम देख सकते हैं कि चाय बेचना एक बड़ा काम है। उदाहरण के तौर पर चाय पॉइंट (बैंगलोर), चायोस (दिल्ली) को ही लीजिए। आज हार्वर्ड यूनिवर्सिटी, आईआईटी और आईआईएम से पढ़े लोग चाय बेच रहे हैं। इसका भविष्य काफी सुरक्षित है। गांवों में तो चाय की मांग हमेशा रहती है। इसलिए चाय का काम हमेशा अच्छा विकल्प रहेगा।

भविष्य की क्या योजनाएं हैं? क्या आपको इस काम में सरकारी मदद मिली है?

रोजगार ढाबा का लक्ष्य अगले पांच वर्षों में भारत के ग्रामीण इलाकों में 100 रोजगार ढाबा केंद्रों के माध्यम से एक करोड़ लोगों तक पहुंचना है। इस काम में अभी हमें कोई सरकारी मदद नहीं मिली है।

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