Agriculture

निजी कृषि कॉलेजों के खिलाफ छात्रों का आंदोलन

मध्यप्रदेश के दो कृषि विश्वविद्यालयों से जुड़े 14 सरकारी कॉलेजों के छात्रों का कहना है कि राज्य में निजी कॉलेजों को प्रमुखता दी जा रही है   

 
By Manish Chandra Mishra
Last Updated: Monday 24 June 2019
निजी कृषि कॉलेजों के खिलाफ आंदोलनरत सरकारी कॉलेजों के छात्र। फोटो: मनीष चंद्र मिश्रा
निजी कृषि कॉलेजों के खिलाफ आंदोलनरत सरकारी कॉलेजों के छात्र। फोटो: मनीष चंद्र मिश्रा निजी कृषि कॉलेजों के खिलाफ आंदोलनरत सरकारी कॉलेजों के छात्र। फोटो: मनीष चंद्र मिश्रा

मध्यप्रदेश के दो कृषि विश्वविद्यालयों से जुड़े 14 सरकारी कॉलेजों के विद्यार्थी पिछले दो सप्ताह से आंदोलनरत हैं। वजह है, कृषि शिक्षा में गिरती गुणवत्ता। विद्यार्थियों की मांग है कि प्राइवेट कॉलेजों की गुणवत्ता को सरकारी के बराबर रखने के लिए भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद के मापदंड़ों के अनुरूप ही प्राइवेट कॉलेजों को भी चलाया जाए। इस मांग के अलावा विद्यार्थी शासकीय नौकरियों में कृषि क्षेत्र में खाली पदों को भी भरने की मांग कर रहे हैं। यह आंदोलन पिछले दो सप्ताह से जारी है, लेकिन विद्यार्थियों का आरोप है कि मध्यप्रदेश सरकारी उनकी मांगों पर ध्यान नहीं दे रही है। मुख्यमंत्री कमलनाथ ने उन्हें मिलने का समय नहीं दिया जबकि कृषि मंत्री से बातचीत के बाद भी कोई हल नहीं निकल पाया। जबलपुर और ग्वालियर में अनशन कर रहे की विद्यार्थी बीमार हो गए और उनका इलाज अस्पताल में चल रहा है।


वर्ष 2014 के बाद मध्य प्रदेश में कृषि शिक्षा का स्तर सुधारने के उद्देश्य से मध्यप्रदेश शासन की स्वीकृति से निजी कृषि महाविद्यालय की बाढ़ आ गई। जवाहरलाल नेहरु कृषि विवि और ग्वालियर कृषि विवि से संबद्ध प्रदेश के 14 सरकारी कॉलेज की तुलना में प्राइवेट कॉलेज खोलने के लिए सरकार ने उतने कड़ मापदंड़ नहीं बनाए। नतीजतन इन कॉलेज में प्रवेश के लिए प्री एग्रीकल्चर टेस्ट(पीएटी) भी नहीं देना पड़ता, जबकि कृषि शिक्षा में स्नातक पाठ्यक्रम में प्रवेश लेने के लिए पीएटी अनिवार्य है। शासकीय कृषि महाविद्यालय खोलने के लिए कम से कम 125 एकड़ भूमि होना चाहिए, जहां व्यवहारिक ज्ञान दिया जा सके। सीट संख्या भी निर्धारित की जाती है, ताकि कृषि शिक्षा से जुड़ी हर जानकारी छात्रों तक पहुंचाई जा सके, लेकिन निजी कृषि कॉलेज इन मापदंड पर खरे नहीं उतरते हैं।

इस आंदोलन में सक्रिय भूमिका निभा रहे जबलपुर के छात्र शुभम सिंह पटेल बताते हैं कि विद्यार्थी प्राइवेट कॉलेज के खिलाफ नहीं है, बल्कि वे चाहते हैं कि पढ़ाई की गुणवत्ता से समझौता न हो। इस तरह कृषि क्षेत्र और उनके भविष्य पर इसका गलत असर हो रहा है। जहां सरकारी कॉलेज के बेचलर कोर्स में हर साल तकरीबन 800 स्टूडेंट्स निकलते हैं वहीं प्राइवेट कॉलेज की बाढ़ के बाद 10 हजार से अधिक स्टूडेंट्स हर साल ग्रेजुएट हो रहे हैं। प्रदेश में 20 से अधिक प्राइवेट कॉलेज हैं जहां एडमिशन लेने वाले स्टूडेंट्स की कोई अधिकतम सीमा नहीं तय की गई है। शुभम बताते हैं कि इस तरह दो कमरे के घर से भी कोई कॉलेज संचालित कर डिग्री बांट सकता है। इस तरह डिग्री लेकर बिना किसी ज्ञान के निकले लोग सरकारी नौकरियों के लिए योग्य हो जाते हैं जिसका नुकसान सरकारी कॉलेज से निकले विद्यार्थियों को सीधा होता है।

कृषि से जुड़े पांच हजार पद खाली 
विद्यार्थियों की दूसरी बड़ी मांग सरकार में खाली पड़े पदों को भरने की है। पिछले कई वर्षों से कृषि क्षेत्र के पदों को नहीं भरा गया है और एक अनुमान के मुताबिक पांच हजार पद खाली हैं। आंदोलन करने वाले विद्यार्थी इन पदों को भी भरने की मांग कर रहे हैं। इस मुद्दे पर सरकारी की तरफ से कृषि मंत्री सचिन यादव या मुख्यमंत्री कमलनाथ की कोई प्रतिक्रिया नहीं आई है।

 

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