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महुए की मिठास अब होगी खास‍!

आदिवासियों द्वारा महुए से बनाए जाने वाले पारंपरिक पेय को शहरी बाजार में उतारने के लिए ट्राईफेड ने आईआईटी दिल्ली के साथ मिलकर तैयार किया नुस्खा

 
By Chaitanya Chandan
Last Updated: Sunday 02 June 2019
महुए की मिठास अब होगी खास‍
श्रीकांत चौधरी / सीएसई श्रीकांत चौधरी / सीएसई

आदिवासियों के जीवन में रचा-बसा महुआ न सिर्फ उनके खान-पान का हिस्सा है, बल्कि उनके जीविकोपार्जन का साधन भी है। भारत के आदिवासी बहुल राज्यों- छत्तीसगढ़, ओडिशा, मध्यप्रदेश, झारखंड, आंध्र प्रदेश और तेलंगाना में महुआ के फूलों से विभिन्न प्रकार के पकवानों के साथ ही मदिरा बनाकर उसका सेवन करने की एक समृद्ध परंपरा रही है। आदिवासी संस्कृति में महुए के पेड़ को पवित्र माना गया है और इसीलिए वे अपने सभी तीज-त्योहारों में महुए से बनी मदिरा देवी-देवताओं को अर्पित करते हैं।

इस पेय के ऐतिहासिक महत्व को देखते हुए ट्राइबल कोऑपरेटिव मार्केटिंग डेवलपमेंट फेडरेशन ऑफ इंडिया लिमिटेड (ट्राईफेड) अब इसे उपभोक्ता बाजार में उतारने की तैयारी कर रहा है। ट्राईफेड ने आईआईटी दिल्ली के साथ मिलकर एक फार्मूला तैयार किया है जिससे पारंपरिक महुआ पेय को फलों के स्वाद के साथ शहरी बाजार में उपभोग के लिए पेश किया जा सके।

आदिवासी समाज में महुआ से परंपरागत तरीके से मदिरा बनाकर उपभोग करने की प्रथा सदियों से चली आ रही है। फिलहाल देश में आदिवासियों को खुद के उपभोग के लिए मदिरा बनाने की अनुमति है। इस मदिरा को बनाने के लिए महुए के सूखे फूलों को पानी में डालकर 3-7 दिनों तक रख दिया जाता है। इसके साथ ही आवश्यकतानुसार विभिन्न प्रकार के पेड़ों की छाल, फूल, पत्ते आदि भी मिलाया जाता है। उसके बाद उस बर्तन को आग पर गरम किया जाता है और गरम होने पर जो भाप निकलती है उसको पाइप (अमूमन बांस का इस्तेमाल किया जाता है) के द्वारा दूसरे बर्तन में एकत्र किया जाता है। यह ठंडी होने पर मदिरा के तौर पर उपभोग के लिए तैयार होती है। यह पेय मुख्यतः रंगहीन और पारदर्शी होता है। इसका स्वाद थोड़ा कड़वापन लिए मीठा होता है और इससे महुए के फूलों की खुशबू आती है।

छत्तीसगढ़ के दंतेवाड़ा जिले के मरकनेर गांव निवासी सुमित्रा बताती हैं कि गांव में महुए के करीब 2,000 पेड़ हैं। ये पेड़ लगभग सभी परिवारों के जीविकोपार्जन का मुख्य साधन है। गांव के हर परिवार के अधिकार में 5-6 पेड़ हैं, जिससे वे फूल एकत्र करते हैं। सुमित्रा आगे बताती हैं, “यहां के अमूमन सभी परिवार महुए के फूलों से मदिरा बनाते हैं और इसका खुद उपभोग करने के साथ ही इसे साप्ताहिक बाजार में भी बेचते हैं। एक बोतल (750 मिली) मदिरा करीब 50 रुपए में बिकती है।”

मुख्यधारा से जुड़ेंगे आदिवासी

भारत सरकार द्वारा चलाई जा रही वन धन योजना के तहत ट्राईफेड ने महुए के फूलों से हेरिटेज ड्रिंक बनाने और उसे शहरी बाजारों में बेचने की परियोजना पर काम शुरू कर दिया है। ट्राईफेड के प्रबंध निदेशक प्रवीर कृष्णा ने इस परियोजना के बारे में विस्तार से बताते हुए कहा, “हम लोग आदिवासियों के उसी ज्ञान का उपयोग कर रहे हैं, जो उनके पास हजारों सालों से है। महुआ ड्रिंक के उत्पादन और विपणन के हर स्तर पर आदिवासियों की भागीदारी होगी और इसके वितरण के काम में भी आदिवासियों को ही प्राथमिकता दी जाएगी।

यह सारी कवायद छत्तीसगढ़, झारखंड, ओडिशा और आंध्र प्रदेश के आदिवासियों को मुख्यधारा से जोड़ने में मदद करेगी।” उत्पाद के लिए आवश्यक महुए को आदिवासियों से सीधे न्यूनतम समर्थन मूल्य पर खरीदा जाएगा। फिलहाल महुए का न्यूनतम समर्थन मूल्य भारत सरकार द्वारा 25 रुपए प्रति किलो तय किया गया है। आदिवासी जिस विधि से महुआ ड्रिंक बनाते हैं, उसी विधि को थोड़ा सुधार कर यह हेरिटेज ड्रिंक बनाया जाएगा। इसके लिए ट्राईफेड ने शोध करने के लिए दो साल पहले आईआईटी दिल्ली की एक टीम को अधिकृत किया था।

जनजातीय कार्य मंत्रालय द्वारा आयोजित आदि महोत्सव २०१७ के दौरान आईएनए स्थित दिल्ली हाट में महुआ से हेरिटेज ड्रिंक बनाने की विधि के प्रदर्शन का निरीक्षण करते ट्राईफेड के प्रबंध निदेशक प्रवीर कृष्णा  (सौजन्य: जनजातीय कार्य मंत्रालय)

इस परियोजना के लिए शोध टीम का नेतृत्व कर रहे आईआईटी दिल्ली के प्रोफेसर एसएन नाइक ने बताया, “हमने अनार, अदरक और अमरूद फ्लेवर्स के साथ हेरिटेज महुआ ड्रिंक बनाने में सफलता प्राप्त की है। यह हेरिटेज ड्रिंक अपने मूल स्वाद से थोड़ा मृदु होगा, जिससे इसे शहरी बाजार में आसानी से उपभोग के लिए प्रस्तुत किया जा सके। इस हेरिटेज ड्रिंक में अल्कोहल की मात्रा 5-30 प्रतिशत तक होगी।” ट्राईफेड ने छत्तीसगढ़ के जगदलपुर और महाराष्ट्र के रायगढ़ जिले के तलूजा में महुआ हेरिटेज ड्रिंक के वाणिज्यिक उत्पादन के लिए प्लांट स्थापित किया है। इस परियोजना की कुल लागत करीब 16 करोड़ रुपए है।

कृष्णा ने बताया, “हम इसके उत्पादन के लिए सभी जरूरी लाइसेंस (जैसे- राज्य सरकारों के आबकारी विभाग, भारतीय खाघ संरक्षा एवं मानक प्राधिकरण, पर्यावरणीय मंजूरी, स्थानीय प्रशासन की मंजूरी आदि) प्राप्त करने की प्रक्रिया शुरू कर रहे हैं।” गौरतलब है कि ट्राईफेड के देशभर में 104 विक्रय केंद्र हैं। इन सभी विक्रय केंद्रों पर यह महुआ हेरिटेज ड्रिंक उपलब्ध रहेगा। ट्राईफेड इस उत्पाद को “आदिवासी गौरव” के नाम से प्रचारित करेगा। ट्राईफेड ने गोवा की एक कंपनी डेज्मंड नजरेथ से पार्टनरशिप की है जो महुआ ड्रिंक के उत्पादन और प्रचार में मदद करेगी। ट्राईफेड इस उत्पाद को जून के महीने से बाजार में लाने की तैयारी कर रहा है।

गौरतलब है कि एक उद्यमी डेज्मंड नजरेथ ने गोवा में वर्ष 2018 में डीजे महुआ ब्रांड नाम से महुआ ड्रिंक को बाजार में उतारा है। नजरेथ महुआ ड्रिंक के लिए पिछले दो सालों से ओडिशा से महुआ खरीद रहे हैं। नजरेथ ने बताया, “हम लोग महुए के फूल सीधे आदिवासियों के समूह से खरीदते हैं और इसके लिए उन्हें प्रति किलो 50 रुपए का भुगतान किया जाता है।” डीजे महुआ की 750 मिली की एक बोतल की कीमत 950 रुपए रखी गई है। इस तरह देखा जाए तो यह आदिवासियों द्वारा 750 मिली मदिरा की कीमत 50 रुपए के मुकाबले बहुत अधिक है। यदि यह लाभ आदिवासियों को स्थानांतरित किया जाए तो उनके जीवन में सुधार लाया जा सकता है। रिसर्च एंड मार्केट्स की वर्ष 2018 की रिपोर्ट के अनुसार, भारत का मदिरा बाजार 8.8 प्रतिशत प्रतिवर्ष के दर से बढ़ रहा है और वर्ष 2022 तक देश में मदिरा का उपभोग 1,680 करोड़ लीटर तक पहुंच जाएगा। इनमें से 30 प्रतिशत हिस्सेदारी देसी मदिरा की है। इस लिहाज से देखा जाए तो महुआ हेरिटेज ड्रिंक जल्दी ही शहरी बाजार में लोकप्रियता हासिल कर सकता है।

महुए से मदिरा का वाणिज्यिक उत्पादन और विपणन का प्रथम प्रयास 18वीं शताब्दी में तब किया गया था जब तत्कालीन अंग्रेजी हुकूमत ने इसकी वाणिज्यिक क्षमता को पहचाना था। अंग्रेजt सरकार ने वर्ष 1875 में रांची में एक जायसवाल परिवार को महुए की शराब के वाणिज्यिक उत्पादन की मंजूरी दे दी। इसी वर्ष रायबहादुर ठाकुर जायसवाल ने रांची डिस्टिलरी की नींव रखी और महुए से शराब बनाकर उसे खुले बाजार में बेचने की शुरुआत की। लेकिन किन्हीं कारणों से इस डिस्टिलरी में उत्पादन कुछ ही वर्षों में बंद करना पड़ा। महुआ पेय बनाने की यह पहल कितनी कामयाब होगी, यह तो आने वाला वक्त बताएगा लेकिन अगर इस पर ठीक से अमल किया जाए तो आदिवासियों की जिंदगी में कुछ हद तक सुधार जरूर हो सकता है।

(दीपान्विता गीता नियोगी के इनपुट सहित)

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