Forests

ये हैं चित्रकूट के दशरथ मांझी

ये हैं भैयाराम यादव, जिन्होंने मृत जमीन को जिंदा कर 40 हजार से अधिक पेड़-पौधे लगा उन्हें वन क्षेत्र में तब्दील कर दिया है 

 
Last Updated: Wednesday 10 July 2019
ये हैं बुंदलेखंड के चित्रकूट के भारतपुर गांव के भैयाराम यादव। फोटो: प्रियंका पांडे
ये हैं बुंदलेखंड के चित्रकूट के भारतपुर गांव के भैयाराम यादव। फोटो: प्रियंका पांडे ये हैं बुंदलेखंड के चित्रकूट के भारतपुर गांव के भैयाराम यादव। फोटो: प्रियंका पांडे

चित्रकूट से प्रियंका पांडे 
 
आपने बिहार के जीतनराम दशरथ मांझी के बारे में जरूर सुना होगा जिन्होंने अपनी पत्नी की याद में 22 साल तक एक पहाड़ को काटकर रास्ता बना दिया था। और आज हम आपको एक ऐसे ही और मांझी से मिलाने जा रहे हैं जिन्होंने अपनी पत्नी और बच्चे की याद में अपना पूरा जीवन पेड़ों पर समर्पित कर दिया, अपना सबकुछ खोकर इन्होने प्रकति से ऐसा रिश्ता जोड़ा की पेड़ लगाना और उनकी रक्षा करना ही इनके जीवन का लक्ष्य बन गया और उन्होंने बंजर, ककरीली, पथरीली जमीन पर पिछले 12 साल से अब तक लगभग 40 हजार से ज्यादा पेड़ लगा उसे हरा भरा कर जंगल बना दिया और आज भी उनका यह काम निरंतर जारी है। 
 
हम जिस शख्स की बात कर रहे हैं वो बुंदलेखंड के चित्रकूट के भरतकूप इलाके के भारतपुर गांव के रहने वाले हैं जिनका नाम भैयाराम यादव हैं। जिन्होंने मृत ज़मीन को जिंदा कर 40 हजार से अधिक पेड़-पौधे लगा उन्हें वन क्षेत्र में तब्दील कर दिया है और इस वनक्षेत्र को अब भरतवन नाम से जाना जाता है यहाँ लगाए सभी पेड़ों को भैयाराम अपने पुत्र की तरह पालते हैं । पत्नी और बेटे के वियोग में इस तरह का काम करने वाले भैयाराम यादव को अब दूसरा दशरथ मांझी कहा जाने लगा है। बड़ी बात यह है की भैयाराम ने इतने सालों में बिना किसी सरकारी मदद के यह काम किया है जो और लिए नजीर बना हुआ है। चित्रकूट जिले में भरतकूप इलाके के भारतपुर गांव के करीब कंचन पर्वत के पीछे के फॉरेस्ट रेंज में भैयाराम यहीं कच्चे मकान में रहते हैं। कुछ जोड़ी कपड़े और चंद बर्तन के अलावा घर में कुछ नहीं है।
 
भैयाराम बताते हैं की उनकी पत्नी और बच्चे की याद में 40 हजार से अधिक पेड़ लगा डाले। उन्होंने बताया की उनकी पत्नी की मौत 2001 में पुत्र को जन्म देने के समय हो गई थी वहीं पत्नी की मौत के बाद नवजात बच्चे की जिम्मेदारी उन पर आ गई और वो अपने बच्चे को पालने लगे इसी दौरान 7 साल बाद बीमारी के चलते 2007 में उनके बेटे की भी मौत जो गयी जिसके बाद वह पूरी तरह से टूट गया।  और पूरी तरह टूट चुका भैयाराम पागलों की तरह यहाँ वहां भटकने लगा । इस दौरान पौधरोपण कार्यक्रम ने उसे जीने की नई राह दिखाई और उनका रुझान बंजर जमीन पर पेड़ लगाने की ओर बढ़ा और फिर वो गाँव के बाहर बंजर, ककरीली, पथरीली जमीन पर पेड़ लगाने लगे और वह पौधों की अपने पुत्र की तरह पालने लगे। सबसे पहले इन्होने खुद से खरीदकर 500 पौधों लगाकर इसकी शुरुवात की थी। उन पर पेड़ पौधों की सेवा करने का ऐसा जुनून चढ़ा की उन्होंने अपने गाँव का घर छोड़ दिया और वहीं जंगल में रहने लगे । अब वह ऐसे ही चालीस हजार संतानों का पिता है। बड़ी बात यह है की वह सरकारी मजदूरी लेने को तैयार नहीं है। वन विभाग के अधिकारियों ने कई बार उसे बिल बनाने को कहा , लेकिन उसने  को ठुकरा दिया। भैयाराम कहते हैं यदि वह मजदूरी लेगा तो उसका पौधों से मजदूर की तरह प्यार होगा, बच्चों की तरह नहीं। लेकिन वन विभाग द्वारा हर साल वह पौधे लेकर उन्हें लगाता जरूर है। किन्तु उसे यहाँ के प्रशासनिक अमले से बड़ी शिकायत है। वह 2007 से लेकर आज तक वह इन बृक्षों की रखवाली करता आ रहा है और अपने पास से रुपये देकर इनकी सिचाई करता है किंतु उसके बार बार आग्रह के बाद भी एक अदद हैंडपंप तक नही लगवाया जा सका है। भैयाराम की जिला प्रशासन चित्रकूट से गुजारिश है कि उसके वृक्षो की सुरक्षा के लिए बाड लगवा दिया जाए और पानी के लिए एक बोर हो जाये तो वो और पौधे लगा सके।  
 
भैयाराम कहते हैं की ये पेड़ उनके अकेलेपन के साथी हैं। 2008 से अब तक भैयाराम ने अपने पूरे जीवन को पूरी तरह से पर्यावरण को संजोने में लगा दिया। उन्होंने निर्जीव जमीन को अच्छा बनाने के लिए बीच में आने वाली छोटी-छोटी पहाड़ियों को भी काट दिया. और पौध लगाना शुरू किया. उन्होंने 50 हेक्टेयर से अधिक बंजर ककरीले पथरीले इलाके को वन क्षेत्र में तब्दील कर दिया। और इस समय उनके वन क्षेत्र में 40 हजार से अधिक पेड़ लगे हुए हैं। इसके लिए वन विभाग ने उनकी मदद की और हज़ारों पौधे उन्हें दिए, जो अब बड़े हो चुके हैं. जिसमे आम, नीम, शीशम, सागौन, अमरूद, बेर आंवला आदि है। पेड़ों को ही अपना परिवार मानने वाले 55 साल के भैयाराम कहते हैं कि मुझे पर्यावरण और इन पेड़ों ने जीने का सहारा दिया है और ये उनके अकेलेपन के साथी हैं। 
 
यहाँ के वन अधिकारी भी कहते हैं कि यदि भैयाराम जैसे और लोग मिल जाए तो बुंदेलखंड क्या हर जगह हरीभरी और खुशहाल हो सकती है। आज उसके प्रयास से वन विभाग के चालीस हजार पौधे पहरा के पहाड़ में जिंदा है। जो दूसरों के लिए सबक है। 
 
सूखे और जल संकट की मार से जूझ रहे बुंदेलखंड में अवैध तरीके से खनन करने वाले लोग भी हैं, तो वहीँ वनों को काटकर मैदान बनाने वाले लोग भी हैं, तो वहीं भैयाराम यादव भी हैं, जो जंगलों को बचाने और पेड़ों को लगाने व् उन्हें सहेजने की क़सम खाये हुए है। अवैध खनन और पेड़ों की कटान से बेजान होते बुंदेलखंड में भैयाराम एक ऐसे शख्स भी हैं, जो पेड़ों को अपने बच्चों की तरह 'पालते' नजर आते हैं। सालों से भैयाराम दिन रात पौधे रोपने और इनकी रखवाली करने में लगे रहते हैं। 
 

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