Forests

सलवा जुडूम के समय में पलायन करने वाले परिवार वापस लौटे

पुलिस के साथ-साथ नक्सलियों के डर से राज्य छोड़ कर लोग अब वापस लौट रहे हैं। 

 
By Ishan Kukreti
Last Updated: Tuesday 30 April 2019
सलवा जुडूम की प्रतीकात्मक तस्वीरें। Photo - wikimedia commons
सलवा जुडूम की प्रतीकात्मक तस्वीरें। Photo - wikimedia commons सलवा जुडूम की प्रतीकात्मक तस्वीरें। Photo - wikimedia commons

छत्तीसगढ़ के सुकमा जिले का मरईगुड़ा गांव छोड़ कर गए लोग वापस लौट रहे हैं। बीते 25 अप्रैल, 2019 को लगभग 24 परिवार वापस लौट आए। ये परिवार लगभग 13 साल पहले गांव से पलायन कर गए थे।

पुलिस के साथ-साथ नक्सलियों के डर से उन्होंने राज्य छोड़ दिया था। उनका पलायन उस समय हुआ, जब नवजात छत्तीसगढ़, सलवा जुडूम की चौकसियों का खामियाजा भुगत रहा था। पिछले 13 वर्षों के दौरान ये परिवार आंध्र प्रदेश के पूर्वी गोदावरी जिले में रह रहे थे और मिर्च के खेतों में खेतिहर मजदूर के रूप में काम करते थे।

पीस प्रोसेस ऑफ बस्तर डायलॉग 1-3 के मुख्य समन्वयक शुभ्रांशु चौधरी ने बताया कि ये परिवारों आंध्र प्रदेश में नए सिरे से कुछ नहीं कर पा रहे थे, क्योंकि उन्हें वहां अनुसूचित जनजातियों (एसटी) की मान्यता प्राप्त नहीं थी। इसलिए इन परिवारों ने वापस लौटने का फैसला किया, क्योंकि पलायन करने से पहले वे अपने गांव में जमीन के मालिक थे और आंध्रप्रदेश में वे भूमिहीन थे। उनके पास वहां पहचान पत्र भी नहीं थे।

हालांकि माओवादी हमलों की वजह से उनका डर गया नहीं है, बावजूद इसके उन्होंने जोखिम लेने का निर्णय लिया। चौधरी बताते हैं कि वे जून से पहले लौटना चाहते थे, ताकि अपनी जमीन तक पहुंच सकें।

सुकमा के कलेक्टर चंदन कुमार ने कहा कि परिवारों की वापसी में कोई प्रशासनिक हस्तक्षेप नहीं है, लेकिन स्थानीय पुलिस को सतर्क कर दिया गया है।

कुमार ने कहा कि उन्हें सूचित किया गया था, जिसके चलते हमने (प्रशासन ने) ग्राम प्रधानों को ग्राम सभा आयोजित करने के लिए कहा है, ताकि विस्थापित लोगों के साथ आपसी समझौते के तहत समुदाय उनके पुनर्वास पर फैसला कर सके।" एक बार जब वे परिवारों को रहने देने के प्रस्ताव पारित कर लेंगे, तब हम हस्तक्षेप करेंगे।

सलवा जुडूम ने 2005 में अपने गठन के तुरंत बाद भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (माओवादी) के खिलाफ लोगों को लामबंद करने के लिए कांग्रेस विधायक महेंद्र कर्मा का समर्थन हासिल किया। इसके बाद जल्द ही तत्कालीन मुख्यमंत्री रमन सिंह ने भी सलवा जुडूम को अपना संरक्षण दे दिया। और आतंक के खिलाफ इसे अपनी महत्वपूर्ण रणनीति का हिस्सा बना लिया।

मध्य प्रदेश से अलग हुए छत्तीसगढ़ में कई आदिवासियों को विशेष पुलिस अधिकारी के रूप में भर्ती किया गया, जिन्हें सलवा जुडूम में शामिल कर लिया गया।

इसके बाद छिड़े संघर्ष के कारण लगभग 70,000 आदिवासियों को अस्थायी शिविरों में स्थानांतरित होना पड़ा। शुभ्रांशु चौधरी का दावा है कि सलवा जुडूम के कारण लगभग 5,000 परिवारों को बस्तर से पलायन करना पड़ा।

यहां यह उल्लेखनीय है कि सुप्रीम कोर्ट ने 2011 में सलवा जुडूम को अवैध मानते हुए इस पर रोक लगाने का आदेश दिया था।

Subscribe to Weekly Newsletter :

Comments are moderated and will be published only after the site moderator’s approval. Please use a genuine email ID and provide your name. Selected comments may also be used in the ‘Letters’ section of the Down To Earth print edition.