Agriculture

नया अध्ययन: सबको खाना उपलब्ध कराने के लिए फास्फोरस का इस्तेमाल जरूरी

एक नए अध्ययन से पता चलता है कि वैश्विक खाद्य सुरक्षा यानी सबको भोजन उपलब्ध कराने के लिए फॉस्फोरस का इस्तेमाल जरूरी है, हालांकि इससे पर्यावरण पर बुरा असर पड़ता है 

 
By Dayanidhi
Last Updated: Thursday 12 September 2019
Photo: GettyImages
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फास्फोरस पौधे और पशु पोषण के लिए एक आवश्यक तत्व है। अधिकांश फास्फोरस का उपयोग नाइट्रोजन-फॉस्फोरस-पोटेशियम (एनपीके) उर्वरकों के प्रमुख घटक के रूप में किया जाता है, जिनका उपयोग दुनिया भर में खाद्य फसलों के लिए किया जाता है। दुनिया मे फॉस्फेट रॉक खनिज, फॉस्फोरस का एकमात्र और महत्वपूर्ण स्रोत है।

मानव और पर्यावरण के लिए समर्पित पत्रिका 'अम्बियो' में प्रकाशित एक नए अध्ययन से पता चला है कि वैश्विक खाद्य सुरक्षा यानी सबको भोजन उपलब्ध कराने के लिए फॉस्फोरस का इस्तेमाल जरूरी है। हालांकि इसकी आपूर्ति श्रृंखला काफी जटिल है, जिसका  पर्यावरण, समाज और अर्थव्यवस्था पर गहरा असर पड़ता है।

दुनिया में खाद्य उत्पादन के लिए प्रतिवर्ष 53 मिलियन टन फॉस्फेट उर्वरकों का उपयोग होता है। जो कि 270 मिलियन टन रॉक -फॉस्फेट के खदान से मिलता है। एक अनुमान के अनुसार खदान से दूसरी जगह तक ले जाने में 90 फीसदी फॉस्फेट का नुकसान हो जाता है। इस नुकसान का एक बड़ा हिस्सा पानी को प्रदूषित करता है, जो कुछ क्षेत्रों को "मृत क्षेत्र" (डेड जोन्स) में बदल देते है, ऐसे क्षेत्रों में समुद्री जीव नहीं रह सकते है। 

संयुक्त राष्ट्र के अनुमान के अनुसार 2050 तक जनसंख्या में 900 करोड़ की वृद्धि होगी, इसके आधर पर देखा जाय तो खाद्य की मांग में 60 फीसदी की वृद्धि होगी। दुनिया भर में जहां लगभग एक अरब लोग कुपोषित हैं और जहां हम उत्पादित सभी खाद्य पदार्थों का लगभग आधा हिस्सा बर्बाद कर देते हैं, इस तरह का रवैया हमारी वैश्विक खाद्य आपूर्ति श्रृंखला और उत्पादन प्रणाली के लिए नई चुनौतियां पैदा करेगा। ऐसे में, खाद्य उत्पादन के लिए फॉस्फेट उर्वरकों की आपूर्ति आवश्यक है, जिनमें से अधिकांश फॉस्फेट रॉक के खनन और प्रसंस्करण (प्रोसेसिंग) से आते हैं। केवल कुछ मुट्ठी भर देश ही फॉस्फेट बाजार में फॉस्फेट रॉक और फॉस्फेट उर्वरकों का उत्पादन और निर्यात करते हैं जिनका इस पर एकाधिकार है।

मोरक्को पर बार-बार पश्चिमी सहारा के स्वदेशी सहरावी लोगों के मानवाधिकारों के उल्लंघन का आरोप लगता रहता है, साथ ही उसने एक क्षेत्र पर कब्जा करके संसाधनों का लाभ उठाने सम्बंधित अंतर्राष्ट्रीय कानून का भी उल्लंघन किया है।

2007-2008 में फास्फोरस का मूल्य बढ़ने के बाद चर्चा में आया और इसके अलग-अलग पहलुओं की ओर लोगों का ध्यान गया। 

खाद्य और कृषि संगठन (एफएओ) की हालिया रिपोर्ट फ़र्टिलाइज़र ट्रेंड्स एंड आउटलुक 2020, बताती है कि कई क्षेत्रों में फॉस्फेट की बहुत कमी है। जिनमें ओशिनिया, मध्य और पश्चिमी यूरोप, दक्षिण एशिया और लैटिन अमेरिका और कैरिबियन शामिल है। यहां 2020 तक आपूर्ति और कुल मांग के बीच की खाई  के और बढ़ने की आशंका है।

भारत में हर वर्ष खेती योग्य भूमि सिकुड़ती जा रही है। एक रिपोर्ट में बताया गया है कि साल 2025 तक यहां की जनसंख्या लगभग 140 करोड़ से अधिक हो जाएगी। यहां 30 करोड़ टन खाद्यान्न की मांग होगी। अतिरिक्त भोजन को पूरा करने के लिए बहुत अधिक अनाज की आवश्यकता होगी, इसी के साथ उर्वरकों फास्फोरस और पोटैशियम की मांग का पूर्वानुमान लगाया गया है। यह 2025 तक लगभग 15 मिलियन टन यार्ड तक पहुंचने की उम्मीद है।

 

फास्फोरस आपूर्ति श्रृंखला जिसमें इसके उत्पादन से लेकर इसकी आपूर्ति तक सामाजिक, पर्यावरणीय, नैतिक और आर्थिक कीमत इससे जुड़ी हुई है। स्टॉकहोम विश्वविद्यालय के शोधकर्ता, एडुआर्ड नेडेलिस्यू  कहते है कि यह उन देशों की भी मदद कर सकता है, जहां फॉस्फेट की कमी है, अधिकांश देश फॉस्फेट आयात पर निर्भर हैं। ये देश अपने कृषि क्षेत्र के जोखिमों को कम करने के लिए बेहतर नीतियां बना सकते हैं।

वैश्विक फॉस्फोरस आपूर्ति श्रृंखला कई पर्यावरणीय और सामाजिक-राजनीतिक बाहरी कारकों से प्रभावित होती हैं। फॉस्फोरस आपूर्ति श्रृंखला के पहलुओं को नीति निर्माताओं, किसानों, उर्वरक कंपनियों, निवेश बैंकों और जनता को सूचित करने में सहायता कर सकते हैं, देश फॉस्फेट रॉक या फॉस्फोरस उर्वरकों की खरीद पर निर्णय ले सकते हैं। वैश्विक नेतृत्व फॉस्फोरस आपूर्ति श्रृंखला के लिए पारदर्शी दृष्टिकोण बना सकते है। फॉस्फोरस के कारण होने वाले नुकसान को श्रृंखला में शामिल कर सभी हितधारकों द्वारा जवाबदेही तय की जानी चाहिए, जिसमें कृषि, कचरा प्रबंधन, नवीनीकरण, प्रदूषण नियंत्रण और मानवाधिकार संरक्षण जैसे विभिन्न क्षेत्रों में नीति निर्माताओं को बेहतर तरीके से सूचित किया जा सकता है।

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