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भूजल नीति : खारे पानी की निकासी के लिए उद्योग और परियोजनाओं का शुल्क माफ

सीजीडब्ल्यूबी की छूट भू-गर्भ से खारे पानी के निकासी को गति देगा, लेकिन ईकाइयों के जरिए यदि यह खारा पानी बिना योजना के जस का तस बहाया गया तो पर्यावरण को नुकसान भी संभव है। 

By Vivek Mishra

On: Monday 30 November 2020
 

देश में 24 सितंबर, 2020 को भू-जल निकासी नीति को जारी किए जाने के करीब दो महीने बाद अब केंद्रीय भू-जल प्राधिकरण बोर्ड (सीजीडब्ल्यूबी) ने उन औद्योगिक ईकाइयों, खनन परियोजनाओं और ऐसी सरंचनाएं जो खारा पानी निकालना चाहती हैं, उनके लिए 6 नवंबर, 2020 को गाइडलाइन जारी कर दी है। इस गाइडलाइन के मुताबिक ग्राउंड वाटर के तहत खारा पानी निकालने की इच्छा रखने वाली औद्योगिक ईकाइयों को किसी भी तरह का भू-जल दोहन या पुनरुद्धार का शुल्क नहीं देना होगा। 

यदि खारे पानी का इस्तेमाल सही से नहीं किया जाता है और डिस्चार्ज बिना शोधन के ही होता है तो यह पर्यावरण के लिए बड़ा संकट है। खासतौर से खारे पानी की वजह से सतह पर काफी नुकसान हो सकता है। खारे पानी की निकासी करने वाली ईकाइयों के लिए छूट में कई शर्तें भी शामिल हैं लेकिन इन पर अमल और निगरानी कैसे होगी यह सवाल अभी अनुत्तरित है।  

केंद्रीय भू-जल प्राधिकरण बोर्ड ने 24 सितंबर, 2020 को जारी अपनी गाइडलाइन में कहा था कि भू-जल निकासी के तहत खारे पानी को जमीन के भीतर से निकालने के लिए प्रोत्साहित किया जाएगा, हालांकि पर्यावरण प्रदूषित न हो इसका भी ध्यान रखा जाएगा। 

सीजीडब्ल्यूए के मुताबिक 2011 में किए गए ग्राउंट वाटर रिसोर्स के आकलन के मुताबिक कुल 6607 स्थानों ( ब्लॉक, मंडल, तालुका, जिले) में से 1071 अति-दोहित, 217 गंभीर और 697 अर्ध-गंभीर व 4580 सुरक्षित स्थान हैं। हालांकि देश में 92 यूनिट्स यानी स्थानों की पहचान ऐसी है जो सेलाइन यानी खारे पानी वाले हैं। 

ऐसा पानी जिसमें 25 डिग्री सेल्सियस पर विद्ययुत चालकता (ईसी) 5000 माइक्रोसाइमंस हो वह खारा पानी कहलाता है। भू-गर्भ से खारे पानी की निकासी को लेकर जारी गाइडलाइन में कहा गया है कि सभी ईकाइयों को उचित प्रवाह (इफ्लुएंट ) निपटान योजना तैयार करना होगा ताकि पर्यावरण और आस-पास के क्षेत्रों को नुकसान न हो। वहीं, भू-जल के अति-दोहित  (ओवर एक्सपलॉएटेड) जगहों पर नई प्रमुख ईकाइयों को अनापत्ति प्रमाण पत्र (एनओसी) नहीं दिया जाएगा। 

6 नवंबर, 2020 को भू-गर्भ से दोहन को लेकर जारी की ताजी गाइडलाइन में पूरी तरह से खारे पानी वाले स्थानों के लिए तय की गई शर्तों में कहा गया है कि जहां 500 (केएलडी) किलोलीटर प्रतिदिन से अधिक खारे पानी  की भू-जल निकासी होती है वहां प्रभाव आकलन रिपोर्ट भी देनी होगी। रिपोर्ट में जल गुणवत्ता और भू-गर्भ जल गुणवत्ता की जांच एनएबीएल से प्रमाणित प्रयोगशाला या सरकारी प्रयोगशाला से हासिल रिपोर्ट को ही देना होगा। तेल और खनन कंपनियों को खारे पानी की निकासी या डीवाटरिंग करने के लिए सरकारी एजेंसियों और प्राधिकरणों से मंजूर प्लान को देना होगा। 

इसके अलावा ऐसे स्थान जहां आंशिक तौर पर खारा पानी है वहां 100 केएलडी से ज्यादा खारा पानी की निकासी करने वालों को प्रभाव आकलन रिपोर्ट देना होगा।  पानी निकासी की निगरानी के लिए पीजोमीटर भी लगाना होगा। वहीं, यदि किसी भी तरह से खारे पानी की जगह ताजा पानी बाहर आता है तो उसे सीजीडब्ल्यूबी के क्षेत्रीय कार्यालय को सूचित करना होगा और उसे ताजे पानी के लिए तय किए गए शुल्क को भरना भी होगा। इस क्षेत्र में खारे पानी की निकासी करने वालों को उपभवन नियम के मुताबिक रेन वाटर हार्वेस्टिंग सिस्टम भी लगाना होगा। 

खारे पानी की निकासी के लिए सभी तरह की गहराई पर यह सशर्त छूट लागू होगी।