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परंपरा की उपेक्षा से प्यासी मरुभूमि

गुजरात के थार में भूजल तेजी से गिरता जा रहा है और तालाब बदहाली के दौर से गुजर रहे हैं

On: Tuesday 22 January 2019
 
हमीरसर जलाशय
भुज शहर के लिए पहले हमीरसर जलाशय पानी का सबसे महत्वपूर्ण स्त्रोत हुआ करता था। लाखी पहाड़ियों से निकली नहरें इसमें पानी लाती थीं। हमीरसर के चलते ही भुज शहर में भूजल का स्तर ठीक था। (फोटो: गणेश पंगारे / सीएसई) भुज शहर के लिए पहले हमीरसर जलाशय पानी का सबसे महत्वपूर्ण स्त्रोत हुआ करता था। लाखी पहाड़ियों से निकली नहरें इसमें पानी लाती थीं। हमीरसर के चलते ही भुज शहर में भूजल का स्तर ठीक था। (फोटो: गणेश पंगारे / सीएसई)

गुजरात के थार मरुक्षेत्र वाले इलाके के शहरों में पारंपरिक जल संचय प्रणालियां नष्ट होती जा रही हैं और ये शहर पानी की अपनी बढ़ती जरूरतों के लिए दिन-ब-दिन भूजल के स्त्रोतों पर आश्रित होते जा रहे हैं। प्रायः सभी शहरों में भूजल का स्तर बहुत तेजी से गिर रहा है और भविष्य बहुत ही सूखा नजर आता है।

भुज

कच्छ जिले का भुज शहर पहले चारदीवारी से घिरा था, पर आज इस दीवार के अवशेष भर जहां-तहां दिखते हैं। कभी यहां तीन बड़े जलाशय थे- हमीरसर, देसलसर (सबसे बड़ा) और प्रागसर। अब प्रागसर नहीं बचा है। यह जलाशय भर दिया गया है और यह जगह वायु सेना के कब्जे में है। देसलसर उपेक्षित पड़ा है। इसमें अब सिर्फ भैंसें नहाती हैं और यहां कपड़े धोए जाते हैं।

हमीरसर पहले भुज के लिए सबसे महत्वपूर्ण जल स्त्रोत था। लाखी पहाड़ियों से निकलने वाली मुख्य नहर का पानी इसमें आता था। छोटे सोते भी आकर इसी मुख्य नहर से मिलते थे। हमीरसर के चलते भुज में भूजल का स्तर भी अच्छा रहा करता था। जलाशय के चारों और कुंए बने थे, जिनका मीठा पानी पीने और अन्य कामों में प्रयोग होता था। यहां से बैलगाड़ियों या ऊंट गाड़ियों में पानी भरकर दूरदराज के घरों तक ले जाया जाता था। हमीरसर के आसपास बने अनेक मकानों के अहातों में भी कुएं खुदे थे।

जब हमीरसर भर जाता था तब इससे निकला पानी जाकर रूद्रमाता नदी में गिरता था। जब हमीरसर भरकर उफनता था तो शहर के लोगों के लिए यह खुश होने की बात थी। राजा तब छुट्टी घाषित करते थे और पूजा किया करते थे। पर यह स्थिति कई वर्षों के बाद आती थी। अतः सारे राजाओं को पूजा करने का अवसर नहीं मिला। पूजा की प्रबल उत्कंठा वाले एक शासक ने तो तंग आकर इसकी एक दीवार तोड़ डालने का आदेश दिया कि उधर से बहने वाले पानी को उफान मानकर वह पूजा कर ले। इस अकेली मूर्खता ने हमीरसर का वजूद ही संकट में डाल दिया। अब यह जलाशय बहुत जल्दी सूख जाता है।

आज नहर की देखरेख भी नहीं की जाती। शहर के कुछ हिस्सों में गंदे नाले भी नहर में गिरते हैं और लोग जलाशय में अपने जानवरों को नहलाते हैं और कपड़े धोते हैं। पहले ये सब एकदम मना था। अब पर्यटन को बढ़ावा देने के लिए जलाशय में मोटरबोट चलती हैं। हमीरसर का पानी प्रदूषित हो चुका है और मछलियां मर चुकी हैं। अब यह भी समाप्त हो जाने की राह पर है।

1988-89 में भुज की अनुमानित आबादी एक लाख थी। नगर निगम टोटी वाले पानी की आपूर्ति करता है। चूंकि अब सतह के ऊपर का जल संचित नहीं होता, इसलिए पानी की पूरी जरूरत भूजल को खींचकर ही पूरी की जा रही है। भुज से 6 किमी. दूर टाक्केश्वरी में 1969 में पहला नलकूप गाड़कर यहां पाइप वाले पानी की आपूर्ति शुरू की गई। आज यहां रोज 70 लाख लीटर पानी की आपूर्ति की जा रही है जो भुज और कुकमा के बीच गांधीधाम राजमार्ग के किनारे गड़े नौ नलकूपों से लिया जाता है। भुज नगर निगम कुकमा और भूजाडी गांवों को भी पाइप वाले पानी की आपूर्ति करता है। अपने गांव की जमीन से पानी देने के एवज में इन गांववालों ने यह व्यवस्था अपने यहां कराई है।

इन नलकूपों के अलावा हमीरसर के पास खुदे तीन कुएं भी सार्वजनिक जरूरतों को पूरा करते हैं। इन्हीं कुओं से सेना और सीमा सुरक्षा बल की टंकियां भी भरी जाती हैं।

बनासकंठा जिले के पालनपुर की एक बावड़ी

अंजार

कच्छ जिले का एक अन्य प्रमुख शहर है अंजार, जो भुज-गांधीधाम राजमार्ग पर स्थित है। 1971 में नल वाला जलापूर्ति शुरू होने से पहले यहां की पानी संबंधी जरूरतें कुओं से ही पूरी होती थीं। यहां सिधसर नामक एक बड़ा तालाब भी था, आज इसका नामोनिशान नहीं है। इस तालाब को सरकारी सूखा राहत कार्यक्रम के तहत बेवकूफी के चलते नष्ट कर दिया गया। इसकी गाद निकालते-निकालते इसके तल की वह मिट्टर भी निकाल दी गई जो पानी को ऊपर रोकती थी। इस खुदाई के बाद तालाब बहुत कम समय में ही सूखने लगा।

1988-89 में अंजार की आबादी 50,000 के करीब थी और शहर को रोज 17 लाख गैलन पानी की जरूरत पड़ती थी। नगर पालिका सिर्फ 15 लाख गैलन पानी ही दे पाती थी। 1971 में नलों के आने के पहले यहां भूजल का स्तर 30 मीटर के करीब था। आज यह 60 मीटर नीचे पहुंच गया है। अंजार की समस्याएं कांदला बंदरगाह और गांधीधाम परिसर को पानी देने के जिम्मे से और भी बढ़ गई हैं।

पालनपुर

बनासकंठा जिले का मुख्यालय है पालनपुर। हीरे तराशने और चमकाने के काम के लिए प्रसिद्ध इस शहर की आबादी 1988-89 में करीब एक लाख थी। इस शहर में मानसरोवर नामक एक विशाल तालाब है जो गर्मियों में पूरा सूख जाता है, लेकिन बरसात के समय भर जाता है। यहां मीठी वाव नामक एक बड़ी बावड़ी भी है। इसकी सीढ़ियां तो अब पानी के अंदर नहीं आतीं, पानी का स्तर अब उनसे नीचे ही रहता है और सीढ़ियों पर कचरा भरा रहता है। शहर में अनेक कुएं भी हैं।

पालनपुर शहर को रोज करीब 60 लाख लीटर पानी चाहिए, जबकि जलापूर्ति सिर्फ 50 लाख लीटर की ही है और यह पूरा भूजल ही होता है। शहर के आसपास के इलाकों में इसके लिए 15 नलकूप गाड़े गए हैं। अब शहर में भूजल के ऊपर वाली कोई ऐसी जल संचय व्यवस्था नहीं रह गई है जिसमें साल भर पानी उपलब्ध रहे। भूजल के अधिक दोहन से उसका स्तर गिरकर 50 मीटर तक पहुंच गया है। अब शहर की बढ़ती जरूरतों के लिए पानी कहां से आएगा, यह कोई नहीं जानता।



जामनगर

भीड़भाड़ और अत्यधिक सक्रियता भरे जामनगर शहर के बीच में जाम रणमल द्वारा बनवाई गई रणमल झील एक शांत, स्वच्छ, सुंदर अभयारण जैसा है। यह करीब 60 किस्म के पक्षियों का बसेरा है। 1984 में यहां प्रसिद्ध पक्षीप्रेमी स्व. सालिम अली आए थे और यहां से वापस लौटकर उन्होंने लिखा कि इस झील को बचाना बहुत जरूरी है। जामनगर की खूबसूरती में चार चांद लगाने के साथ ही यह झील इसके भूजल के स्तर की पहरेदार है और शहर की शीतलता भी बनाए रखती है।

जब जामनगर रियासत खत्म हो गई तो यह झील भी उपेक्षित हो गई। आज भी इसका भविष्य अंधकार की गर्त में ही है। आज पास में बनने वाली इमारतें सचमुच इस झील को निगलती जा रही हैं। कुछ वर्ष पहले बनी एक सड़क ने झील को दो भागों में बांट दिया, जिन्हें अब अगला और पिछला तालाब कहा जाने लगा है। इसके एक छोटे हिस्से को भरकर वहां बस पड़ाव और काॅलोनी बसाई गई है। प्रकृति प्रेमियों के शोर मचाने पर एक अन्य बड़ी इमारत का बनना रुका। पर आज भी रोज इस झील की जगह पर बसाने के प्रस्ताव एक या दूसरे रूप में आते ही रहते हैं। पर इस झील के लिए सबसे बड़ा खतरा शहर की बढ़ती आबादी है। आसपास की काॅलोनियों का सारा गंदा पानी इसमें आने लगा है। सरकारी वाहनों और निजी आटोरिक्शा के वर्कशाप इसके किनारे हैं, जो सारा कचरा इसी के हवाले करते हैं। हरमुक ध्रुव जैसे पर्यावरणवादियों के शोर मचाने के बाद नगर निगम ने झील के संरक्षण पर ध्यान देना शुरू किया है।

(“बूंदों की संस्कृति” पुस्तक से साभार)