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अंग्रेजों की नीति पर चलने से तबाह हुए तालाब

आंध्र प्रदेश में कभी तालाबों से सिंचाई होती थी लेकिन सरकारी उपेक्षा और बड़ी परियोजनाओं ने इन्हें बदहाल कर दिया

On: Monday 07 September 2020
 
तबाह हुए तालाब
1960 के दशक तक आंध्र प्रदेश में पारंपरिक तालाब ही खेतों को सींचने के मुख्य साधन थे। पर अब तालाबों की संख्या में मामूली वृद्धि के बावजूद सिंचित क्षेत्र घटा है 1960 के दशक तक आंध्र प्रदेश में पारंपरिक तालाब ही खेतों को सींचने के मुख्य साधन थे। पर अब तालाबों की संख्या में मामूली वृद्धि के बावजूद सिंचित क्षेत्र घटा है

आंध्र प्रदेश के कई जिले लगातार सूखे का दंश झेलते रहे हैं। यहां युगों से तालाब ही पानी के मुख्य स्त्रोत रहे हैं। प्रथम पंचवर्षीय योजना की समाप्ति के समय आंध्र में 58,518 तालाब थे और राज्य का 40 फीसदी क्षेत्र यानी 10.7 लाख हेक्टेयर सिंचित था। एक साथ कई तालाबों की श्रृंखला बनाई जाती थी ताकि पानी बर्बाद न हो। जलाशय से पानी रिसकर भूमिगत जल भंडार को बढ़ाता था। तालाब को सिंचाई का मुख्य स्त्रोत बनाने के लिए संस्थागत प्रणाली विकसित की गई थी।

यह पंरपरा 1960 के दशक के मध्य तक जारी रही। उसके बाद तालाबों की संख्या तो बढ़ी, मगर उनसे सिंचित क्षेत्र सिकुड़ता गया। सूखे की आशंका वाले क्षेत्रों में स्थिति और विकट है। कुछ जिलों में तो तालाबों की संख्या भी घटी है और उनसे सिंचित क्षेत्रफल भी।

ऐतिहासिक कारक

1950 के बाद के दशकों में तालाब से सिंचाई की व्यवस्था ढीली पड़ी है तो इसकी वजह यह है कि अंग्रेजी राज के शुरू में बनी नीति जारी रखी गई। यह नीति इस धारणा पर आधारित थी कि सिंचाई की छोटी प्रणालियां आर्थिक रूप से हानिकर और राजस्व अधिकारियों पर अनावश्यक बोझ होती है। यह धारणा दक्षिण भारत मे तालाब द्वारा सिंचाई की स्थानीय रूप से संचालित प्रणालियों की लंबी उपेक्षा के कारण बनी थी। इस उपेक्षा के पीछे कारण था- रैयतवाड़ी या जमींदारी के प्रति बंटाईदारी व्यवस्था में परिवर्तन। तीस के दशक में दक्षिण भारत में सिंचाई व्यवस्था में हुए विकास के बारे में टी. रंगाराव ने लिखा, “अंग्रेजी राज के शुरू के दिनों में यह अपेक्षा की जाती थी कि सिंचाई के भी साधनों का रखरखाव ग्रामीण समुदाय करेंगे और सरकार को कुछ खर्च नहीं करना पड़ेगा। लेकिन प्रेसिडेंसी की राजस्व व्यवस्था जिस तरह खेती के विभिन्न चरणों और गांव के पट्टे या किराए की व्यवस्था की स्थायी बंदोबस्ती तथा रैयतवाड़ी व्यवस्था पर तय होती थी, उससे पूरा ग्रामीण समुदाय और सामुदायिक श्रम व्यवस्था हिल गई है।”

अंग्रेजी शासकों ने 1858 में जब भारत की बागडोर हथिया ली तब सबसे पहले जो समस्या उनके सामने आई, वह थी तालाबों की बदहाली की। 1862 में मद्रास प्रेसिडेंसी के राजस्व बोर्ड ने इस समस्या का एक नायाब समाधान निकाला। उसने तालाबों का नियंत्रण रैयतों को देने का फैसला किया। इनमें वे तालाब भी थे जिनसे 10 कनी (5.26 हेक्टेयर) से भी कम क्षेत्र की सिंचाई होती थी और जिनसे पिछले पांच वर्षों के कुल कर निर्धारण के 35 फीसदी से भी कम राजस्व मिलता था। इस प्रस्ताव का एक दिलचस्प पहलू यह था कि खस्ताहाल तालाबों की मरम्मत की समस्या से निबटने के लिए 5.26 हेक्टेयर से कम की सिंचाई करने वाले छोटे तालाबों को भी खस्ताहाल तालाबों के बराबर मान लिया गया। लेकिन कोई भी तालाबों का जिम्मा लेने के लिए आगे नहीं आया तो राजस्व बोर्ड ने प्रस्ताव को रद्द कर दिया।

फिर मई 1880 में मद्रास प्रेसिडेंसी के लोक निर्माण विभाग ने प्रस्ताव रखा कि 4.05 हेक्टेयर से कम ही सिंचाई करने वाले तालाबों को रैयतों के जिम्मे कर दिया जाए और 4.05 से 20.25 हेक्टेयर और 20.25 से 81 हेक्टेयर तक सिंचाई करने वाले तालाबों के रखरखाव का जिम्मा ग्रामीण समुदाय को दे दिया जाए। इसके साथ ही रैयतों को लगान में थोड़ी छूट और ग्रामीणों को लगान में छूट के साथ-साथ पांच वर्षों के लिए थोड़ा अनुदान भी दिया जाए। इस प्रस्ताव का कलक्टरों ने भारी विरोध किया। वे खासकर 4.05 हेक्टेयर से कम की सिंचाई करने वाले तालाबों की पूरी उपेक्षा का विरोध कर रहे थे। बोर्ड का फिर अपने कदम वापस खींचने पड़े।

मद्रास प्रेसिडेंसी ने तालाबों की मरम्मत के लिए भारत सरकार से 1891 में सहायता मांगी। सरकार ने पूर्ण प्रस्ताव पेश कर दिया कि वह 20.25 हेक्टेयर से ऊपर की सिंचाई करने वाले तालाबों की मरम्मत करे, बाकी को खारिज कर दे। जब मद्रास प्रेसिडेंसी ने कलक्टरों से पूछा कि 20.25 हेक्टेयर से कम की सिंचाई करने वाले तालाबों को खारिज करने से कितना वि़त्तीय घाटा होगा तो कलक्टरों ने प्रस्ताव का भारी विरोध किया। नेल्लोर के कलक्टर सी.डी. मैक्लीन ने लिखा, “छोटे तालाब का पानी रिसकर कुओं को भरता है। वे तालाब आसपास के क्षेत्र को उर्वर रखते हैं और हरियाली बनाए रखते हैं। वे मनुष्य तथा मवेशी को पानी मुहैया कराते हैं। वे छोटे पोखरों और नहरों के जाल को खुला रखते हैं, पानी को जमा रखते हैं और आमतौर पर पानी का बंटवारा करते हैं ताकि बड़े तालाब में दरार न पड़े। सिंचाई के साधन के रूप में इन पर काफी कम खर्च होता है।”

दूसरे कलक्टर कोल ने लिखा, “छोटे तालाबों के निर्माण पर सरकार का कोई खर्च नहीं हुआ है। वे ब्रिटिश राज से पहले से मौजूद हैं और उनकी मरम्मत पर बहुत थोड़ा ही खर्च होता है। एक बार मरम्मत के बाद वे बड़े तालाबों से ज्यादा समय तक ठीक रहते हैं। ऐसे अधिकतर तालाब उन पट्टियों में हैं जहां पानी का अभाव है। उनके नष्ट होने से लोग तबाह हो जाएंगे और वे पट्टियां भी। सरकार को इस बात के लिए दोषी तो ठहराया ही जाएगा कि उसने तालाबों की उपेक्षा करके उनकी जमीन को बर्वाद होने दिया।”

राजस्व बोर्ड एक बार फिर कलक्टरों के आगे झुक गया और उसने 20.25 हेक्टेयर से कम की सिंचाई करने वाले तालाबों को खारिज न करने का फैसला किया। इस फैसले के कारण उसे भारत सरकार की नाराजगी झेलनी पड़ी। सरकार ने प्रेसिडेंसी में तालाबों की मरम्मत के लिए पैसा देना बंद कर दिया।

1880 के अकाल आयोग ने तालाबों के महत्व को साफ तौर पर स्वीकारते हुए सुझाव दिया था कि उनकी मरम्मत के ठोस उपाय किए जाएं। इसके बावजूद भारत सरकार ने छोटे तालाबों के रखरखाव की जिम्मेदारी से हाथ खींच लेने का प्रस्ताव आगे बढ़ाया था। अकाल आयोग ने मद्रास प्रेसिडेंसी में छोटी सिंचाई प्रणालियों की समृद्ध विरासत की ओर भी ध्यान आकृष्ट करते हुए कहा था, “भारत में दूसरी जगहों पर तो तालाब या तो बनवाने पड़े या उन्हें पुनर्जीवित करना पड़ा, मगर यहां तो वे ब्रिटिश राज के शुरू से ही पूरी उपयोग में थे। फिर भी हमारे विचार से इस प्रेसिडेंसी में इस मामले को उस तरह नहीं निबटाया गया है, जितनी अहमियत की यह मांग करता है।”

आजादी के बाद

छोटे तालाब अलाभकर हैं और उनका रखरखाव सरकार पर अनावश्यक बोझ है, यह धारणा बनी रही और आजादी के बाद और भी पुष्ट हुई। जोर बहुपयोगी नदी घाटी परियोजनाओं पर दिया जाने लगा। लघु सिंचाई की, खासकर सूखा क्षेत्रों में, उपेक्षा की गई। दरअसल, ज्यादा अन्न उपजाओ अभियान में लोगों को तालाबों के तल में खेती की इजाजत देकर लघु प्रणालियों को अपूरणीय क्षति पहंुचाई गई।

उपनिवेशवाद-बाद के काल में लघु सिंचाई परियोजनाओं की पहली महत्वपूर्ण पड़ताल 1967-68 में की गई, जब आंध्र प्रदेश विधानसभा की आकलन समिति ने ऐसी परियोजनाओं और जल निकासी प्रणालियों की जांच की। इसकी रिपोर्ट इस उपनिवेशवादी धारणा के जारी रहने की पुष्टि करती है कि छोटी प्रणालियां सरकार पर बोझ थीं और उनकी उपेक्षा इसलिए हुई क्योंकि लोग कुंडी मरम्मत (श्रमदान) करने में विफल रहे। समिति का विचार था, “कुम्मकी कुंटा या पूरक नहरों, जो छोटे तालाबों को भरती हैं, की मरम्मत की जरूरत है। आमतौर पर कानूनन आपूर्ति नहरों की मरम्मत के लिए श्रमदान में अयाकुटदार को भाग लेना पड़ता है। चूंकि रैयत गरीब हैं, इसलिए पूरक नहर या कुम्मकी कुंटा खस्ताहाल है।”

सरकार को तालाबों की उपेक्षा के दोष से बरी करते हुए समिति ने कहा, “4.05 हेक्टेयर से ज्यादा की सिंचाई करने में अक्षम तालाबों को उस सरकारी सूची से निकाला जाना चाहिए, जिसमें मरम्मत किए जाने वाले तालाबों के नाम हैं क्योंकि उन छोटे तालाबों पर पैसा खर्च करना मुनासिब नहीं।”

दक्षिण भारत में तालाब से सिंचाई की व्यवस्था के पतन को रोकने की उम्मीद जगाने वाला एक कार्यक्रम था-तालाब पुनर्वास योजना। यह कार्यक्रम 1883 में संयुक्त मद्रास प्रांत में शुरू किया गया था। इसके तहत काम किसी तात्कालिक दबाव की वजह से नहीं, बल्कि तालाबों की पूरी श्रृंखला में सुधार, जल संग्रह की क्षमता में वृद्धि और इस तरह सिंचित क्षेत्र तथा भू-राजस्व में वृद्धि के व्यापक कार्यक्रम के तहत शुरू करने की योजना थी। कार्यक्रम का लक्ष्य था-प्रेसिडेंसी के सभी तालाबों की पूरी क्षमता बहाल करने के लिए मरम्मत के मानक तैयार करना और तय मानकों के अनुसार उनकी देखभाल के लिए उन्हें उपयुक्त अधिकारियों को सौपना। लेकिन यह कार्यक्रम पैसे के आवंटन में रुकावटों की वजह से इतिहास का सबसे लम्बा कार्यक्रम बन गया। तेलंगाना क्षेत्र में 1955-56 में 32,980 तालाब थे और आंध्र क्षेत्र में 25,547। पूर्व जमींदारों से अधिग्रहित 13,000 नए तालाबों को छोड़ आंध्र क्षेत्र के सभी तालाबों को मद्रास प्रेसिडेंसी के उपरोक्त कार्यक्रम के मानकों के अनुरूप बनाया गया था, जबकि तेलंगाना के 6,000 तालाबों को इसके अनुरूप बनाया गया और बाकी 27,000 तालाबों की मरम्मत की जानी थी। आंध्र प्रदेश की लघु सिंचाई प्रणालियों पर खोसला समिति की रिपोटे में जोरदार सिफारिश की गई थी कि आंध्र प्रदेश के पुराने तालाबों को पुनः उपयोगी बनाने के मास्टरप्लान पर पूरा अमल तीसरी पंचवर्षीय योजना में ही कर लिया जाए। लेकिन पहली तीन पंचवर्षीय योजनाओं में 5.02 करोड़ रुपए की लागत से केवल 8.442 तालाबों को पुनः उपयोगी बनाया जा सका।

नियोजित विकास के दौर में भी तालाबों की मरम्मत की योजना में वित्तीय अड़चनें आती रहीं। इस योजना के तहत खर्च की सीमा अयाकट के प्रति एकड़ पर 350 रुपए तय की गई। 1967-68 में लघु सिंचाई का आकलन करने वाली आकलन समिति ने तालाबों की मरम्मत के लिए पर्याप्त संसाधन जुटाने की सिफारिश करने की जगह उसे घातक क्षति ही पहुंचाई। समिति ने कहा, “ऐसे छोटे स्त्रोतों के रखरखाव या जीर्णोंद्धार पर पिछले वर्षों में जो रकम खर्च की गई उसका ठोस परिणाम नहीं आया। न तो वित्तीय लाभ के रूप में और न ही नए साधन के विकास के रूप में। इन स्त्रोतों के जीर्णोंद्धार के लिए समितियों के पास जो प्रस्ताव पड़े हैं, उनके लिए भारी रकम की जरूरत पड़ेगी जिससे न तो किसानों को लाभ होगा, न सरकार को। जो नतीजे हासिल करने की संभावनाएं बताई गई हैं उनके लिहाज से अनुमानित खर्चे बहुत ज्यादा हैं। इन स्त्रोतों की जमीन को शुष्क जमीन मानकर उन पर करों की दर बदली जा सकती है। इन स्त्रोतों के रखरखाव की जिम्मेदारी पहरेदारों को सौंपी जा सकतती है। हैदराबाद निजाम के दस्तीबाद तालाबों की तरह उनके लिए भी आवश्यक कानून बनाए जा सकते हैं।”

तालाबों के प्रति विधायकों के रुख में इस औपनिवेशक मानसिकता की बू और नेता-ठेकेदार-इंजीनियर त्रिमूर्ति की छोटे कामों के प्रति उपेक्षा के चलते तालाबों का पतन तो तय ही था। इसके अलावा वित्तीय व तकनीकी कारणों ने भी इसमें अपना योगदान दिया।



पैसे की तंगी

तालाबों के पतन में वित्तीय अड़चनें भी बड़ा कारण रहीं। राज्य में 1959-60 और 1982-83 के बीच सिंचाई की बड़ी व मझोली परियोजनाओं पर कुल योजना और गैर-योजना खर्च 1,186 करोड़ रुपए था। लेकिन तालाबों से सिंचाई के लिए पर्याप्त संसाधन मुश्किल से जुटाए जा रहे थे। तालाबों के रखरखाव का खर्च जुलाई 1966 तक 1.50 रुपए प्रति एकड़ था। तब तालाबों और तालाबों से सिंचाई की बदहाली देख सरकार ने मजबूरन इसे 3.50 रुपए प्रति एकड़ किया। लेकिन तब तक घुन लग चुका था। 1974 के बाद से इस दर में परिवर्तन और 1984 में यह 20 रुपए प्रति एकड़ हो जाने के बावजूद पतन को रोका नहीं जा सका। आवंटन में बढ़ोतरी का अधिकांश भाग व्यवस्था संबंधी खर्चों में वृद्धि के लिए भी पूरा नहीं पड़ता था। तालाबों से सिंचाई की भारी उपेक्षा होती रही और अब तो उसके लिए संस्थागत समर्थन भी लुप्त हो गया है। 1973-74 के बाद से सूखे वाले क्षेत्रों में तालाबों पर खर्च में वृद्धि के बावजूद तालाबों से सिंचित क्षेत्र पर कोई असर नहीं पड़ा है, बल्कि सभी जिलों में यह क्षेत्र घटता ही गया है।

तालाबों में पानी के संरक्षण पर योजनागत परियोजनाओं के लिए बनी समिति (1960) ने दो महत्वपूर्ण प्रस्ताव किए। एक पानी के वाष्पीकरण से संबंधित था और दूसरा प्रस्वेदन से होने वाली कमी को रोकने से संबंधित। राज्य के 4,185 तालाबों के अध्ययन पर आधारित रिपोर्ट में बताया गया कि इनका सिंचित क्षेत्र 1.6 लाख हेक्टेयर है और खुद इन्होंने 1.24 लाख हेक्टेयर जमीन घेर रखी है। सिंचित क्षेत्र और तालाब के क्षेत्र का अनुपात 1.3ः1 है। बाद के एक अध्ययन में यह अनुपात 1.2ः1 दिखाया गया और बताया गया कि बड़े तालाबों के लिए यह अनुपात और बढ़ सकता है। समिति का मानना था कि वास्तविक सिंचित क्षेत्र इससे कम है, इसलिए इस अनुपात को 1 हेक्टेयर:1 हेक्टेयर माना जा सकता है। राज्य में तापक्रम में परिवर्तनों का हिसाब लेते हुए वाष्पीकरण से हानि 115-385 सेमी. तक आंकी गई। समिति का मानना था कि सीटाइल अल्कोहल यौगिक वाष्पीकरण में 60 प्रतिशत कटौती की जा सकती है। उसने तालाब में पानी के संरक्षण के लिए सस्ते उपायों के शोध की सिफारिश भी की। डूबक्षेत्र को कम करने के लिए समिति ने गाद की सफाई और जमीन के सुधार के कार्यक्रम चलाने का सुझाव दिया। प्रस्वेदन के लिए उसने खरपतवार की वृद्धि को रोकने और पानी को बर्बादी से बचाने के सुझाव दिए। आंध्र प्रदेश ने इन सुझाओं पर कुछ किया हो, इसका कोई प्रमाण नहीं मिलता, सिवाय इसके कि उसने 1955-56 में छह विशेष तालाबों से मिट्टी सफाई और भूमि उद्धार के काम कराए थे।

तकनीकी और संस्थागत बदलाव

आंध्र प्रदेश के सूखा क्षेत्रों के अधिकतर तालाब 40 हेक्टेयर से कम की ही सिंचाई करते हैं। कर्नूल और अनंतपुर में 1955-56 से 1986-89 के बीच तालाबों की संख्या घटी हैं। चित्तूर, कुड्डपा, महबूबनगर और नालगोंडा में उनकी संख्या वही हे। प्रकाशम और रंगारेड्डी जिलों को छोड़ दिया गया है, क्योंकि वे नए हैं। तालाबों की संख्या में परिवर्तन एकपक्षीय नहीं है, बल्कि सूखा क्षेत्रों में तालाबों से सिंचित क्षेत्र सिकुड़ता गया है। यह पूरे राज्य में देखा गया है, लेकिन सूखा क्षेत्रों में गिरावट ज्यादा है। इससे तालाबों की बदहाली का पता चलता है। 1959 और 1989 के बीच बारिश के स्वरूप में परिवर्तन नहीं आया है, लेकिन सूखा क्षेत्र में तालाब से सिंचित क्षेत्र में 1959-62 के बीच 23-56 प्रतिशत कमी आई और 1986-89 में 9-33 प्रतिशत कमी आई। इसी अवधि में कुओं से सिंचित क्षेत्र में 8-29 प्रतिशत से लेकर 19-69 प्रतिशत की वृद्धि हुई। अलग-अलग जिले में तालाब से सिंचित क्षेत्र में बदलाव का 30-57 प्रतिशत था। कुड्डपा में कुओं से सिंचित क्षेत्र में 121 प्रतिशत की दर से वृद्धि हुई तो कर्नूल में 355 प्रतिशत की दर से। तालाब से सिंचाई में कमी में तेजी साठ दशक के मध्य में आई। 1965 के बाद कुओं से सिंचाई बाकी स्त्रोतों से सिंचाई के मुकाबले सबसे ज्यादा हो गई। यह इस क्षेत्र के पारिस्थितिकीय संतुलन के लिए हानिकार है। वास्तव में इस असंतुलन के कारण कई सूखा क्षेत्रों में भूजल का दोहन अपनी चरम अवस्था पर पहुंच गया है।

आंध्र प्रदेश में कुडिमरमथ या दासबंदम जैसी ग्रामीण संस्थाएं आजादी मिलने तक लुप्त हो चुकी थीं, जबकि दक्षिण भारत की दूसरी जगहों पर ये किसी-न-किसी रूप में बनी रहीं। छोटी सिंचाई प्रणालियों को बड़े पैमाने पर निजी जमीन में बदल दिया गया। साठ के दशक के शुरू से कुओं से सिंचाई में भारी वृद्धि हुई, क्योंकि ऋण सुविधाएं और कम दर पर बिजली उपलब्ध थी। इस बदलाव को भूमि, बल्कि निजी भूमि में भूजल के निजीकरण से ही नहीं, बल्कि पानी खींचने की तकनीक में सुधार से भी मदद मिली। इसने बड़े क्षेत्र की निजी सिंचाई को आसान बना दिया। इसने तालाब जैसे साझा स्त्रोतों को गांव के अमीरों तथा प्रभावशाली लोगों के लिए निरर्थक बना दिया। तालाब अब ऐसी चीज नहीं रह गए जिन्हें सहेजा जाए, बल्कि उनकी बर्बादी ने उनके तल को निजी खेती के लिए प्रेरित किया और यह एक मुख्य लक्ष्य ही बन गया।

इस तरह अमीर लोग उन लोगों की जमीन भी हथिया सकते थे जो तालाब जैसे सिंचाई के सार्वजनिक स्त्रोत पर निर्भर थे। इस नए संस्थागत तथा तकनीकी परिदृश्य का एक दिलचस्प नतीजा यह निकला कि सिंचाई के लिए पानी बेचा जाने लगा और पानी के ‘दादा’ पैदा होते गए।

नलकूपों से सिंचाई के निजी प्रभुत्व की इस प्रक्रिया को टकावी कर्जों ने भी मदद दी। ये कर्ज कुओं और कुओं से सिंचाई को बढ़ावा देने के लिए दिए जाते थे और इनका विशेष मकसद अभाव वाले क्षेत्रों में तालाब से सिंचाई व्यवस्था का रखरखाव या सार्वजनकि खर्च घटाना था। इसके फलस्वरूप लंबी अवधि के वित्त पोषण के लिए कृषि सहकारिता कर्ज संस्था की स्थापना हुई। आंध्र प्रदेश में नाबार्ड के समर्थन से लंबी अवधि के संस्थागत वित्त पोषण के अध्ययन से पता चलता है कि सूखा क्षेत्रों में बांटे गए अधिकांश कर्ज सिंचाई के लिए थे, जिन्होंने इन अभावग्रस्त क्षेत्रों में निजी सिंचाई व्यवस्थाओं को मजबूती दी। ऐसा नहीं है कि इन कर्जों ने निजी खेती या क्षेत्र की अर्थव्यवस्था को लाभ नहीं पहुंचाया, लेकिन उन्होंने जल संचय प्रणालियों से ध्यान भटकाया जरूर।

उपयुक्त संस्थाएं

तालाबोें के जीर्णोंद्धार के कई सुझाव दिए गए हैं। स्थापित मानकों के अनुसार उनकी नियमित मरम्मत और रखरखाव, मिट्टी भरने के कारण उनकी क्षमता में गिरावट को रोकने के लिए बंध और बंधारा बनाना, डूब और वाष्पीकरण से हानि को रोकने के लिए मिट्टी की सफाई और भूमि उद्धार, प्रस्वेदन से हानि रोकने के लिए तालाब में खरपतवार न होने देना, किनारों और तालाब तल में खेती का नियमन, मिट्टी भराई को रोकने के लिए किनारों पर पेड़ लगाना और भूमि संरक्षण। ये उपाय संसाधनों की उपलब्धता और स्थानीय संस्थाओं की मजबूती के हिसाब से लागू किए जाएंगे। इतिहास बताता है कि तालाब स्थानीय पहल के फल होते हैं। इसलिए स्थानीय संस्थाओं के लोप की वजहों को समझना जरूरी है और समसामयिक संदर्भों के लिए संस्थाएं बनाने की जरूरत है।

(डी. एन. रेड्डी, बी. सी. बाराह और टी. सुधाकर) (बूंदों की संस्कृति पुस्तक से साभार)