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तालाबों को बर्बाद होने से बचाने की लड़ाई लड़ने वाले योद्धाओं की कहानी!

अतिक्रमण और गंदगी के कारण तालाबों की हालत दयनीय हो गई है

On: Wednesday 29 January 2020
 
शहरी तालाबों की लड़ाई
सरूरनगर झील ताजे पानी की हैदराबाद की सबसे बड़ी झील है। इसका निर्माण पूर्वी हैदराबाद में वर्ष 1624 में किया गया था (मोहम्मद मुबाशिर) सरूरनगर झील ताजे पानी की हैदराबाद की सबसे बड़ी झील है। इसका निर्माण पूर्वी हैदराबाद में वर्ष 1624 में किया गया था (मोहम्मद मुबाशिर)

शहरों में स्थित जलाशयों की स्थिति काफी बिगड़ गई है। इनमें से कई मलकुंडों में परिवर्तित हो गए हैं, जहां मच्छरों, कीड़े-मकोड़ों ने अपना अड्डा बना लिया है और जल कंुभियों का स्थायी वास हो गया है। इनके संरक्षण के लिए आवाज उठाने वाले संगठनों की संख्या बहुत कम है। देश में चारों तरफ फैले इन जलाशयों में से कुछ तो प्राकृतिक कारणों से बने हैं, पर अधिकांश का निर्माण लोगों ने करवाया है। प्रारंभ में इनका निर्माण महत्वपूर्ण कार्यों के लिए किया गया था, न कि शहर का गंदा बटोरने और गंदगी बढ़ाने के लिए। मध्यवर्ती और दक्षिणी भारत के शुष्क शहरी इलाकों में ये जलाशय पीने के पानी और सिंचाई के कार्यों के लिए जरूरी जल को जमा करने के काम आते हैं। इसके अतिरिक्त, इनका प्रयोग भूमिगत जल को पुनरावेशित करने में किया जाता है।

चेन्नई में औसत वर्षा 1,400 मिमी. है। यहां लोगों को दो दिनों में सिर्फ एक ही बार पानी की आपूर्ति की जाती है। इसका एक महत्वपूर्ण कारण साफ पानी को जमा करने वाले तालाबों की कमी है। उन शहरों में, जहां साल भर नदी से प्राप्त जल की व्यवस्था है, ये तालाब बाढ़ रोकने, जरूरत से अधिक नाइट्रोजन, फास्फेट, विषैले पदार्थ और नुकसानदेह धातुओं को निकालने और बेकार पानी को साफ करने के काम में आते हैं। आज भारत के शहर इन स्त्रोतों को विकास के नाम पर बर्बाद कर रहे हैं। विभिन्न संगठन जैसे कंज्यूमर एक्शन ग्रुप आॅफ मद्रास, सिटिजन्स अगेंस्ट पॉल्यूशन, हैदराबाद और सिटिजन्स वालंटरी इनिशिएटिव फाॅर द सिटी, बंगलूर अपने शहरों के तालाबों को बर्बादी से बचाने के लिए लड़ाई लड़ रहे हैं। ये देश में इन जलाशयों को बचाने में लगे संगठनों के कुछ ही उदाहरण हैं।

प्राकृतिक संसाधनों के प्रति नजरिया ही इस बड़े स्तर पर हो रही लड़ाई का मूल कारण है। औपनिवेशिक नजरिए के असर के प्रभावित सरकारी अधिकारी “विकास” के नाम पर पश्चिमी तौर-तरीकों को फिर से शुरू करने में विश्वास रखते हैं। इन लोगों को कुछ क्षेत्रों में विजय मिली है, पर अभी और बहुत कुछ होना बाकी है।

हैदराबाद

बागवानी पेशे वाले रवीन्द्र रेड्डी और उस्मानिया विश्वविद्यालय में रसायन शास्त्र के प्रोफेसर उनके भाई पुरुषोत्तम का हैदराबाद के उपनगर सरूरनगर में 30,000 पौधों वाला गुलाब का बगीचा था। यह एक आदर्श नर्सरी थी। अचानक इसमें लगाए गए पौधों में से 10,000 सूख गए। खोजबीन करने से पता लगा कि पास में स्थित एक रासायनिक फैक्टरी ने अपने कचरे को जमीन में बहाना शुरू किया था, जिससे भूमिगत जल के सोतों में जमा पानी संदूषित हो गया था।

पुरुषोत्तम रेड्डी ने आसपास के फार्म वालों से संपर्क किया। इसके फलस्वरूप सिटिजन्स अगेंस्ट पॉल्यूशन (कैप) नाम के संगठन की शुरुआत हुई। पानी का निरीक्षण करवाने के बाद इस संगठन के सदस्य सरकारी दफ्तरों में एक अर्जी लेकर गए। इसका विवरण प्रेस में भी दिया गया। इसका परिणाम यह हुआ कि फैक्टरी ने कचरे का परिशोधन प्लांट लगा दिया। इसके साथ-साथ सरकार ने भी इस क्षेत्र में स्थित 13 कॉलोनियों में पीने का पानी उपलब्ध कराया। और तो और, इस क्षेत्र में 50 एकड़ जमीन पर वृक्षरोपण से संबंधित योजना भी शुरू की गई। इसके दो वर्ष बाद कैप ने हैदराबाद के एक सांस्थानिक क्षेत्र नाचरम में भी एक महत्त्वपूर्ण कार्य किया। यहां स्थित फैक्टरियों से निकलने वाले कचरों और जहरीली गैसों से पर्यावरण प्रदूषित हो रहा था। कैप ने इसमें प्रभावित सभी निवासियों को एक सप्ताह तक चली भूख हड़ताल के लिए तैयार किया। इसके बाद प्रदूषण बोर्ड के दफ्तर के सामने धरना भी दिया गया था।

कैप के अलावा सोसाइटी फॉर प्रिजर्वेशन आॅफ एनवायरमेंट एंड क्वॉलिटी आॅफ लाइफ एक अन्य महत्वपूर्ण संगठन है जो हैदराबाद में स्थित तालाबों को बचाने के काम में लगा है। इस संस्था ने सितंबर 1993 में एक आंदोलन शुरू किया, जिसे हैदराबाद के तालाब बचाओ का नाम दिया गया। इसके सदस्यों में एक केएल व्यास भी हैं, जो सरूरनगर झील के पास रहते हैं। यह ताजे पानी की हैदराबाद की सबसे बड़ी झील है। इसका निर्माण पूर्वी हैदराबाद में सन 1624 में किया गया था।

हैदराबाद में जलस्रोत भी बदल गए हैं। यह तस्वीर हुसैनसागर झील की है

व्यास इस आंदोलन से उस समय जुड़े जब उन्होंने पाया कि उनकी कॉलोनी में भूमिगत जल का स्तर झील में जमा पानी के साथ-साथ घट रहा था। व्यास कहते हैं, “वर्षा के जल को झील में पहुंचाने के लिए बनाए गए नालों को पास की काॅलोनी के कचरे को निकालने के काम में लाया जा रहा था (शुरुआत में इस तालाब के पास अधिकृत 69 एकड़ जमीन थी जो अब अतिक्रमण की वजह से घटकर सिर्फ 40 हेक्टेयर रह गई है)। करीब 200 मछुआरे अपनी आजीविका चलाने के लिए इस तालाब पर निर्भर हैं। जब कुछ मछलियां मरने लगीं, तो मछुआरों ने आंध्र प्रदेश प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड से संपर्क किया। इस बोर्ड ने इन मरी हुई मछलियों की जांच करने के बाद एक रिपोर्ट हैदराबाद के नगरपालिका काउंसिल के पास भेजी, जिसमें कचरे को कहीं और फेंकने का अनुरोध किया गया था। पर इस तरफ कोई भी कदम नहीं उठाया गया।” सोसाइटी ने राज्य सरकार से अनुरोध किया है कि शहर के तालाबों के संरक्षण और रखरखाव से संबंधित कार्यों के लिए एक सेल तैयार किया जाए। अगर तालाबों का विकास अच्छी तरह से किया जाए तो हैदराबाद और सिकंदराबाद के लोगों को पीने का पानी उपलब्ध कराने में काफी मदद मिलेगी।

स्थानीय मछुआरों की समिति के सचिव जी प्रभाकर रेड्डी के अनुसार, “एक समय में हम एक ही दिन में 500 किलो तक मछलियां पकड़ लेते थे, पर आज हम सिर्फ 50 किलो ही पकड़ पाते हैं।” व्यास के अनुसार, मत्स्य पालन विभाग ने जो भी उपाय अपनाए हैं, वे सभी पानी में अत्यधिक प्रदूषण से सफल नहीं हो पाए।

इसके अतिरिक्त जब भी वर्षा जल की वजह से झील में पानी जमा होता है तो सिंचाई विभाग उन्हें बाहर निकाल देता है, क्योंकि अतिक्रमण वाले घर इसमें डूबने लगते हैं। सिंचाई विभाग ने तो मछुआरों के खिलाफ एक मुकदमा भी शुरू किया था, क्योंकि उन्होंने 1994 में पानी को निकालने का विरोध किया था। आज भी पानी को निकाला जा रहा है।

बंगलूर

वर्ष 1994 में पर्यावरण को बचाने के लिए बंगलूर में एक बहुत बड़ी रैली का आयोजन किया गया था जिसमें सभी उम्र, जाति के स्त्री-पुरुषों ने भाग लिया था। इसका मुख्य उद्देश्य दक्षिण बंगलूर स्थित 112 हेक्टेयर के माडीवाला तालाब को सत्ता के दलालों से बचाना था। बंगलूर में कर्नाटक वन विभाग ने तालाब बचाओ अभियान शुरू किया था, जिसके अंतर्गत 25 तालाबों के लिए 50 लाख रुपए की एक परियोजना शुरू की गई थी। इसके अतिरिक्त, विभाग ने कई पदयात्राओं और नुक्कड़ नाटकों का आयोजन करवाया है और तालाबों को बचाने के लिए कमेटियों की स्थापना भी की। इससे तालाब के पास रहने वाले लोगों को सम्मिलित करने में सहायता मिली। बंगलूर में काम कर रहे स्वयंसेवी संगठन, सिटिजन वालंटरी इनिशिएटिव फाॅर द सिटी, कर्नाटक सरकार के कोरमंगला तालाब पर 270 करोड़ रुपए खर्च करके 5,000 फ्लैटों का निर्माण कराने के आदेश के विरुद्ध संघर्ष कर रही है। इन फ्लैटों का निर्माण 1996 में आयोजित होने वाले राष्ट्रीय खेलों में भाग लेने वाले करीब 6,000 खिलाड़ियों को जगह देने के लिए किया जा रहा था। संगठन ने आदेश के खिलाफ जनहित याचिका भी दायर की थी।

चेन्नई

चेन्नई में कंज्यूमर एक्शन ग्रुप (कैग) ने तालाबों को बचाने के लिए एक जनहित याचिका दायर की है। तालाबों के आसपास के क्षेत्रों में तमिलनाडु आवास बोर्ड और आवास एवं नगर विकास निगम द्वारा विभिन्न परियोजनाएं शुरू करने के विरुद्ध कैग संघर्ष कर रही है। यह एक आश्चर्यजनक बात है कि शहर के विकास के लिए बने विभाग ही उसके अहित के कार्यक्रम चलवा रहे हैं। इन योजनाओं से संबंधित दस्तावेजों में तालाबों को एक पोरामबोक या उजाड़ जमीनों का दर्जा दिया गया है। कैग ने विश्व बैंक को एक पत्र भेजा, जिसमें उसके द्वारा इन योजनाओं के कार्यान्वयन के लिए जरूरी धन उपलब्ध कराने से संबंधित निर्णय पर आपत्ति की गई है। विश्व बैंक के अवसंरचना परिचालन विभाग के प्रमुख रोबर्ट. एन. केनफिल ने उत्तर दिया, “तमिलनाडु राज्य में निवास स्थानों को विकसित करने की आज बहुत जरूरत है। राज्य सरकार ने विभिन्न क्षेत्रों में करीब 70,000 जगहों और प्लाॅटों को उपलब्ध कराया है। इनमें चेन्नई के कुछ तालाब भी शामिल हैं, जिनमें अंबाट्टूर आदि प्रमुख हैं। इनसे जुड़ी योजनाओं को कार्यान्वित करने का काम तमिलनाडु आवास बोर्ड के पास है। इस काम में चेन्नई क्षेत्रीय विकास प्राधिकरण जैसे संस्थान भी जुड़े हुए हैं।”

इस तरह इनमें से अधिकतर आंदोलनों की शुरुआत एक छोटे ग्रुप के द्वारा होती है, जो जन समूहों को इन चीजों से अवगत कराते हैं। इन आंदोलनों के फलस्वरूप सरकार भी कदम उठाने में विवश है। फैक्टरियों को अपना कचरा साफ करने के लिए विशेष प्लांटों को स्थापित करने पर विवश किया गया है। पर इन सबके बावजूद शहरी इलाकों में स्थित जलाशयों की हालत सरकारी उपेक्षा की वजह से बिगड़ती ही जा रही है। भविष्य में ऐसे और भी कई आंदोलनों और संगठनों को चलाने की जरूरत है, जिससे इन जलाशयों का पुनर्निर्माण और संरक्षण अच्छी तरह किया जा सके।

(“बूंदों की संस्कृति” पुस्तक से साभार)

तालाबों पर बुरी नजर

28 अगस्त, 1996 को आंध्र प्रदेश के रंगा रेड्डी जिले के जिला प्रमुख ने हैदराबाद के सरूरनगर झील से पानी को निकालने का आदेश दिया। पर हाईकोर्ट ने इस पर रोक लगाने का आदेश दे दिया। पर्यावरण को बचाने में सक्रिय कार्यकर्ताओं ने भी इसका विरोध किया था।

27 सितंबर को जनहित याचिका पर स्थगन आदेश दिया गया। याचिका में हैदराबाद और सिकंदराबाद में स्थित 170 जलाशयों का भी जिक्र किया गया, जिस पर इस आदेश का बुरा असर पड़ने का अंदेशा था। अक्टूबर के अंत में, आंध्र प्रदेश हाईकोर्ट ने इस आदेश में संशोधन करते हुए नगरपालिका प्रशासन को झील से पानी निकालने का आदेश दिया। यह निर्णय हैदराबाद में भारी वर्षा होने के कारण लिया गया था।

सिटिजन्स अगेंस्ट पॉल्यूशन से जुड़े के पुरुषोत्तम रेड्डी ने कहा, “वर्षा होने से झील में पानी का स्तर बढ़ गया जिससे सिंगरेनी हाउसिंग कॉलोनी में बाढ़ की स्थिति उत्पन्न हो गई थी।” उन्होंने मीरालाम तालाब का उदाहरण दिया जिसने दो वर्ष पहले, एक गैरकानूनी तरीके से बसी कॉलोनी में बाढ़ की स्थिति उत्पन्न कर दी थी। जनहित याचिका की वकालत करने वाले के. प्रभाकर रेड्डी कहते हैं, “भवनों के निर्माण और विकास से संबंधित कार्यों के शुरू होने से इन झीलों का आकार कम हो गया है, जिससे पानी का स्तर काफी कम हो गया है। भूमिगत जल का स्तर भी नीचे गिरता जा रहा है। ऐसा उस शहर में हो रहा जहां पानी की मांग दिन-प्रतिदिन बढ़ती ही जा रही है। हर साल, रंगा जिले में पानी की कमी हो जाती है। विकास से संबंधित कार्यों से स्थिति और भी बिगड़ गई है।”

सरूरनगर मछुआरों के संगठन के अध्यक्ष जी. प्रभाकर रेड्डी कहते हैं, “हमारे विचार से समूची झील को खाली करने की योजना है, जिससे लोग वहां अपने घरों का निर्माण कर सकें। पर हम ऐसा नहीं होने देंगे, क्योंकि इससे हमारे जीने के ढंग पर बुरा प्रभाव पड़ेगा। इसके अतिरिक्त, इस झील के पानी का उपयोग पास की लाल बहादुर नगर और दिलसुखनगर की कॉलोनियों के द्वारा किया जा रहा है।”

पुरुषोत्तम रेड्डी कहते हैं, “इस इलाके में जिलाधिकारियों का औसत कार्यकाल सिर्फ नौ महीने है। वे सिर्फ एक ही मकसद से यहां आते हैं- जमीन को उपयोग में लाने से संबंधित आदेश पास कर पैसा बनाने के लिए।”