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जूड़शीतल: चूल्हों को अवकाश, तालाबों-कुओं की सफाई वाला मिथिला का अनूठा पर्व

मेष संक्रांति और उससे अगले दिन मनाए जाने वाले इस त्यौहार में जलस्त्रोतों और प्रकृति को बचाने के प्रति लोगों की ललक देखने को मिलती है

By Pushya Mitra

On: Tuesday 14 April 2020
 
चित्र: अनुप्रिया
चित्र: अनुप्रिया चित्र: अनुप्रिया

मेष संक्रांति और उसके अगले दिन, यानी अमूमन 13-14 अप्रैल के दिन देश के विभिन्न हिस्सों में बैशाखी, बिहू, विशु, पोइला बैशाख, पुथांदु समेत कई पर्व मनाये जाते हैं। बिहार के मिथिला इलाके में इस दौरान मनाया जाने वाला पर्व जूड़शीतल कई मामलों में अनूठा है। इस पर्व में खास तौर पर चूल्हों की पूजा करके उन्हें एक दिन का आराम दिया जाता है और आसपास के जल स्त्रोतों जैसे तालाब, कुआं इत्यादि की सफाई की जाती है, ताकि वह बरसात में आने वाले जल को ग्रहण करने लायक हो सके। इस लिहाज से यह मूलतः प्रकृति का पर्व है। इस पर्व में तालाब और कुओं की सफाई के दौरान कीचड़ की होली भी खेली जाती रही है।

दरअसल मेष संक्रांति के अगले दिन से हिंदू सौर वर्ष की शुरुआत होती है। बौद्ध धर्म के मानने वाले भी इस दिन से नये साल की शुरुआत मानते हैं। इस वजह से भारत और दक्षिण पूर्वी एशिया के कई मुल्कों में मेष संक्रांति और उसके अगले दिन त्योहार के रूप में मनाया जाता है। बिहार में अलग-अलग क्षेत्रों में यह पर्व अलग-अलग नाम से मनाया जाता है। भोजपुर के इलाके में सतुआनी नामक पर्व मनाया जाता है और इस रोज सत्तू का भोजन किया जाता है। अंग और मगध के इलाके में बिशुआ पर्व मनाया जाता है। मिथिला में जूड़ शीतल नामक दो दिन का पर्व मनाया जाता है।

जूड़शीतल पर्व का मुख्य भाव गर्मी की शुरुआत के वक्त लोगों को शीतलता प्रदान करना होता है। इस दिन सुबह उठकर घर के बड़े अपने बच्चों के सिर पर शीतल जल देकर उन्हें जुड़े रहने का आशीर्वाद देते हैं। फिर सभी मिलकर घर के आसपास के तमाम पेड़ों-पौधों को पानी देते हैं। हाल-हाल तक इस रोज लोग गांव और शहर के सार्वजनिक स्थलों पर पनशालाएं स्थापित करते रहे थे, ताकि राहगीरों को गर्मी में पानी मिल सके।

इस पर्व में महिलाएं अमूमन पिछली रात में ही भोजन पका लेती है, ताकि अगले दिन चूल्हे को पूरा आराम दिया जा सके। दिन भर लोग पिछले दिन का बना बासी भोजन खाते हैं, इसलिए इसे कई दफा बसिया पावैन यानी बासी भोजन खाने का पर्व भी कहा जाता है। इस भोजन में चने के दाल की बड़ी खास तौर पर पकायी जाती है।

फिर हर घर में चूल्हे की पूजा होती है और घर के लोग तालाब और कुओं की उड़ाही और सफाई करने के लिए निकल जाते हैं। इस सफाई का मुख्य अर्थ इन जल स्त्रोतों के गाद की सफाई होता है। ताकि फिर पूरे साल स्वच्छ जल मिलता रहे। तालाब के गाद की सफाई के वक्त होली सा दृश्य उत्पन्न हो जाता है, लोग उस गाद से होली खेलने लगते हैं। इस पर्व में खास तौर पर घरों में मौजूद तुलसी के पौधे के ऊपर एक जल भरा घड़ा लटकाया जाता है, जिससे बूंद-बूंद जल लगातार रिसता रहता है। ताकि पूज्य माने जाने वाले तुलसी के पौधे को गर्मी में जल की कमी न हो।

मिथिला के जाने-माने संस्कृतिकर्मी और नाटककार कुणाल कहते हैं, जब हम युवा थे तो हमारे लिए इस पर्व का महत्व होली से बढ़ कर था। दिन भर कीचड़ की होली, फिर शाम को कुश्ती-दंगल और कई तरह के खेलकूद होते थे। एक दिन पहले साल का आखिरी चैता गाया जाता था। मगर समय बदलने के साथ-साथ यह पर्व भी बदला है। अब जब से हैंडपंप से पानी मिलने लगा है और घरों में गैस के चूल्हे आ गये हैं। तालाब और कुओं की सफाई की परंपरा कहीं-कहीं ही दिखती है। हां, कुछ लोग इस मौके पर अपने घरों की पानी वाली टंकी की सफाई करवा लिया करते हैं। इसके बावजूद यह प्रकृति पर्व कई रूपों में आज भी मिथिला में मौजूद है। चूल्हों को अवकाश देने की अनूठी परंपरा अभी भी बची हुई है।