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मनरेगा से मिले रोजगार ने बदली बलांगिर की तकदीर

मनरेगा प्रोजेक्टस की कामयाबी से ओडिशा के लोगों को साल में तीन सौ दिन काम की गारंटी मिली और जिले से मजदूरों का पलायन भी रुका

By Ajit Panda

On: Tuesday 23 March 2021
 
मनरेगा के तहत ओडिशा के बलांगिर जिले के भुआनपदा गांव में वाटर बॉडी बनाई गई हैं।फोटो: रंजन दाश
मनरेगा के तहत ओडिशा के बलांगिर जिले के भुआनपदा गांव में वाटर बॉडी बनाई गई हैं।फोटो: रंजन दाश मनरेगा के तहत ओडिशा के बलांगिर जिले के भुआनपदा गांव में वाटर बॉडी बनाई गई हैं।फोटो: रंजन दाश

 

ओडिशा के बलांगिर जिले के भुआनपदा गांव के रहने वाले भुबन बेग कुछ साल पहले तक एक प्रवासी मजदूर थे। आज न केवल वह एक कामयाब किसान हैं बल्कि खेती करने के बेहतर ढंग के कारण उनकी तारीफ भी की जाती है। वह कहते हैं, ‘महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम (मनरेगा) के बेहतर इस्तेमाल की वजह से ही यह बदलाव संभव हो सका।’

भुबन 2008 में तमिलनाडु से अपने गांव लौटे थे, जहां वह एक प्रवासी मजदूर की तरह  करते थे। उसी दौरान राज्य के कृषि विभाग के आधीन काम करने वाली एक स्वायत्त एजेंसी, ओडिशा वाटर-शेड डेवलपमेंट मिशन उनके गांव में मौजूद उस अकेलेे तालाब का नवीनीकरण कर रही थी, जिसमें सालों से गाद जमा थी। यह तालाब भुबन की जमीन के बगल में था। वह बताते हैं, ‘मैंने मिशन को तालाब का विस्तार करने और उसके पुश्तों को मजबूत करने के लिए अपनी जमीन के इस्तेमाल की इजाजत दे दी। इसके साथ ही मैं खुद मनरेगा योजना के तहत कराए जा रहे इस काम से जुड़ गया।’

आज इस तालाब में इतना पानी जमा है, जिससे खरीफ की फसल के सीजन में दस हेक्टेयर धान की सिंचाई की जा सके। पंचायत की एक वार्ड मेंबर सबिता बेग के मुताबिक, सिंचाई की चिंता न होने से भुबन एक हेक्टेयर से भी कम जमीन में ढाई हजार किलो फसल उगा लेते हैं।

भुबन बताते हैं, ‘पहले मेरे खेत मानसून की दया पर निर्भर थे’। हालांकि साल के दिसंबर तक इस तालाब में पानी कम होना शुरू हो जाता था, जिससे रबी के सीजन में सिंचाई में मुश्किल होती थी। भुबन ने इसका भी हल ढूंढ लिया, उन्हें पता था कि केवल डेढ़ मीटर गहरे तालाब में जमा पानी ने नीचे के आसपास की जमीन को भी सींच दिया है। इसीलिए उन्होंने तालाब के करीब, अपने खेत के पास दो कुएं खोद लिए। वह कहते हैं कि अब रबी के सीजन में भी कुओं की बदौलत मेरे खेतों की सिंचाई हो जाती है। भुबन सर्दियों के दौरान सब्जियों के अलावा दालें भी उगाते हैं। वह टमाटर, बैंगन, भिंडी, प्याज, हरी धनिया और गन्ना बेचकर करीब तीस हजार रुपये से ज्यादा कमा लेते हैं।

वह कहते हैं, ‘तेल और नमक के अलावा मैं उपभोग की जाने वाली सारी चीजें उगा लेता हूं। यही वजह है कि तमिलनाडु में प्रवासी मजदूर की तरह काम करने वाला मेरा बेटा भी अब वहां न जाकर मेरे साथ खेतों में ही काम करने लगा है।’

बड़े पैमाने पर पलायन के लिए कुचर्चित राज्य में यह कोई छोटी बात नहीं है। बलांगिर में जिला ग्रामीण विकास एजेंसी के प्रोजेक्ट डायरेक्टर माहेश्वर स्वैन के मुताबिक, ‘ओडिशा के जिन बीस ब्लाॅकों से प्रवासी मजदूरों का सबसे ज्यादा पलायन होता है, उनमें से छह ब्लाॅक बलांगिर जिले में ही हैं।’

राज्य सरकार ने पलायन रोकने के लिए इन ब्लाॅकों के लिए विशेष पैकेज का एलान भी किया है। इसी साल की शुरुआत से राज्य सरकार ने इन ब्लाॅकों के मनरेगा जाॅब कार्डधारकों के लिए साल में तीन सौ दिन काम की व्यवस्था की है। अतिरिक्त दो सौ दिनों के काम का भुगतान राज्य सरकार को करना है। स्वैन कहते हैं, ‘हमारा फोकस पानी जमा करने वाली जगहें तैयार करने पर है। हम पहले ही 1 करोड़ 11 लाख दिन काम देने के लक्ष्य को हासिल कर चुके हैं।’ उनके मुताबिक, जिले में खेती के लिए पांच हजार तालाब और बहुपयोगी टैंक तैयार करने का लक्ष्य है।

पड़ोसी गांव मधेलका की सरपंच पुष्पांजलि कुंभार बताती हैं कि उनके गांव में मनरेगा स्कीम शुरू होने के बाद अब तक मजदूरों को डेढ़ लाख रुपये चुकाए जा चुके हैं। उनके मुताबिक, यह कोई बड़ी राशि नहीं है, लेकिन पलायन रोकने और खेतों में फसल की पैदावार बढ़ाने में इसने हमारी मदद की है।’ वह आगे कहती हैं, ‘काम के लिए लगातार बाहर जाने वाले कम से कम 3122 मजदूरों ने मनरेगा के तहत पंजीकरण कराया है। वे अपने घर के नजदीक काम पाना चाहते हैं और हम इसी बात को ध्यान में रखकर प्रोजेक्ट तैयार कराते हैं।’