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दो साल में ऐसे बचा लिया 50 लाख लीटर पानी

उत्तराखंड के दो विकासखंडों के सात गांवों में इन दो वर्षों में 312 भूमिगत कच्चे टैंक बनाकर 50 लाख लीटर से ज्यादा पानी बचाया जा चुका है

By Trilochan Bhatt

On: Sunday 21 July 2019
 
उत्तराखंड के नैनीताल जिले के रामगढ़ और धारी विकासखंडों में इस तरह के गड्ढे बना कर पानी बचाया जा रहा है। फोटो: त्रिलोचन भट्ट
उत्तराखंड के नैनीताल जिले के रामगढ़ और धारी विकासखंडों में इस तरह के गड्ढे बना कर पानी बचाया जा रहा है। फोटो: त्रिलोचन भट्ट उत्तराखंड के नैनीताल जिले के रामगढ़ और धारी विकासखंडों में इस तरह के गड्ढे बना कर पानी बचाया जा रहा है। फोटो: त्रिलोचन भट्ट


पानी की भीषण कमी के इस दौर में, जबकि आने वाले समय में यह संकट और गहराने की आशंका बढ़ती जा रही है, कुछ लोग बिना किसी प्रचार के और बिना सुर्खियां बटोरने की लालसा के चुपचाप जल संरक्षण काम में जुटे हुए हैं। ऐसे ही कुछ लोग मिलकर उत्तराखंड के नैनीताल जिले के रामगढ़ और धारी विकासखंडों में एक साथ जल संरक्षण, वृक्षारोपण और वन्यजीवों के लिए वनों में ही खाद्य सामग्री की उपलब्ध कराने के प्रयास में जुटे हुए हैं। जन मैत्री संगठन में बैनर तले ये पर्यावरण प्रहरी पिछले दो सालों में 1200 हजार पौधे लगा चुके हैं। उनका दावा है कि इनमें से 20 प्रतिशत से ज्यादा पौधे जीवित हैं और जल्दी फलने-फूलने लगेेंगे। इन दो विकासखंडों के सात गांवों में इन दो वर्षों में 312 भूमिगत कच्चे टैंक बनाकर 50 लाख लीटर से ज्यादा पानी बचाया जा चुका है। 

संगठन से जुड़े सामाजिक कार्यकर्ता बच्ची सिंह बिष्ट कहते हैं कि इस संगठन का गठन वैसे तो 2005 में कर दिया गया था, लेकिन करीब 10 वर्षों तक संगठन किसी भी तरह की गतिविधियां नहीं कर पाया। 2015 में नैनीताल जिले के कुछ लोगों ने संगठन को पुनर्जीवित किया। विचार-विमर्श के दौर में तीन प्रमुख समस्याएं समाने आई। पहली जिले के अधिकांश क्षेत्रों में लगातार गंभीर होती जा रही पानी की कमी, दूसरी वनों में पेड़ों की लगातार कम होती संख्या और तीसरी खेती-बाड़ी को बंदर और सूअर जैसे वन्य जीवों से हो रहा नुकसान। संगठन ने सबसे पहले पानी की समस्या पर ध्यान केन्द्रित किया तो पता चला कि कुछ गांवों में पानी के स्रोत करीब-करीब सूख गये हैं और कुछ गांवों में स्रोतों में थोड़ा-बहुत पानी तो है, लेकिन उसका बड़ा हिस्सा बेकार बह जाता है।

जन मैत्री संगठन से जुड़े एक और सदस्य महेश सिंह गलिया, जो बागवानी के अच्छे जानकार हैं, बताते हैं कि कुछ सदस्यों ने जल संरक्षण के क्षेत्र में गैर सरकारी संगठनों के साथ किया था, उनका अनुभव काम आया और सबसे पहले जल संरक्षण के लिए ईमानदार प्रयास करने पर सहमति बनी। इसी दौरान निर्माण कार्यों के जानकार मोहन राम भी संगठन से जुड़ गये। उनकी देखरेख में जल संरक्षण के लिए भूमिगत गड्ढे बनाने का काम शुरू किया गया।

गलिया के अनुसार शुरुआत 10 फुट लंबे, 10 फुट चैड़े और 5 फुट गहरे गड्ढों से की गई। इन्हें मिट्टी और गोबर से लीपा गया और उसके बाद पूरे गड्ढे को पाॅलीथीन शीट से कवर करके ऊपर से जाली लगा दी गई। जिन गांवों में जल स्रोत उपलब्ध थे, वहां इन स्रोतों का पानी गड्ढे तक पहुंचाया गया, ताकि पानी बेकार न बहे और जिन गांवों में जल स्रोतों का अभाव था, वहां बारिश के पानी को छानकर गड्ढों तक पहुंचाने की व्यवस्था की गई। वे कहते हैं कि पिछले दो सालों में संगठन से जुड़े लोग सात गांवों में 312 टैंक बना चुके हैं। इनमें 300 टैंक 10 फीट लंबे, 10 फीट चैड़े और 5 फीट गहरे हैं, जबकि 12 टैंक 30 फीट लंबे, 30 फीट चौड़े और 5 फीट गहरे हैं। अनुमान लगाया गया है कि इन गड्ढों से पिछले दो वर्षों में करीब 50 लाख लीटर पानी की बचत की जा चुकी है, यह पानी ग्रामीणों की जरूरतों के साथ ही सिंचाई के लिए भी इस्तेमाल किया जा रहा है।

बच्ची सिंह बिष्ट कहते हैं कि गड्ढे खोदकर जल संरक्षण का यह प्रयास पूरी तरह सफल रहा और इस दिशा में अब भी लगातार प्रयास किये जा रहे हैं। इसके साथ ही पेड़ विहीन होते जंगलों पर ध्यान दिया गया। इस काम के लिए भी कार्य क्षेत्र नैनीताल जिले के धारी और रामगढ़ विकासखंड ही चुने गये। अब तक संगठन के माध्यम से इन विकासखंडों के गल्ला और सतबूंगा वन पंचायतों के करीब 1000 हेक्टेअर क्षेत्र में बांज-बुरांश आदि चैड़ी पत्ती के 12000 पौधे रोपे जा चुके हैं। इनमें 20 से 25 प्रतिशत जीवित हैं और लगातार विकास कर रहे हैं। बिष्ट कहते हैं कि जैविक खेती के जानकार महेश सिंह नयाल और धारी विकासखंड के बूड़ीबना वन पंचायत के सरपंच दुर्गासिंह बिष्ट के साथ ही महिला मामलों की जानकार और लेखिका राजेश्वरी नयाल ने इन कामों में भरपूर सहयोग दिया। हेमा देवी ने लोगों को एकजुट करने की जिम्मेदारी ली।

उत्तराखंड के दो विकासखंडों के सात गांवों में इस तरह के कच्चे टैंक बनाकर 50 लाख लीटर से ज्यादा पानी बचाया जा चुका है। फोटो: त्रिलोचन भट्ट

अब जन मैत्री संगठन ने बंदर और सूअर जैसी खेती को नुकसान पहुंचाने वाले वन्य जीवों के लिए वनों में ही भोजन उपलब्ध करवाने की मुहिम शुरू कर दी है। बिष्ट के अनुसार इस साल बरसात से पहले लौकी, ककड़ी, कद्दू जैसी बेल वाली सब्जियां जंगलों में जगह-जगह बोई गई, इसके अच्छे परिणाम देखने को मिल रहे हैं। इसके अलावा पैयां, खुमानी, नाशपाती जैसी फलदार पेड़ भी जंगलों में खाली जगहों में लगाये जा रहे हैं। यह मुहिम अब धारी और रामगढ़ विकासखंडों के बाहर भी शुरू करने की तैयारी की जा रही है।