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मनरेगा: ग्रामीणों ने बनाए19 तालाब, कुंओं में भी सालभर रहने लगा पानी

इस आदिवासी गांव में आज से पंद्रह साल पहले लगभग सत्तर प्रतिशत लोग बाहर कमाने-खाने चले जाते थे

By Anil Ashwani Sharma

On: Wednesday 24 March 2021
 
कैप्शन- पौड़ी गांव (सीधी) में मनरेगा से गांव की नदी पर बने स्टेप डेम का कैचमेंट एरिया बढ़ाया जा रहा है। फोटो: अनिल अश्विनी
कैप्शन- पौड़ी गांव (सीधी) में मनरेगा से गांव की नदी पर बने स्टेप डेम का कैचमेंट एरिया बढ़ाया जा रहा है। फोटो: अनिल अश्विनी कैप्शन- पौड़ी गांव (सीधी) में मनरेगा से गांव की नदी पर बने स्टेप डेम का कैचमेंट एरिया बढ़ाया जा रहा है। फोटो: अनिल अश्विनी

मध्यप्रदेश के जिले सीधी का पौड़ी गांव जहां कभी यानी आज से पंद्रह साल पहले मोटा अनाज (मक्का, ज्वार, कुटकी आदि) छोड़ कोई दूसरा अनाज पैदा होता ही नहीं था। लेकिन आज डेढ़ दशक के बाद हम देख रहे हैं कि गांव में कोई ऐसा घर नहीं जहां गेहूं और चावल की उपज न हो रही हो। यह क्रांतिकारी परिवर्तन एक-दो दिन की कहानी नहीं है।

यह कहानी है पूरे गांव की और उनके महनतकश हाथों की। जिसने देखते ही देखते गांव एक नहीं, दो नहीं पूरे के पूरे 19 तालाब बना डाले पिछले 12-13 सालों में।

इन तालाबों की बानगी अब देखने में आ रही है कि गांव की न केवल उपज का पैटर्न बदल गया है बल्कि अब यहां के लोग दूसरी जगहों पर छोटे-मोटे काम की तलाश में जाना भी बंद कर दिया है। तभी तो यहां की फूलवती बड़े फक्र से कहती हैं कि पहले तो मेरा लड़का हर साल सात-आठ माह के लिए किसी न किसी शहर में मेहनत-मजूरी करने चला जाता था लेकिन अब पिछले सात-आठ सालों से न के बराबर जाता है।

कहने का अर्थ कि इस आदिवासी गांव में आज से पंद्रह साल पहले लगभग सत्तर प्रतिशत लोग बाहर कमाने-खाने चले जाते थे और बारिश के समय ही उनका गांव आना होता था कि थोड़ा-बहुत जो बारिश होगी उसमें हम अपने मोटे अनाज की बुहाई कर लेंगे।

अब हालात ये है कि गांव के इक्का-दुक्का ही लोग अब किसी शहर की ओर रुख करते हैं अन्यथा गांव में ही मेहनत मजूरी करते हैं। इस गांव के इस क्रांतिकारी परिवर्तन के लिए गांव वाले मनरेगा योजना को श्रेय देते हैं।

ग्रामीणों का कहना है कि इस योजना ने भले हमें शहर के बराबर मजूरी नहीं दी लेकिन जो भी मजूरी दी और उसके बदले में हमारे गांव की जो तस्वीर बदली है उसके लिए तो हम ताउम्र इस योजना के शुक्रगुजार रहेंगे।

गांव के शिवम सिंह कहते हैं कि भले ही मोदी सरकार इसे एक मृत्यु का स्मारक कहे लेकिन लॉक डाउन के दौरान जिस सरकार ने हम मजूरों को अपने हाल पर छोड़ दिया था, तब इस योजना ही हमारे लिए माईबाप का काम किया। किसी ने हमें काम नहीं दिया मनरेगा को छोड़कर। आज भी हमारे गांव में इस योजना के तहत लगातार काम चल ही रहा है।

ग्राम पंचायत द्वारा एक जनवरी, 2020 में हुई गणना के अनुसार गांव की आबादी 2492 है। यहां की 82 प्रतिशत आबादी अनुसूचित जनजाति की है।

गांव के खेत तालाब में मछली पालन करने वाली विजय सिंह कहते हैं कि योजनाएं तो बहुत आईं और बहुत आएंगी लेकिन मरनेगा योजना की सफलता का सबसे बड़ा कारण है कि इस योजना को ग्रामीणों ने अपनी योजना समझा क्योंकि इस योजना से कायदे से देखा जाए तो ग्रामीणों को न केवल रोजगार मिल रहा रहा है बल्कि इसमें उन्हें अपने भविष्य के रोजगार की संभावना भी दिख पड़ रही है। क्योंकि काम तो मिला ही साथ ही साथ इसमें काम करने से उनके खेतों में जल सतर बढ़ रहा है और गांव में पानी की कमी नहीं दिख पड़ रही थी।

वह अपना उदाहरण देते हुए कहते हैं कि मेरे खेत में कहने के लिए मनरेगा के तहत गहरीकरण किया गया और इस प्रकार से यहां अब सालभर में पानी भरा रहता है। कहने के लिए तो यह काम मनरेगा के तहत हुआ लेकिन इसने मेरे और परिवार के लिए मछली पालन का स्वरोजगार पैदा कर दिया।

यही नहीं इस योजना ने ग्रामीणों के बीच विशेषकर दूर-दराज के आदिवासी गांवों में इस कई ऐसी परंपराओं को जन्म दिया जिसे अब तक ग्रामीणों के बीच नहीं थी। जैसे अपने साथ वाले गांव के साथ हम पानी रोकने के लिए सहयोग करेंगे तो इससे दोनों गांवों को ही लाभ होगा।

गांव में 19 तालाब का निर्माण कोई छोटी-मोटी उपलब्धि नहीं है। यहां गौर करने वाली बात यह भी है कि यहां निर्मित तालाबों में तीन तालाब ऐसे तालाब भी बनाए गए जहां ग्रामीण मछली पालन कर अपनी आजिविका चलाते हैं। हर छह माह में मछली तैयार हो जाती है। इसके अलावा खेत तालाबों के निर्माण से खेतों में जल स्तर बढ़ा और खेतों में अब पहले के मुकाबले अधिक नमी बनी रहती है। इससे गेहूं-चावल की फसल को तैयार होने में मदद मिलती है। सही समय पर बारिश नहीं आने पर भी ग्रामीण लोग अपने जल स्त्रोतों के भरोसे अपने-अपने खेतों में समय पर ही बुआई करने से चूकते नहीं हैं।

इस गांव में ग्रामीणों ने केवल तालाब ही नहीं खोदे बल्कि अब वे गांव की चकदही नदी पर बने चेक डेम के कैचमैंट एरिया को और गहरा कर उसका जल संग्रहण क्षेत्र बढ़ाने के लिए खुदारी कर रहे हैं। इससे गांव की 250 एकड़ जमीन को सिंचाई की सुविधा तो मिलेगी ही साथ ही कैचमेंट एरिया के बड़ा होने से आसपास के गांवों में भी जलस्तर के ऊंचा होने में मदद मिलेगी।

गांव में हुए परिवर्तन पर ग्राम रोजगार सहायक शिवम सिंह कहते हैं कि योजना से अकेले पानी की बहुतायत नहीं हुई है बल्कि इसने एक बड़ा सामाजिक परिवर्तन भी लाया है। 2006-7 तक यह इलाका नक्सली क्षेत्र के रूप में कुख्यात था यानी नक्सलियों का अच्छा-खासा दबदबा हुआ करता था। लेकिन अब दूर-दूर तक उनका कहीं कोई अतापता नहीं है। वह कहते हैं कि हां मैं यह भी कहना चाहूंगा कि वे यहां के ग्रामीणों को किसी प्रकार का नुकसान नहीं पहुंचाते थे।

बस यहां के राजस्व और पुलिस महकमे के लोग ही उनके निशाने पर होते थे। शिवम की बात को आगे बढ़ाते हुए फूलवती कहती हैं कि आज तक उन लोगों ने हमारे गांव के किसी भी व्यक्ति को किसी प्रकार का नुकसान नहीं पहुंचाया। कहा जा सकता है कि गांव में मनरेगा ने रोजी-रोटी की समस्या को दूर कर यहां पर नक्सलियों को अपने पैर जमाने का अवसर नहीं दिया।