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पर्यावरण का अनुपम स्मृति पाठ   

पर्यावरणीय आंदोलन का मतलब तकनीकी, पेड़, चीता और भालू के बारे में नहीं है, यह लोगों और समाज की मानवीयता के लिए है।

By Sunita Narain

On: Thursday 19 December 2019
 

अनुपम जी अपनी पीढ़ी के आखिरी ऐसे व्यक्ति थे, जिन्होंने भारत को पर्यावरण की राजनीति समझाई। वही वो व्यक्ति थे, जो चिपको आंदोलन में गए और डाउन टू अर्थ पत्रिका के संस्थापक संपादक अनिल अग्रवाल को भी साथ ले गए। जब वापस आए तो एक हकीकत भरी कहानी उनके साथ लौटी।

वह कहानी थी कि चिपको आंदोलन सिर्फ पेड़ों तक सीमित नहीं था बल्कि लोगों के राजनीतिक पक्षपात से भी जुड़ा हुआ था। लोग पर्यावरण के लिए लड़ रहे थे क्योंकि यह उनके अस्तित्व की लड़ाई थी। उन्होंने हमें पर्यावरण की विशुद्ध राजनीति को समझाया, यह भी समझाया कि इस देश में हाशिए पर खड़े गरीबों की राजनीति कौन सी है और आखिर उनका भूलाया हुआ और उपेक्षित किया जाने वाला ज्ञान कैसे विकास का हिस्सा बनेगा।

मेरे जेहन में उस यात्रा का ख्याल आता है, मानो आज ही हो, मेरी यात्रा अनुपम जी और अनिल के साथ राजस्थान के रेगिस्तान में थी। हम अनिल जी की लाल मारूति कार में बैठे थे, अचानक हम तीनों ने उस सेहरा में एक उड़न तश्तरी जैसी छवि देखी, हम रुक गए। अनुपम जी कार से उतरे और पास के ही गांव के एक व्यक्ति से उन्होंने बातचीत की। पता चला कि वह उड़न तश्तरी नहीं थी बल्कि आधुनिक भारत का एक मंदिर था। दरअसल वह  बारिश की बूंदो को सहेजने वाली एक संरचना थी, जिसे उस घनघोर जलसंकट वाले क्षेत्र में बूंद-बूंद सहेजने के लिए बनाया गया था। वहां से, मुझे पता है, अनुपमजी ने पीछे मुड़कर नहीं देखा।

वे हमें बीकानेर में एक युवा कार्यकर्ता का काम दिखाने लाए थे। उन्होंने कहा कि पशुओं के लिए घास के मैदानों को संरक्षित करने में इस युवा का काम अनूठा है। उस युवा का नाम शुभू पटवा था जो ताउम्र अच्छा काम करते रहे। वे एक ऐसे नगीने थे जिन्हें अनुपमजी ने खोजा था। अनुपम जी अपनी पूरी जिंदगी भारत में एक से एक नगीनों को खोजते रहे।

वे ऐसे व्यक्ति थे जो बिना किसी नाम के, बिना आवाज के, बिना गाजे-बाजे के, बस अच्छे काम कर रहे थे। अनुपम जी व्यक्ति खोजते थे, उसे तराशते थे और उसके साथ काम करते थे। आज कई कार्यकर्ता, मैं भी, अपने पीछे की कर्मयात्रा को बहुत साफ-साफ देख सकती हूं कि उन्होंने हमारी जिंदगी में क्या महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी।

वह हमें चेताते थे और सलाह देते थे, कैसे अपने मिशन के लिए सच्चाई से बढ़ें, इसका जज्बा भी देते थे। हमारी जिंदगी में हमें जितनी जरूरत है, वे एक पथ प्रदर्शक बनकर रास्ता दिखाते थे। मैं देशभर के कई जमीनी कार्यकर्ताओं को जानती हूं, जो आज इसलिए अच्छे काम कर रहे हैं क्योंकि उनके पीछे अनुपम जी थे।  

अनुपम जी की सबसे बड़ी उपलब्धि, मेरा यकीन है, भारत के तालाबों पर किया गया काम है जो हमेशा जिंदा रहेगा। अगर आप इस विषय पर उनकी लिखी दो पुस्तकें देखेंगे तो वह सिर्फ तालाबों की सरंचना पर ही नहीं है बल्कि उस समाज के बारे में है जिन्होंने वह तालाब बनाए।

उनके लिए यह समाज की कहानी थी, जिसे पढ़ाए जाने की जरूरत है क्योंकि वह कहानी हमें एक लचीला, देखभाल करने वाले और मानवीय समाज के पुनर्निर्माण की जरूरत के बारे में सिखाती है। ऐसा ही समाज एक बार फिर से अपने जल निकायों का निर्माण करेगा।

मुझे याद आता है, वो एक वैश्या की कहानी सुनाते थे जिसने राजस्थान में तालाब बनाए। एक महाराज और एक व्यापारी की कहानी सुनाते थे जिन्होंने भी खूब सारे तालाब बनाए। उनके लिए यह सबकुछ समाज के लिए ही था। अनुपम जी ने हमें सिखाया कि पर्यावरण के आंदोलन का मतलब तकनीकी, पेड़, चीता और भालू के बारे में नहीं है, यह लोगों और समाज की मानवीयता के लिए है। यदि हम उन्हें याद रखना चाहते हैं तो ऐसे ही हमें उन्हें याद रखना होगा।

( यह 9 जनवरी, 2017 को मूल रूप से डाउन टू अर्थ अंग्रेजी में प्रकाशित किए गए लेख का अनुवाद है। मूल अंग्रेजी लेख के लिए यहां क्लिक करें। )