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जल संकट का समाधान: युवाओं ने संभाली कमान, पहाड़ पर बना दी खाल-चाल

उत्तराखंड के पौड़ी जिले में युवाओं ने पानी को बचाने की कमान संभाली और पहाड़ पर चाल-खाल बना कर पानी इकट्ठा करना शुरू कर दिया 

By Varsha Singh

On: Tuesday 02 July 2019
 
उत्तराखंड के पौड़ी जिले में गांव वालों के बनाये खाल-चाल में जमा पानी। फोटो: सुधीर सुन्द्रियाल
उत्तराखंड के पौड़ी जिले में गांव वालों के बनाये खाल-चाल में जमा पानी। फोटो: सुधीर सुन्द्रियाल उत्तराखंड के पौड़ी जिले में गांव वालों के बनाये खाल-चाल में जमा पानी। फोटो: सुधीर सुन्द्रियाल

पलायन की मार झेल रहा उत्तराखंड का पौड़ी जिला यदि अपने हिस्से में आऩे वाले बारिश के पानी को सहेज पाता तो शायद लोग अपने गांव-घर छोड़कर शहरों की ओर इस तेज़ी से नहीं भागते। पौड़ी में पानी की समस्या इतनी बड़ी है कि लोग सिंचाई न कर पाने की सूरत में खेती-बाड़ी छोड़ रहे हैं, जिससे यहां बंजर जमीन का दायरा बढ़ता जा रहा है। 

पौड़ी के मझगांव के प्रगतिशील किसान सुधीर सुंद्रियाल ने पिछले वर्ष कुछ युवाओं की मदद से खाल-चाल बनाई। खाल-चाल को बनाने के लिए ऐसी जगह चुनी गई, जहां पहाड़ों की ढलान से बहकर पानी इकट्ठा हो सकता है। दूसरे क्षेत्रों से भी यहां पानी लाने के लिए नालियां बनाई गईं। खाल-चाल के जरिये पानी को बटोरने का उनका ये प्रयोग सफल रहा। उसके बाद गांव के अन्य लोगों ने भी इस दिशा में कदम बढ़ाया। 

इस वर्ष भी सुधीर कुछ अन्य युवा किसानों के साथ मिलकर छोटे-छोटे खाल-चाल बना रहे हैं। देवराजखाल गांव, पांथर गांव, यमकेश्वर ब्लॉक में बारिशों के दौर के साथ ही ये खाल-चाल पानी जमा करने का कार्य शुरू कर देंगे। 

सुधीर के ही गांव में ग्रामसभा की ओर से मनरेगा के तहत पिछले वर्ष दो खाल-चाल बनवाए गए। वे बताते हैं कि उन जलाशयों को बनाने के लिए स्थान का चयन सही तरीके से नहीं किया गया। उलटा इस बात की ओर ध्यान दिया गया कि कहां से पत्थर आसानी से मिल जाएंगे। एक खाल-चाल को बनाने में कम से कम एक लाख रुपये खर्च हुए होंगे और वे पूरी तरह अनुपयोगी साबित हुए। इसमें सिर्फ बारिश के ज़रिये ही पानी इकट्ठा हो सकता है। पहाड़ों की ढलान से उतरता हुआ पानी यहां लाने का कोई ज़रिया नहीं है।

पौड़ी की जिला पंचायत अध्यक्ष दीप्ति रावत कहती हैं कि जिले में ऊंचाई पर बसे गांवों में पानी का संकट साल-दर-साल गहरा रहा है। जबकि नीचे बसे गांवों में फिर भी थोड़ा बहुत पानी है। वे बताती हैं कि जिले के यमकेश्वर ब्लॉक, गुमखाल, लैंसडौन, जयहरीखाल, पौड़ी नगर में पानी की समस्या विकट है। इसके बावजूद वर्षा जल संचय के लिए यहां अब तक कोई ठोस कदम नहीं उठाया गया। लेकिन मंत्री आवासों में जरूर रेन वाटर हार्वेस्टिंग की प्रणाली का इस्तेमाल किया गया है। दीप्ति रावत कहती हैं कि यदि सरकारी इमारतों, आवासों, विद्यालयों और अस्पतालों में ही बारिश के जल को बचाने के प्रबंध कर दिये जाएं तो हमारी समस्या का एक बड़ा हिस्सा हल हो सकता है।

जिला पंचायत अध्यक्ष दीप्ति रावत के मुताबिक जिले के ज्यादातर प्राकृतिक जल स्रोत सूख चुके हैं। जो थोड़े बहुत बचे हुए वाटर स्प्रिंग्स हैं, उनमें भी अप्रैल-मई में बिलकुल पानी नहीं होता। बारिश के बाद वे थोड़ा रिचार्ज हो जाते हैं।

वर्षा जल संग्रह के लिए उत्तराखंड, हिमाचल और पूर्वोंत्तर के राज्यों में कार्य कर रही संस्था पीपुल्स फॉर साइंस इंस्टीट्यूट के रवि चोपड़ा बताते हैं कि पौड़ी पहले ही रेन शैडो डिस्ट्रिक्ट कहलाता है। यहां औसत वर्षा ही कम होती है। फिर चीड़ के जंगल भी पानी को रोकने में अधिक सक्षम नहीं हैं। हालांकि पौड़ी में चीड़ के साथ बांज-बुरांश के जंगल भी हैं। लेकिन पिछले वर्षों में चीड़ का प्लांटेशन ही अधिक किया गया। जबकि बांज की तुलना में चीड़ 60 से 70 फीसदी कम पानी अपनी जड़ों में समेटता है। इसलिए भी राज्य में भूजल स्तर में कमी आई है। वे कहते हैं कि जल संरक्षण के नाम पर यहां जो कुछ भी प्रयास सरकार की ओर से किये गये हैं, वे कागजों में ही हुए हैं। जहां पानी की दिक्कत होती है, वहां हैंडपंप लगा दिये जाते हैं, जो तीन-चार महीने बाद पानी देना बंद कर देते हैं।

राज्य योजना आयोग में सलाहकार एचपी उनियाल बताते हैं कि वर्ष 2009 में राज्य में पानी के स्रोतों को लेकर सर्वे किया गया था। उसके बाद आज तक कोई सर्वे नहीं हुआ। न ही पानी बचाने के लिए पौड़ी में सरकार की ओर से कोई उल्लेखनीय कार्य किया गया। हालांकि 29 जून 2019 को पौड़ी में किये गये कैबिनेट बैठक के दौरान मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत ने ल्वाली झील के निर्माण के लिए दो करोड़ रुपये की राशि जारी की है।  

वर्ष 2010 से 2015 में बारिश के आंकड़ों का अध्ययन कर उन्होंने बताया कि प्रति वर्ष औसतन 1133.92 मिलीमीटर बारिश होती है। गर्मियों के कुछ महीनों को छोड़ दें तो 90 फीसदी तक बारिश के पानी को इकट्ठा किया जा सकता है। एक आंकलन के ज़रिये उन्होंने बताया कि यदि 100 वर्ग मीटर की छत पर 20 किलो लीटर भंडारण क्षमता वाले टैंक को वर्षा जल संचय के लिए इस्तेमाल करें। जिसमें से हम प्रतिदिन अपने इस्तेमाल के लिए 150 लीटर तक पानी खर्च करेंगे तो भी जुलाई के महीने में 31.31 किलोलीटर पानी की बचत कर सकते हैं। अगस्त में पानी की ये बचत 51.14 किलो लीटर तक हो सकती है। टैंक की क्षमता से अतिरिक्त जल ज़मीन के अंदर जल के स्तर को समृद्ध बनाएगा। इस तरह जल संकट से जूझ रहे पौड़ी जैसे जिलों में बारहोंमास पानी का सपना पूरा हो सकता है।

राज्य योजना आयोग के सलाहकार एचपी उनियाल कहते हैं कि साल भर होने वाली बारिश का मात्र तीन फीसदी जल संग्रह करने पर राज्य में पेयजल, सिंचाई और औद्योगिक आवश्यकताओं की पूर्ति की जा सकती है। लेकिन हमारा ज्यादातर पानी पर्वतीय ढलानों से बहकर मैदानों में चला जाता है। वे कहते हैं कि जंगल की आग, बंजर कृषि भूमि में बढ़ोतरी, सड़कों के निर्माण, खनन और जलस्रोतों के कुप्रबंधन के चलते हिमालय क्षेत्र के प्राकृतिक जल स्रोतों का बहाव कम हो रहा है। पौड़ी जैसे जिले पानी के कुप्रबंधन की ही मार झेल रहे हैं।