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आखिर इस दर्द की दवा क्या है...

भोपाल से सटे सीहोर, अशोकनगर, रायसेन, गुना, राजगढ़ और विदिशा जिले में बहने वाली 32 नदियों में से केवल पांच नदियों में थोड़ा-बहुत प्रवाह बचा है।

By kgvyas_jbp@rediffmail.com

On: Wednesday 04 December 2019
 
तारिक अजीज / सीएसई
तारिक अजीज / सीएसई तारिक अजीज / सीएसई

मौसम की भविष्यवाणी करने वाली संस्था स्काईमेट का अनुमान है कि 2017 में भारत में जून से लेकर सितंबर के बीच 95 प्रतिशत बरसात होगी। बरसात का आंकड़ा 887 मिलीमीटर रह सकता है। जुलाई और अगस्त में क्रमशः 289 और 261 मिलीमीटर जबकि जून और सितंबर में क्रमशः 164 और 173 मिलीमीटर बरसात होगी। पश्चिम बंगाल, झारखंड, ओडिशा और पूर्वी भारत को छोड़कर देश के बाकी हिस्सों में बरसात की मात्रा कम रहेगी।

वर्ष 2016 में भारत के मध्य क्षेत्र में औसत से अधिक पानी बरसा था। उस समय लगा था कि 2017 की गर्मी के मौसम में पानी की कमी नहीं होगी। पर हकीकत इसके विपरीत है। भोपाल से सटे सीहोर, अशोकनगर, रायसेन, गुना, राजगढ़ और विदिशा जिले में बहने वाली 32 नदियों में से केवल पांच नदियों में थोड़ा-बहुत प्रवाह बचा है। भोपाल-सागर मार्ग की नदियां सूख चुकी हैं। बेतवा मार्च के पहले सप्ताह में ही अपने मायके में सूख गई है। संभवतः यह पहला मौका है जब औसत से 27 प्रतिशत अधिक पानी बरसने और गर्मी के मौसम के दस्तक देने के पहले ही भारत के मध्यक्षेत्र में बहने वाली इतनी सारी नदियां प्रवाह खो चुकी हैं। यह स्थिति इंगित करती है कि बरसात की अधिकता का संबंध नदियों के सूखने से कतई नहीं है।

बेतवा की हकीकत को समझने के लिए भारत के मध्यक्षेत्र में स्थित उसके कैचमेंट के बारे में और उसकी कुछ बुनियादी बातें जानना आवश्यक है। बेतवा और उसकी अनेक सहायक नदियों का उदगम विंध्याचल की पहाड़ियों से है। उनका प्रारंभिक भाग पहाड़ी और ठोस बलुआ पत्थर से बना है। नदियां जैसे-जैसे आगे बढ़ती हैं, जमीन की ढाल घटती जाती है। मध्यम ऊंचाई की पहाड़ियों से घिरा काली मिट्टी का मैदानी भाग शुरू होता है। इस मैदानी इलाके के नीचे बैसाल्ट की काली चट्टानें मिलती हैं। इन सभी चट्टानों में भूजल को सहेजने वाली परत (एक्वीफर) की मोटाई बहुत कम है। वह परत थोड़ी बरसात में ही भर जाती है। वही परत बरसात में बेतवा और उसकी सहायक नदियों को पानी उपलब्ध कराती है। उसी के कारण बेतवा नदी तंत्र में साल भर पानी बहता था।

बेतवा और उसकी सहायक नदियों का कछार गेहूं के उत्पादन के लिए प्रसिद्ध है। पहले इस इलाके में सूखी खेती होती थी, पर हरित क्रांति के बाद कुओं और नलकूपों के बढ़ते प्रचलन के कारण धीरे-धीरे सूखी खेती खत्म हुई और अधिक पानी की जरूरत वाले बीजों पर आधारित उन्नत कृषि पद्धति को बढ़ावा मिला। भूजल के उपयोग में उल्लेखनीय वृद्धि हुई। इसके अलावा, बेतवा नदी तंत्र की कुछ नदियों का प्रारंभिक मार्ग मंडीदीप के औद्योगिक क्षेत्र से गुजरता है। उद्योगों और इलाके की आबादी की पानी की आवश्यकताओं ने पूरा बोझ भूजल पर डाल दिया। सन 2012 के आंकड़ों के अनुसार रायसेन, भोपाल और विदिशा जिलों में भूजल के उपयोग का स्तर 51, 51 तथा 81 प्रतिशत है। सभी लोग भूजल के उल्लेखित स्तर की अनदेखी कर दोहन को बढ़ावा देते रहे। बढ़ते भूजल दोहन के कारण बरसात के बाद का क्षेत्रीय भूजल स्तर गिरकर नदी तल के नीचे उतरने लगा। उसने नदियों के असमय सूखने की स्थितियों को जन्म दिया। कुएं, तालाब और नलकूप समय से पहले सूखने लगे। स्पष्ट है कि नदियों या जलस्रोतों के सूखने का संबंध मानसूनी बरसात या कुदरती भूजल रीचार्ज की मात्रा से नहीं है। उसका एकमात्र संबंध भूजल दोहन की लक्ष्मण रेखा पार करने से है। इसी वजह से बेतवा कछार या बुंदेलखंड या देश के अन्य अनेक इलाकों के अनेक नदी-नाले, कुएं, तालाब और नलकूप असमय सूख रहे हैं।

बेतवा नदी के इलाके में औद्योगिक अपशिष्ट  के आधे-अधूरे निपटान की भी समस्या है। भोपाल की बहुत सारी अनुपचारित गंदगी ढोने वाला पातरा नाला इस्लामनगर में बेतवा नदी में मिलता है। वह भी बेतवा को गंदा कर रहा है। इन कारणों से अनेक स्थानों पर बेतवा नदी तंत्र का पानी लगभग अनुपयोगी हो चुका है।

बेतवा नदी तंत्र का प्रारंभिक मार्ग तेजी से विकसित हो रहे नगरों के पास स्थित है। भोपाल, मंडीदीप और औबेदुल्लागंज में अनेक कालोनियों का निर्माण हो रहा है। उसके लिए बड़ी मात्रा में बेतवा नदी तंत्र की रेत का खनन हो रहा है। रेत की अवैज्ञानिक निकासी के कारण नदियों में पानी की गति को नियंत्रित करने तथा सहेजने वाली परत खत्म हो रही है। संचित भूजल का योगदान कम हो रहा है। बेतवा और उसकी सहायक नदियों के प्रारंभिक मार्ग में प्रवाह घटने का यही वास्तविक कारण है। यह समस्या साल-दर-साल विकराल हो रही है। आने वाले सालों में बेतवा नदी के अगले हिस्से भी सूखेंगे। यह स्थिति इलाके की खेती, पेयजल आपूर्ति और उद्योगों के लिए अच्छी नहीं होगी।

आजादी से अब तक भारत में सूखे के असर को कम करने के लिए लगभग 3.5 लाख करोड़ रुपए खर्च किए जा चुके हैं। मनरेगा की राशि से लगभग 123 लाख अतिरिक्त जल संरक्षण संरचनाएं बनी हैं। इसके बावजूद वर्ष 2015-16 में देश के 678 जिलों में से 254 जिलों के 255,000 ग्रामों में सूखा पड़ा था। पर्याप्त बारिश के बावजूद मध्यप्रदेश के 51 जिलों में से 43 जिले सूखा प्रभावित थे। पिछले 10 सालों में बुंदेलखंड में 15,000 करोड़ की लागत से 116,000 वाटर हार्वेस्टिंग संरचनाएं बनाई जा चुकी हैं। राहत पैकेजों, अनुदानों तथा खर्च के आंकड़ों को देखकर लगता है कि कोताही प्रयासों में कतई नहीं है। फिर गलती कहां है? इसका उत्तर खोजना होगा।

क्या मौजूदा जल संकट बिना सही दृष्टिबोध के बनाई गई योजनाओं के क्रियान्वयन का प्रतिफल है? कहीं नदियों तथा जलस्रोतों का असमय सूखना भूजल रीचार्ज की अनदेखी का परिणाम तो नहीं है? क्या जल-मल उपचार संयंत्रों की मदद से नदियों के प्रवाह एवं निर्मलता को जलचरों एवं वनस्पतियों की आवश्यकतानुसार बनाया जा सकता है? कहीं समाज को जागरूक करने की जद्दोजहद में बाजी हाथ से तो नहीं निकल जाएगी? क्या नदियों को जिंदा कर मौजूदा जल संकट से निपटा जा सकता है? इन सवालों पर देशव्यापी निर्णायक बहस होनी चाहिए। वही बहस दिल बहलाने वाले प्रयासों से मुक्ति दिलाएगी। वहीं जल संकट से निजात पाने के लिए निर्णायक दवा तय करेगी।

लेखक राजीव गांधी वाटरशेड मिशन के भूतपूर्व सलाहकार हैं