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बर्बाद दिखता भविष्य

नदी पास में न होने के कारण बेंगलुरु हमेशा तालाबों और झीलों पर निर्भर रहा है। आधुनिक बेंगलुरु के संस्थापक केंपे गौड़ा ने 15वीं सदी में कई तालाब बनवाए थे।  

On: Tuesday 03 December 2019
 
प्रदूषण तालाबों को चौपट कर रहा है। पानी लाने वाली नालियां अब इसमें घरेलू मोरियों का कचरा भरने लगी हैं (फोटो: अंजू शर्मा / सीएसई)
प्रदूषण तालाबों को चौपट कर रहा है। पानी लाने वाली नालियां अब इसमें घरेलू मोरियों का कचरा भरने लगी हैं (फोटो: अंजू शर्मा / सीएसई) प्रदूषण तालाबों को चौपट कर रहा है। पानी लाने वाली नालियां अब इसमें घरेलू मोरियों का कचरा भरने लगी हैं (फोटो: अंजू शर्मा / सीएसई)

कर्नाटक के इतिहास में तालाबों में झीलों आदि ने अहम भूमिका निभाई है। कर्नाटक का बड़ा भाग चूंकि दक्षिणी पठार के कम बारिश वाल क्षेत्र में पड़ता है, इसलिए तालाब और झील पीने के पानी और सिंचाई के प्रमुख स्त्रोत हैं। इनमें से अधिकतर तालाब ब्रिटिश राज से पहले बनाए गए थे। आपस में जुड़े तालाबों की शृंखला प्रत्येक क्षेत्र में बनाई गई थी। एक ही आगोर क्षेत्र में होने के कारण एक तालाब का अतिरिक्त पानी नीचे के दूसरे तालाब में चला जाता है।

कोई नदी पास में न होने के कारण बेंगलुरु हमेशा तालाबों और झीलों पर निर्भर रहा है। आधुनिक बेंगलुरु के संस्थापक केंपे गौड़ा ने 15वीं सदी में कई तालाब बनवाए थे। इनमें से कुछ हैं- केंपाबुधि तालाब, धर्मबुधि तालाब, संपांगी तालाब, सिद्धिकट्टे केरे।

सन 1860 तक बेंगलुरु में वर्षा के पानी को सिंचित करने की व्यवस्था बना ली गई थी। वर्षा जल को बर्बाद नहीं होने दिया जाता था। 1866 में बेंगलुरु के कमिश्नर लेविंग बेंथम बाॅरिंग ने बाहरी इलाकों के तालाबों तक वर्षा जल पहुंचाने के लिए विशाल नाले बनवाए थे। कर्नाटक स्टेट गजेटियर में बेंगलुरु के तालाबों के बारे में मद्रास सैपर्स ऐंड माइनर्स के चीफ इंजीनियर ले. कर्नल आर. एच. सैंकी ने लिखा है “जल संग्रह के नियम का इस हद तक पालन किया गया है कि इस विशाल क्षेत्र में नए तालाब के लिए जगह ढूंढ़ने में हिम्मत लगानी पड़ेगी। किसी पुराने तालाब को पुनः उपयोगी बनाना तो संभव है, मगर इस क्षेत्र में इस तरह का नया तालाब बनाने से नीचे के किसी तालाब के पानी में निश्चित ही कटौती होगी।”

सन 1892 में मैसूर के दीवान सर के. शेषाद्रि अय्यर ने बेंगलुरु से 20 किमी. उत्तर-पश्चिम में हस्सारघट्टा तालाब बनवाया ताकि शहर को स्थायी और भरोसेमंद स्त्रोत से पानी मिलता रहे। शहर में पाइप से पानी सर्वप्रथम 23 जून 1896 को पहुंचाया गया। 1899 में महसूस किया गया कि जल आपूर्ति की लोक निर्माण व्यवस्था असंतोषजनक है। सो, इसे नगर पालिका के हाथ में सौंप दिया गया। लेकिन 1925-26 में लगातार दो साल बारिश न होने के कारण पानी का भारी संकट हो गया तो सर एम. विश्वेश्वरैया की अध्यक्षता में एक सिमिति ने टिप्पागोंडनहल्ली परियोजना बनाई, बेंगलुरु से 40 किमी. दूर टिप्पागोंडनहल्ली में अर्कावती बांध बनाने की।

इस स्त्रोत से जल आपूर्ति 2.7 करोड़ लीटर प्रतिदिन से बढ़ाकर 1958 में 7.2 करोड़ लीटर कर दी गई, लेकिन प्रति व्यक्ति खपत 90 लीटर प्रतिदिन ही थी। 1958 में गठित एक समिति ने कावेरी से पानी लेने का सुझाव दिया। 1974 में बेंगलुरु को कावेरी से 13.5 करोड़ लीटर पानी प्रतिदिन मिलने लगा और इसका दूसरा चरण 1982 से शुरू हो गया। कावेरी जल योजना का तीसरा चरण फरवरी 1995 से शुरू हुआ।

आज बेंगलुरु को 65 करोड़ लीटर पानी प्रतिदिन मिलता है। इसमें 54 करोड़ लीटर कावेरी परियोजना से मिलता है और 10 करोड़ लीटर टिप्पागोंडनहल्ली से और 1 करोड़ लीटर हस्सरघट्टा जल व्यवस्थाओं से। कावेरी के पानी को 1,000 मीटर की ऊंचाई तक ऊपर ले जाना पड़ता है। बेंगलुरु जल आपूर्ति और मल व्ययन बोर्ड बिजली पर हर महीने 4 करोड़ रुपए खर्च करता है। कावेरी योजना के तीसरे चरण के बाद भी बेंगलुरु में प्रति व्यक्ति प्रतिदिन 80-100 लीटर पानी मिलता है।

बेंगलुरु में पानी पहुंचाने पर सरकारी खर्च इस उपमहाद्वीप में सबसे ज्यादा (7 रुपए प्रति लीटर) है। फिर भी तालाबों को पुनः उपयोगी बनाने की कोई योजना नहीं है। बोर्ड के अध्यक्ष एस. के. घोषाल कहते हैं, “इन तालाबों को उनकी शानदार प्राचीन हैसियत में वापस ला सकने की कोई सूरत नहीं है।”

भारतीय विज्ञान संस्थान के डी. के. सुब्रमण्यन कहते हैं कि नदी के पाइप से पानी को खींचने की व्यवस्था पर निर्भरता के कारण पारंपरिक जल व्यवस्थाओं की उपेक्षा हुई है। रेड्डी कहते हैं कि तालाबों के पानी की थोड़ी सफाई करके पीने के सिवा दूसरे कामों में उपयोग किया जा सकता है। वे कहते हैं, “स्थानीय समुदायों को वर्षा जल का सर्वेक्षण सीखना चाहिए। हर इलाके में वर्षा जल के संग्रह की कोई-न-कोई व्यवस्था होनी चाहिए।”

बेंगलुरु शहर के 127 में से 46 तालाब बेकार घोषित किए जा चुके हैं। बेंगलुरु के तालाबों का व्यवस्थित सर्वे पहली बार एन. लक्ष्मण राउ की अध्यक्षता में 1985 में किया गया। राउ को इन पुराने तालाबों को पुनः उपयोगी बनाने में काफी संभावनाएं दिखती हैं। वे कहते हैं, “अधिकतर तालाबों पर खुला अतिक्रमण किया गया है। उन्हें प्रदूषित किया गया है और गाद भरने के कारण उनकी क्षमता आधी रह गई है। अधिकतर लोगों के लिए वे कचरे के गड्ढे से ज्यादा कुछ नहीं हैं। बेंगलुरु को आज उनकी जरूरत न हो, लेकिन जल संकट को देखते हुए कल वे काम के साबित हो सकते हैं। लोगों के लाभ के लिए उनके आसपास कुछ सफाई तालाब बनाए जा सकते हैं।”

लक्ष्मण राउ समिति की सिफारिश पर “उपयोगी तालाबों” को 1988 में वन विभाग के अधीन कर दिया गया। लेकिन वन संरक्षण प्रमुख परमेश्वरप्पा कहते हैं कि केवल 85 तालाब विभाग के हवाले किए गए, जो मृतप्राय थे उनमें सात का तो अता-पता ही नहीं मिल सका और आठ रिहायशी और व्यावसायिक क्षेत्रों में शुमार कर लिए गए हैं।

बेंगलुरु के अधिकांश तालाबों को बिना रोकटोक गंदा किया जा रहा है। उनकी जमीन पर कब्जा हो रहा है। गाद भरने से उनकी क्षमता आधी रह गई है। अधिकांश लोगों के लिए 
ये तालाब गंदे गड्डे भर रह गए हैं

तालाब बचाओ अभियान

कर्नाटक वन विभाग ने “तालाब बचाओ अभियान” शुरू किया और 25 तालाबों के लिए 50 लाख रुपए की परियोजना तैयार की गई। वन विभाग और तालाब रक्षा समिति ने पदयात्राएं और नुक्कड़ नाटक आयोजित किए। विभाग ने रक्षा के नाम पर अब तक 21 तालाबों की बाड़बंदी की है। परमेश्वरप्पा बताते हैं कि इन तालाबों के विकास के लिए उनमें से मिट्टी निकालने और उस मिटृी से द्वीप जैसा बनाने की योजना बनाई गई है। इस द्वीप पर सजावटी पेड़-पौधे लगाने की भी योजना है। लेकिन पर्यावरणवादियों को संदेह है कि बाड़ें तोड़ दी जाएंगी और द्वीप बहकर फिर तालाब में समा जाएंगे। सुब्रमण्यन बताते हैं कि वन विभाग ने सांकी तालाब के किनारों को काटकर नर्सरी लगा दी। वह कहते हैं “समस्या का मूल कारण है बकसास योजनाएं। उन्हें सिर्फ विशाल नालों की सफाई करनी चाहिए और यह देखना चाहिए कि वर्षा जल तालाबों में पहुंचता है या नहीं।”

सरकारी अतिक्रमण

सरकार तालाबों और झीलों की सबसे बड़ी दुश्मन बनी हुई है। इन अधिकतर तालाबों पर बेंगलुरु नगर निगम, बेंगलुरु विकास प्राधिकरण, उद्यान विभाग जैसी सरकारी संस्थाओं ने अतिक्रमण कर रखा है। नगर निगम ने धरमबुधी तालाब पर बस अड्डा बना दिया, संपांगी तालाब के एक हिस्से पर कांतीर्वा स्टेडियम बना दिया, जबकि बाकी हिस्से का अधिग्रहण संपानीरम नगर एक्स. काॅलोनी के लिए किया गया है। सिद्दी कट्टे पर एक अरसे से बाजार बना हुआ है।

सन 1860 तक उल्सूर, शूले और पुडुपचेरी तालाब बेंगलुरु छावनी को पानी मुहैया करते रहे। शूले पर आज फुटबाॅल स्टेडियम खड़ा है, पुडुपचेरी को थाॅमस टाउन और कूकस टाउन मुहल्लों ने निगल लिया। नगर विकास योजना में तालाबों को सार्वजनिक उद्यान और खेतल मैदान के रूप में चिह्नित किया गया है। बेंगलुरु विकास प्राधिकरण यह तर्क देता है कि बेंगलुरु भारत का सबसे तेजी से फैलता शहर है और आबादी का भारी दबाव है। प्राधिकरण के चीफ इंजीनियर एम. होंबैया कहते हैं, “हम अतिक्रमण नहीं कर रहे, बल्कि लोगों को मकान देकर उनका भला कर रहे हैं।”

सिटिजंस वाॅलंटरी इनिशिएटिव फाॅर द सिटी (सिविल) और शहर की पांच दूसरी स्वयंसेवी संस्थाओं ने कोरमंगला तालाब की 47 एकड़ जमीन पर खिलाड़ियों के लिए 5,000 फ्लैट बनाने की मंजूरी देने के सरकारी फैसले के खिलाफ जनहित याचिका दायर की है। कोरमंगला तालाब की बर्बादी के खिलाफ जनहित याचिका दायर की है। कोरमंगला तालाब की बर्बादी के खिलाफ हुई एक रैली में अभिनेता गिरीश कर्नाड ने कहा, “इसकी मूल वजह भ्रष्टाचार है। ऐसा नहीं है कि वे इन तालाबों का महत्व नहीं समझते।”

प्रदूषण भी इन तालाबों की हत्या कर रहा है, क्योंकि विशाल नाले उनमें पानी के बदले कचरा भर रहे हैं। डोमलुर तालाब तो 1875 में ही कचरे के नाले की वजह से प्रदूषित हो गया था। घोषाल के मुताबिक, बेंगलुरु में तीन बड़ी घाटियां हैं, जहां कचरे का परिशोधन करके फेंक दिया जाता है- चल्लाघटृा घाटी, हेब्बाल घाटी और वृषिभावती घाटी। उनका कहना है कि बेंगलुरु शहर की ऊंची-नीची सतह के कारण कई छोटी घाटियों को बड़े नालों से नहीं जोड़ा गया है, जो उन बड़ी घाटियों में कचरा पहुंचाते हैं। इसलिए कचरा तालाबों में पहुंचता है। घोषाल का कहना है कि इन छोटी घाटियों की पहचान कर ली गई है और मेगासिटी परियोजना के तहत वहां कचरा परिशोधन संयंत्र लगाए जाएंगे।

भूमिगत जल स्त्रोत इतनी तेजी से खाली हुए हैं कि आज पानी के लिए 300 मीटर गहराई तक खुदाई करनी पड़ती है। इसके अलावा, झीलों के सूखने से मछुआरों और धोबियों की जीविका छिन गई है। मछलियों की आमद में भारी कमी आई है। अच्छे मौसम में जहां 6,000 टन मछली मिलती है वहां पिछले साल केवल 700 टन मछली मिली।

(“बूंदों की संस्कृति” पुस्तक से साभार)