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क्यों है पानी पर जातियों का पहरा?

ऐसे गांव की कहानी जहां दलितों ने तालाब में नहाने का हक आंदोलन से हासिल किया

By Madhav Sharma

On: Tuesday 30 March 2021
 
चकवाड़ा का वो तालाब जिसे लेकर झगड़ा हुआ था। फोटो: माधव शर्मा
चकवाड़ा का वो तालाब जिसे लेकर झगड़ा हुआ था। फोटो: माधव शर्मा चकवाड़ा का वो तालाब जिसे लेकर झगड़ा हुआ था। फोटो: माधव शर्मा

आज से करीब 94 साल पहले महाराष्ट्र के रायगढ़ जिले के महाड़ में दलितों पर पानी को लेकर होने वाली छूआछूत के खिलाफ एक आंदोलन की शुरूआत हुई। डॉ. भीमराव अंबेडकर ने सैकड़ों दलितों के साथ महाड़ के सार्वजनिक तालाब चावदार का पानी पिया और छूआछूत के खिलाफ पूरे देश में एक संदेश दिया।  

इस घटना के करीब 74 साल बाद राजस्थान के जयपुर जिले में चकवाड़ा गांव में भी करीब ऐसी ही घटना घटी। गांव के एकमात्र सार्वजनिक तालाब में दलितों के नहाने और मवेशियों के लिए अलग से घाट था। दो युवक बाबूलाल बैरवा (45) और राधेश्याम बैरवा (25) ने दलितों के साथ इस व्यवहार को खत्म करने की कोशिश की और तालाब के मुख्य घाट पर जाकर नहा लिए। यह 14 दिसंबर 2001 की है।

यह तालाब सामान्य, ओबीसी और एसटी वर्ग के लोगों के लिए आरक्षित था। इसलिए इन लोगों ने दोनों युवकों का विरोध किया और रात में बाबूलाल और राधेश्याम के घर पर कथित तौर पर हमला हो गया। पुलिस बुलाई गई, लेकिन अगले दिन पुलिस ने भी दलितों को गांव की परंपरा के साथ चलने का सुझाव दिया।

इसके बाद 16 जनवरी 2002 को गांव में दलितों के अलावा सभी वर्गों के लोगों ने एक बैठक बुलाई और दलितों के मुख्य घाट पर नहाने के एवज में पूरे समाज पर 51 हजार रुपए का जुर्माना लगा दिया। दलित समाज के लोगों ने इसे अस्वीकार कर दिया। 21 दिसंबर को सभी समाज के लोगों ने दलितों का सामाजिक बहिष्कार कर दिया। इस बहिष्कार के बाद दलितों के घरों में दूध, अखबार, राशन का सामान की सप्लाई बंद कर दी गई। आखिरकार दलित समाज की ओर से 17 लोगों के खिलाफ 22 जनवरी 2002 को केस दर्ज कराया गया। दलित कार्यकर्ताओं की मानें तो स्थानीय पुलिस थाने से लेकर राज्य मानवाधिकार आयोग तक में शिकायत करने के बाद भी इनकी कोई सुनवाई नहीं हुई। 

8 फरवरी 2002 को सेंटर फॉर दलित ह्यूमन राइट्स संस्था की एक बैठक में ये मामला उठाया गया। इसके बाद 19 जून 2002 को संस्था ने राजस्थान के एससी-एसटी कमीशन में ये मामला पहुंचाया, लेकिन इसके बाद भी दलित समाज की कहीं सुनवाई नहीं हुई। बल्कि 12 जुलाई 2002 को राज्य मानवाधिकार आयोग ने मामले को खत्म कर दिया। इससे पहले प्रशासन ने दोनों समाजों के बीच समझौता कराने की कोशिश की, लेकिन इसे दलित समाज के लोगों ने ठुकरा दिया। 

दलित संगठनों ने मानवाधिकार आयोग में मामला खत्म होने के बाद अगस्त 2002 में संयुक्त राष्ट्र (यूएन) की नस्लीय भेदभाव उन्मूलन कमेटी के सामने जेनेवा में ये मसला उठाया। मामला कहीं भी सुलझता हुआ ना देख जयपुर के कई दलित संगठनों ने 20-21 सितंबर 2002 को चाकसू से चकवाड़ा तक करीब 45 किमी की ‘सद्भावना यात्रा’ निकाली। 

इस यात्रा के विरोध में जातीय वर्चस्व रखने वाले समूह बड़ी संख्या में चकवाड़ा के तालाब पर जमा हो गए। तब के अखबारों की कतरनें बताती हैं कि ये संख्या कम से कम 15 हजार थी। जबकि यात्रा में महज 200 लोग थे जो अगले दिन यानी 21 सिंतबर को मधोराजपुरा में 2500 हो गए। चकवाड़ा के तालाब पर कथित ऊंची जाति के लोगों ने राम धुन गाना शुरू किया और तालाब की तरफ आने वाले सभी रास्ते जाम कर दिए। मधोपुरा के पास जब यात्रा पहुंची तो यात्रा में शामिल तमाम संगठनों को सूचना मिली कि चकवाड़ा से 6 किमी पहले ही फागी कस्बे में यात्रा का विरोध किया जाएगा।

सेंटर फॉर दलित ह्यूमन राइट्स संस्था के समन्वयक पीएल मीमरोठ बताते हैं  कि चकवाड़ा में जमा हुए लोग बेकाबू हो गए। पथराव में तत्कालीन डीआईजी अजीत सिंह और एसपी ग्रामीण लियाकत अली खान सहित 50 से ज्यादा पुलिसकर्मी और 30 से अधिक ग्रामीण घायल हो गए।  इसके बाद दलित संगठनों ने तत्कालीन मुख्यमंत्री अशोक गहलोत और केन्द्रीय एससी-एसटी आयोग से मामले में दखल की अपील की। केन्द्र सरकार ने आयोग के दो सदस्यों को चकवाड़ा भेजा।

हालांकि तमाम सरकार, प्रशासन और संगठनों की कोशिशों के बाद भी चकवाड़ा में दलित और अन्य वर्गों के बीच तालाब के पानी को एक साथ इस्तेमाल करने को लेकर कोई सहमति नहीं बन पाई। दोनों तरफ की कई संस्थाओं की मदद से 24 सितंबर 2002 में तालाब में दलित और आरोपी पक्ष के लोगों का सामूहिक स्नान भी कराया गया। 

जानिए गांव की स्थिति

2011 की जनगणना के अनुसार चकवाड़ा गांव में 660 परिवार हैं जिनमें से करीब 200 से ज्यादा परिवार ओबीसी समाज के हैं। इसके बाद सामान्य और फिर एससी वर्ग के परिवार हैं। 2001  की जनगणना के मुताबिक गांव में 508 परिवार थे। इनमें सामान्य 130, ओबीसी 241, एससी 105 और एसटी के 32 परिवार थे। 

राजस्थान यूनिवर्सिटी में समाजशास्त्र के प्रोफेसर रहे डॉ. राजीव गुप्ता से डाउन-टू-अर्थ ने इस मुद्दे के माध्यम से पानी जैसे प्राकृतिक देन के बंटवारे और उसकी  सामाजिक गहराई समझने की कोशिश की। वे बताते हैं, ‘ये सदियों पुराना सवाल है। समाज में जब छूआछूत की शुरूआत हुई तो ये भी हुआ कि शुद्रों के हाथ से पानी या कच्चा भोजन नहीं खाया जाएगा, लेकिन पानी के साथ प्रदूषण की मान्यता नहीं जुड़ पाई। इसीलिए आज देखा जाता है कि दिल्ली की मैली यमुना में छठ पर्व पर महिलाएं उस पानी में खड़ी होकर पूजा करती दिखती हैं। हमारे समाज में आज भी संविधान के मूल्यों पर पारंपरिक या धार्मिक मूल्य हावी हैं। चकवाड़ा की घटना भी इसी संदर्भ में देखी जानी चाहिए। हाल ही में गाजियाबाद के मंदिर में मुस्लिम लड़के की पिटाई भी इसी संदर्भ में देखी जा सकती है।’

सामाजिक कार्यकर्ता भंवर मेघवंशी कहते हैं, ‘पानी को लेकर संघर्ष काफी पुराना है और आज भी वैसा ही है। मनरेगा में अगर कोई दलित पानी पिलाने का काम करता है तो विरोध होता है। पश्चिमी राजस्थान में पानी के टांकों को दलितों के इस्तेमाल को लेकर काफी घटनाएं हुई हैं। पानी पर जातीय वर्चस्व का सबसे बड़ा उदाहरण चकवाड़ा की घटना है। हमारी यात्रा को रोकने के लिए हजारों लोग हाथों में लाठियां लेकर पहुंच गए थे। हवाई फायर भी हुए। पानी कुदरत की देन है जिस पर प्राकृतिक और संवैधानिक रूप से सबका हक है। हमारे धर्मों में भी पानी पिलाना पुण्य का काम है, लेकिन पानी को लेकर असमानता की सिर्फ राजस्थान ही नहीं बल्कि देशभर से खबरें आती रहती हैं।’ 

मेघवंशी आगे कहते हैं, ‘चकवाड़ा का आंदोलन राजस्थान ही नहीं पूरे देश में पानी को लेकर समानता के सवाल का आंदोलन था। ये ठीक वैसा ही आंदोलन था जो 1927 में महाड़ में डॉ. अंबेडकर ने चलाया था। लेकिन ये दुर्भाग्यपूर्ण है कि जिस समानता की सोच को लेकर मुहिम शुरू हुई वो सफल नहीं हो पाई। इतने बड़े आंदोलन के बाद आज वहां उल्टा हो गया कि सवर्ण तालाब का इस्तेमाल नहीं कर रहे। जबकि सवाल दोनों के बराबर और बिना भेदभाव के इस्तेमाल करने का था। उस तालाब को दलितों का या अशुद्ध तालाब सोचकर छोड़ दिया गया है। समाज के कई वर्गों के लिए इज्जत के साथ पानी की उपलब्धता आज भी दूर की कौड़ी है।’

चकवाड़ा मुहिम की शुरूआत करने वाले बाबूलाल बैरवा की मौत 2017 में हो गई। डाउन-टू-अर्थ ने उनके छोटे भाई बद्रीलाल बैरवा से गांव में आज की स्थिति को लेकर बात की। उनका कहना है, ‘2001-02 में पूरे देश में हमारे गांव का नाम अखबारों में आया। कोर्ट-कचहरी हुए, लेकिन तालाब के इस्तेमाल को लेकर जो समानता की लड़ाई थी वो आज भी अधूरी ही है। पहले हमें मुख्य घाट इस्तेमाल नहीं करने दिए जाते थे, अब जब हम उन घाटों का उपयोग कर रहे हैं तो गांव के उच्च वर्ग ने तालाब का ही अघोषित बहिष्कार कर दिया है। कभी-कभार युवा जरूर नहाते हैं, लेकिन पुराने विचारों को मानने वाले लोग आज भी तालाब के पानी का इस्तेमाल नहीं करते क्योंकि उसमें दलित नहाते हैं।’

बद्री आगे कहते हैं, ‘पहले गांव की कमेटी तालाब की साफ-सफाई कराती थी, लेकिन जब से वो घटना हुई है, तालाब का कोई रख-रखाव ही नहीं है। कोई भी आकर किनारों पर कचरा फेंक जाता है।’