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दिल्ली की प्यास बुझाने का दावा करने वाली लखवार परियोजना के प्रस्ताव को केंद्र की मंजूरी

ऐसा माना जाता है कि दिल्ली में पानी की उपलब्धता को सुनिश्चित करने के लिए बाहर से पानी लाने का यह आखिरी जरिया होगा।

By Vivek Mishra

On: Saturday 30 November 2019
Photo: Creative commons

उत्तराखंड को बिजली और दिल्ली को पानी देने का दावा करने वाली लखवार बहुउद्देशीय परियोजना के प्रस्ताव टर्म ऑफ रेफरेंस (टीओआर) को केंद्रीय वन पर्यावरण मंत्रालय की नदी एवं घाटी पर्यावरण आकलन समिति (ईएसी) ने मंजूरी दे दिया है। यमुना और अगालार नदी पर स्थित इस आधी-अधूरी परियोजना पर एनजीटी के पूर्व आदेश के अनुसार अभी कोई काम नहीं किया जा सकेगा। परियोजना पर यथास्थिति ही बनी रहेगी। फिलहाल परियोजना प्रस्तावक उत्तराखंड जल विद्धयुत निगम लिमिटेड (यूजावीएन लिमिटेड) एनजीटी के आदेश के मुताबिक नई परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए परियोजना के कागजी काम पूरे करने में लगा है।

ऐसा माना जाता है कि दिल्ली में पानी की उपलब्धता को सुनिश्चित करने के लिए बाहर से पानी लाने का यह आखिरी जरिया होगा। एनजीटी ने इस वर्ष की शुरुआत में ही आदेश दिया था कि लखवारी बहुउद्देशीय परियोजना पर यथास्थिति बनाए रखनी होगी साथ ही जमीन पर परियोजना से जुड़ा कोई भी काम नहीं किया जा सकेगा। पीठ ने यह माना था कि दशकों पुरानी परियोजना की पर्यावरण मंजूरी और पर्यावरण प्रभाव आकलन रिपोर्ट को स्वीकार नहीं जा सकता है क्योंकि तीन दशकों में परिस्थितियां अब बिल्कुल बदल चुकी हैं। इसलिए नए सिरे से परियोजना के प्रभाव का पर्यावरणीय अध्ययन होना चाहिए।

यह बांध परियोजना 1987 में शुरु हुई थी। 400 करोड़ खर्च कर करीब 30 फीसदी निर्माण कार्य भी कर दिया गया था। इसके बाद काम पर रोक लगा दी गई। तब से करीब 27 वर्ष गुजर चुके हैं और परियोजना ठप है। अब दोबारा परियोजना की फाइलें खुलीं तो मामला एनजीटी में पहुंच गया। जहां एनजीटी ने पुरानी शर्तों पर निर्माण को सही न मानते हुए परियोजना पर यथास्थिति का आदेश दिया था।

19 जुलाई, 2019 को हुई एक बैठक में लखवार बहुउद्देशीय परियोजना के टीओआर को ईएसी ने सशर्त मंजूरी दी है। ईएसी ने कहा है कि भारतीय वन्यजीव बोर्ड से वन्यजीव (संरक्षण) कानून, 1972 के अधीन वन्यजीव मंजूरी लिया जाए। इसके अलावा सभी वैधानिक मंजूरियां पर्यावरणीय प्रभाव आकलन रिपोर्ट के साथ सौंपी जाएं।

ईएसी ने अपनी शर्त में कहा है कि परियोजना के लिए निजी भूमि का अधिग्रहण भूमि अधिग्रहण, पुनर्वास और पुनर्स्थापन में उचित मुआवजा और पारदर्शिता का अधिकार, 2013 के तहत किया जाए। ईएसी ने कहा है कि परियोजना के साथ ही जैवविविधता और दुर्लभ वनस्पितयों व फल-फूलों की प्रजातियों के लिए संरक्षण और प्रबंधन योजना भी बनाई जाए।

जनसुनवाई जैसी कार्रवाई पर्यावरण प्रभाव आकलन अधिसूचना, 2006 और समय-समय पर संशोधित सूचना के साथ की जाए। इसके बाद एक निर्णायक परियोजना प्रस्ताव पर्यावरण मंजूरी के लिए तय समय में समिति के समक्ष रखा जाए। वहीं, सामाजिक प्रभाव आकलन अध्ययन रिपोर्ट तैयार करने के साथ ही परियोजना में प्री-मानसून, और मानसून के आंकड़ों पर आधारित रिपोर्ट भी मांगी गई है।

परियोजना प्रस्तावक ने यह फायदा गिनाया है कि देहरादून स्थित इस परियोजना के कारण 22 किलोमीटर अपस्ट्रीम यमुना नदी और 4 किलोमीटर अगालार नदी के हिस्से में प्रत्येक वर्ष पानी भरेगा। इससे वहां की स्थानीय आबादी मछली पकड़ने में मदद मिलेगी। वहां की स्थानीय आबादी मछली पकड़ने का पारंपरिक उत्सव मनाती है।

इसके अलावा महाशीर यमुना से पलायन कर अगालार नदी में जाएगी, जो उसके विस्तार के लिए ज्यादा अनुकूल नदी है। ईएसी ने अपनी शर्त में इस बिंदु पर गौर करने के बाद परियोजना प्रस्तावक को सीआई और सीसीएस की सिफारिशों को पूरा करने की बात भी परियोजना में जोड़ने को कही है।

09-01-1997 में योजना आयोग ( अब नीति आयोग) की पांचवी योजना में 140.97 करोड़ रुपये वाली लखवार व्यासी परियोजना को स्वीकार किया था। देहरादून स्थित लखवारी व्यास परियोजना में तीन घटक थे। लखवार डैम, व्यासी डैम और कटापठार बैराज। पर्यावरण मंत्रालय ने इस संयुक्त परियोजना को 1987 में पर्यावरण मंजूरी दी थी। इसके बाद 1987 से 1992 तक लगातार यूपी के सिंचाई विभाग द्वारा परियोजना का काम चलता रहा। मसलन 40 किलोमीटर की सड़क बना दी गई। डैम का कुछ काम पूरा हुआ। डायवर्जन टनेल बनाया गया। अंडरग्राउंड पावर हाउस बना गया। वहीं, इस बीच उत्तर प्रदेश, हरियाणा, राजस्थान, हिमाचल प्रदेश और दिल्ली के बीच 12 मई, 1994 को एक करार किया गया।  

इस करार के तहत सालाना यमुना नदी के 11.983 अरब घन मीटर पानी से इन पांच राज्यों के बीच बंटवारा होना है। इसके बाद ही लखवार, व्यासी और हथिराई पनबिजली परियोजना का काम शुरु हुआ। इसे लखवार बहुउद्देशीय परियोजना का नाम दिया गया। जिसमें बिजली, पानी, सिंचाई, बाढ़ नियंत्रण जैसे घटक परियोजना के साथ जोड़े गए और परियोजना की कुल लागत 3966.51 करोड़ रुपये आंकी गई थी।