Sign up for our weekly newsletter

जलशक्ति अभियान की हकीकत: जलसंकट की ओर बढ़ता बाढ़ प्रभावित जिला

बिहार के कटिहार जिले में सालाना औसत वर्षा 1022-1210 एमएम वर्षा होती है, लेकिन इसमें से कितना वर्षा जल संचय होता है इसका कोई रिकॉर्ड जिले के पास नहीं है

By Vivek Mishra

On: Friday 20 March 2020
 
कटिहार में खेतों में भरा पानी। फोटो: विवेक मिश्रा
कटिहार में खेतों में भरा पानी। फोटो: विवेक मिश्रा कटिहार में खेतों में भरा पानी। फोटो: विवेक मिश्रा

उत्तरी बिहार के कटिहार जिले में चारो तरफ खेत पानी से लबालब हैं। खेतों में धान की रोपनी के लिए बोरिंग के जरिए किसान खेतों में पानी भर रहे हैं। मक्के की फसलें भी खेतों में खड़ी हैं। गांव में घरों के आगे महिलाएं मसूर दाल साफ कर रही हैं। बच्चे मां के इर्द-गिर्द जमीन में उधम मचा रहे हैं। गांवों की तरफ हरियाली और जमीन में नमी ही नमी दिखाई दे रही है। 

जिला मुख्यालय से करीब 13 किलोमीटर दूर डंडखोरा ब्लॉक के रतनापुर गांव में संथाल जनजाति के संजू टुडू डाउन टू अर्थ से कहते हैं कि मेरे पास कुल एक बीघा खेत है। यहां साल में दो बार धान की फसल पैदा की जाती है। एक फसल सीजन को गरमा और दूसरी को अगहनी कहते हैं। हम डीजल के बजाए 60 रुपये वाले केरोसीन का जुगाड़ करते हैं और बोरिंग मशीन से जुड़ने वाली हुंडा मशीन हमारे जमीन से पानी निकाल कर हमारे खेतों को लबालब भर देती हैं। यहां पानी की कमी नहीं है, बोरिंग का पानी तो 10 फीट पर मिल जाता है। कटिहार जिले में सालाना औसत वर्षा 1022-1210 एमएम वर्षा होती है। हालांकि, इसमें से कितना वर्षा जल संचय होता है इसका कोई रिकॉर्ड जिले के पास नहीं है।

2011 जनगणना के मुताबिक पानी से संपन्न कटिहार की कुल आबादी 30,71,029 है। यह आबादी 1540 गांव, 2 कस्बे और एक सेंसस टाउन में रहती है। झारखंड और पश्चिम बंगाल से जुड़े जिले में मुख्य रूप से गंगा, महानंदा, कोसी व अन्य नदी बहती हैं। नम और उपजाऊ भूमि वाले इस जिले के पास वनक्षेत्र नहीं है। सिर्फ खेत हैं। बीते वर्ष कटिहार जिले में केंद्रीय जल शक्ति अभियान के तहत डंडखोरा प्रखंड को जल संचय के लिए चुना गया था। आखिर जल से भरपूर इस क्षेत्र को जलशक्ति अभियान ने  जल संकट वाले क्षेत्रों में क्यों शामिल किया गया था?

डंडखोरा प्रखंड की कार्यक्रम पदाधिकारी वीणा कुमारी ने बताया कि बाढ़ से जल प्लावित होने वाले इस क्षेत्र को किस आधार पर जलसंकट ग्रस्त क्षेत्र में चुना गया मैं नहीं जानती। जुलाई में जब जल शक्ति अभियान शुरू किया गया उस वक्त से लेकर सितंबर तक इस समूचे इलाके में पानी भरा रहा। केंद्र के अधिकारी जांच के लिए आए थे लेकिन जल शक्ति अभियान के तहत एक भी जल संरचना का काम नहीं हो पाया। बाढ़ के दौरान लोगों को जागरुक करने व पानी का सही इस्तेमाल करने का काम किया था। इसलिए कुल 100 फीसदी में 11.15 अंक जल शक्ति अभियान में मिले हैं।

कटिहार की रैंकिंग स्कोर को देखे तो जिले को ब्लॉक एंड डिस्ट्रिक्ट कंजर्वेशन प्लान्स के लिए 10 फीसदी में 10 नंबर और किसान मेले के लिए 10 फीसदी में महज 0.15 नंबर मिले हैं जबकि वन सघन पौधारोपण आदि के लिए जिले को जीरो अंक मिला है।

जिले की प्लानिंग रिपोर्ट के मुताबिक यहां वन क्षेत्र खत्म हो चुका है। ऐसे में पौधारोपण के लिए क्या किया जा रहा है ? बिहार में जल जीवन हरियाली अभियान के तहत आगामी अगस्त में 2 करोड़ से अधिक पौधारोपण का लक्ष्य रखा गया है लेकिन जिले को अभी यह तक नहीं मालूम है कि किस ब्लॉक के किस पंचायत में कितने पौधे लगाए जाएंगे।

जिले के वन विभाग के एक अधिकारी ने नाम न बताने की शर्त पर कहा कि उनके पास अभी करीब 9.5 लाख पौधे हैं लेकिन उन्हें यह नहीं मालूम है कि किस जगह पर कितने पौधे लगाए जाएंगे। यह रिपोर्ट हमें ग्रामीण विकास विभाग से हासिल होनी है। यदि मार्च में रिपोर्ट नहीं मिल पाएगी तो अगस्त में व्यापक पौधारोपण का कार्यक्रम कैसे किया जाएगा ?

जिला ग्रामीण विकास विभाग की ओर से सभी ब्लॉक के कार्यक्रम पदाधिकारियों को 15 फरवरी, 2019 को प्रारूप भेजकर पौधारोपण के लिए संख्या व जगह संबंधी रिपोर्ट देने के लिए कहा गया था लेकिन किसी ने अभी तक यह काम नहीं किया है। कटिहार में जल शक्ति अभियान के फ्लॉप होने के बाद कुछ काम शुरु किए गए इनमें निजी खेतों पर पौधारोपण का काम शामिल है। द्वासय, भमरैली, डंडखोरा, महेशपुर ग्राम पंचायतों निजी जमीनों पर पौधारोपण किया गया। वहीं, पोखर भी निर्मित किए गए। सघन पौधारोपण और जलसंचय के काम को जिस मिशनमोड में किया जाना चाहिए था वह नहीं हुआ।

जिला पंचायती राज अधिकारी पंकज कुमार ने डाउन टू अर्थ से इस मामले में कहा कि उन्होंने जल्दी ही यहां का कामकाज संभाला हैं  ऐसे में अभी उन्हें पीछे हुए कार्यक्रम की जानकारी नहीं हैं। यही हाल जिलाधिकारी का भी है। यहां उनकी नई पोस्टिंग हुई है। उन्हें भी पीछे हुए कार्यक्रम की ज्यादा जानकारी नहीं हो पाई है। मनरेगा रिकॉर्ड के मुताबिक वाटर हार्वेस्टिंग और कंजर्वेशन के लिए जिले के 16 प्रखंडों में 2019-2020 के दौरान कुल 12 काम ही हो पाए हैं।

हर वर्ष बाढ़ के कारण मनिहारी पंचायत में काफी नुकसान होता है। हालांकि, बाढ़ के पानी का पारंपरिक जलस्रोतों के तहत संचय करने की कोई योजना नहीं है। न ही जिले में भू-जल, सतह के जल और पारंपरिक जल स्रोतों की उपलब्धता का कोई अध्ययन किया गया है। अत्यधिक आयरन और आर्सेनिक युक्त भू -जल की उपलब्धता वाले इस जिले में साफ पेयजल की आपूर्ति एक बड़ी चुनौती है।

बिहार में ग्रामीण क्षेत्रों में स्वच्छ पेयजल की आपूर्ति पीएचईडी के जरिए की जा रही है। वरिष्ठ सरकारी अधिकारी विनोद कुमार सिंह डाउन टू अर्थ से कहते हैं कि लोगों ने पहले खुद ही आयरन की मात्रा को कम करने का तरीका निकाला था। पूरे कटिहार में बेहद कम गहराई पर हल्के हैंडपाइप लोगों ने लगाए हैं। क्योंकि जितना गहराई से पानी निकलेगा उतना ज्यादा ही आयरन निकलेगा। बहरहाल अभी पानी का ऑक्सीडेशन करके साफ किया जा रहा है। 

यहां कभी पानी की कमी नहीं रही है। सरकार की ओऱ से अब हर घर नल जल पहुंचाने पर काम चल रहा है। आयरन का फिल्ट्रेशन करने के लिए भी काम चल रहा है। पानी टंकी बनाई जा रही है। वे कहते हैं कि यह नहीं कहा जा सकता कि इस जलापूर्ति से भू-जल पर दबाव नहीं बढ़ेगा, हालांकि यहां भू-जलस्तर 7 फीट से अधिकतम 15 फीट के भीतर ही रहता है।

कटिहार जिले के जल कार्यपालक अभियंता सुबोध शंकर ने बताया कि जिले में पानी की उपलब्धता का कोई आकलन नहीं किया गया है। हालांकि 2030 के आधार पर आबादी की मांग के अनुरूप प्रति व्यक्ति 81 लीटर प्रतिदिन के हिसाब से जलापूर्ति की जा रही है। अभी तक ग्रामीण क्षेत्रों में 200 पानी की टंकी बन चुकी है। वहीं 1000 के आस-पास काम लगभग पूरा होने वाला है। कटिहार में कुल 4000 पानी टंकी बननी है।

नीति आयोग के तहत जिले में कृषि संबंधी कार्यों के लिए तकनीकी ट्रेनिंग देने वाले पंकज पांडेय कहते हैं कि यहां फ्लड इरिगेशन ज्यादा होता है। रबी सीजन में अब गेहूं का रकबा साल-दर-साल कम होता जा रहा है हालांकि मक्के की पैदावार में किसानों का रुझान ज्यादा है। मक्के से किसानों को बेहतर आमदनी हो नम जाती है। इसके अलावा मखाना भी किसान पैदा कर रहे हैं। कटिहार में सिंचाई के दौरान पानी की न सिर्फ खपत ज्यादा है बल्कि उसका कुप्रबंधन भी है। यह एक चिंता का विषय है जिसपर काम किए जाने की जरूरत है।

एक तरफ पानी की आपूर्ति  के लिए भू-जल पर दबाव बढ़ेगा वहीं दूसरी तरफ खेती में अत्यधिक पानी वाली फसलों का चलन और भू-जल का सिंचाई के लिए अंधाधुंध और बेहिसाब इस्तेमाल कटिहार में जलसंकट पैदा कर सकता है।