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विश्व जल दिवस: जलवायु परिवर्तन से बढ़ेगी बाढ़-सूखे की घटनाएं, खाद्य सुरक्षा पर संकट

संयुक्त राष्ट्र की विश्व जल विकास रिपोर्ट कहती है कि आने वाले समय में जलवायु परिवर्तन की वजह से पानी या तो अधिक होगा या कम होगा, जिससे कृषि उत्पादकता कम होगी

By Shagun Kapil

On: Saturday 21 March 2020
 
In rural areas, hand pumps, which accounted for 42.9 per cent usage, was the most relied principal source of drinking water. Photo: Salahuddin
In rural areas, hand pumps, which accounted for 42.9 per cent usage, was the most relied principal source of drinking water. Photo: Salahuddin In rural areas, hand pumps, which accounted for 42.9 per cent usage, was the most relied principal source of drinking water. Photo: Salahuddin

 
संयुक्त राष्ट्र की विश्व जल विकास रिपोर्ट ने चेतावनी दी है कि जलवायु परिवर्तन से पानी की उपलब्धता पर प्रभाव पड़ेगा, जिसकी वजह से वैश्विक खाद्य उत्पादन का मौलिक स्वरूप बदल सकता है। इस तरह आने वाले समय में मौसम में छोटे से छोटा बदलाव भी खाद्य असुरक्षा (खाद्य कीमतों में वृद्धि) और ग्रामीण क्षेत्र में गरीबी की घटनाओं को बढ़ा सकता है। 
 
स्थानीय मौसम के स्वरूप में बदलाव की वजह से वर्ष 2040 तक चार प्रमुख फसल जैसे गेहूं, चावल, सोयाबीन और मक्का के उत्पादन पर प्रभाव पड़ने वाला है। इस प्रभाव को नेशनल प्रोसीडिंग्स ऑफ द नेशनल एकेडमी ऑफ साइंसेज ऑफ द यूनाइटेड स्टेट्स ऑफ अमेरिका (पीएनएस) में मई महीने में प्रकाशित शोध में दर्शाया गया है। इस रिपोर्ट का हवाला देते हुए संयुक्त राष्ट्र कहती है कि जलवायु परिवर्तन की वजह से ऐसे देशों में इन चार प्रमुख फसल वाले खेत या तो हमेशा सूखे में रहेंगे या तो अत्यधिक बारिश की वजह से डूब क्षेत्र बन जाएंगे। 
 
उदाहरण के लिए, 2020 और 2060 के बीच, भारत में इस वक्त गेहूं की खेती के लिए उपयोग में आने वाली 30 प्रतिशत भूमि ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन के वर्तमान रुझानों के तहत अधिक वर्षा प्राप्त करेगी। दूसरी तरफ मैक्सिको और दक्षिण अफ्रीका जैसे देश के 87 से 99 फीसदी तक गेहूं वाले खेत कम बारिश ग्रहण करेंगे। 
 
अनुमानों में दिखाया गया है कि अफ्रीका के कुछ हिस्सों के साथ अमेरिका, ऑस्ट्रेलिया और यूरोप के हिस्से सूख जाएंगे, जबकि उष्णकटिबंधीय और उत्तर में ओले गिरेंगे। भारत के लिए रुझान यह भी दर्शाता है कि चावल की खेती के लिए उपयोग होने वाली भूमि का 100 प्रतिशत, मक्का का 91 प्रतिशत और सोयाबीन का 80 प्रतिशत हिस्सा अगले 40 वर्षों के भीतर अत्यधिक बारिश वाली परिस्थितियों का सामना करेगा।
 
इससे यह साबित होता है कि कृषि कार्य की बढ़ती दर और दिनों-दिन मौसम के बढ़ते जोखिम और बदलाव से अगले 50-100 साल काफी कठिन होने वाले हैं। आने वाले समय में  तापमान और वर्षा में दीर्घकालीन बदलाव खाद्य सुरक्षा के लिए चिंता का कारण हैं। 
 
बावजूद इस तथ्य के कि वैश्विक खाद्य प्रणाली सामान्यतः बढ़ती कैलोरी की मांग को पूरा करती रही है, यह रिपोर्ट कहती है कि 82.1 करोड़ लोग (विश्व जनसंख्या का 11 फीसदी) कुपोषित ही हैं, और यह संख्या तेजी से बढ़ रही है। 
 
दुनिया भर में प्रमुख कृषि प्रणालियां, चाहे वह अर्ध शुष्क भारतीय उपमहाद्वीप हो, या उत्तरी अफ्रीका के मध्य क्षेत्र हों, सभी जलवायु परिवर्तन से पैदा हुए प्रभावों के लिए अत्यधिक असुरक्षित हैं।
 
मानसून प्रभावित भारतीय उप महाद्वीप में जलवायु परिवर्तन की वजह से बारिश में बढ़ोतरी बाढ़ की स्थिति पैदा करती है और इसकी कमी से सूखा और अत्यधिक तापमान की स्थिति बनती है। बर्फ के पिघलने से पैदा पानी पर निर्भर खेती जिसमें गंगा और ब्रह्मपुत्र से जुड़ी खेती आती है, वहां यह असुरक्षा और अधिक है। हालांकि, इस परिस्थिति से बचने की गुंजाइश पहले वाले मामले में काफी सीमित है। 
 
मानसून रहित उप सहारा अफ्रीका को असुरक्षा के मामले में सबसे अधिक असुरक्षित श्रेणी में रखा गया है, जिसकी वजह से उपज में कमी आ सकती है। साथ ही, बाढ़ या सूखा की घटनाएं बढ़ सकती है। 
 
पिछले 20 वर्षों में जमीनी सतह पर स्थित जल में कमी, भूजल की मात्रा में कमी, बारिश के चरम दिनों में वृद्धि या कमी और उससे उत्पन्न हुई बाढ़ की स्थिति जैसे बदलाव जलवायु परिवर्तन के प्रवाहक हैं, और इससे उत्पादकता कम हो रही है। 
 
यह रिपोर्ट कहती है कि वर्षा की अस्थिरता, और विशेष रूप से इसकी तीव्रता, बरसने की अवधि और बार-बार बरसने की आवृत्ति से कृषि की उत्पादकता पर असर हो रहा है। जलवायु परिवर्तन से पानी और और पानी की कमी या अधिकता से कृषि पर  बहुत अधिक प्रभाव पड़ता है। दुनिया के कई क्षेत्रों में पानी की कमी एक बड़ी चुनौती के रूप में सामने आ रही है। 
 
जल प्रबंधन कृषि कार्यों के लिए काफी महत्वपूर्ण है और फसल उत्पादन के लिए फसल चक्र में बदलाव कर कभी नकदी फसल तो कभी मुख्य खाद्य फसलों को उगाना जरूरी है। रिपोर्ट में कहा गया है कि जलवायु परिवर्तन को देखते हुए कृषि जल प्रबंधन के लिए दोहरी चुनौती है। 
 
रिपोर्ट के मुताबिक पहली चुनौती कृषि के वर्तमान स्वरूप को अपनाकर पानी की कमी और अधिकता (सूखा और बाढ़) की स्थिति से निपटने के लिए सूखे की स्थिति में पानी की उपलब्धता और बाढ़ की स्थिति में जल निकासी है। दूसरी चुनौती ग्रीन हाउस गैस को कम कर जलवायु परिवर्तन की रफ्तार को कम करने की है। 
 
यह 2017 के खाद्य और कृषि संगठन (एफएओ) की लंबी अवधि के अनुमानों को भी सामने लाता है, जिसमें कहा गया है कि कम और मध्यम आय वाले देशों विशेषरूप से मध्य पूर्व में कैलोरी की मांग एक साथ बढ़ेगी और जलवायु जोखिमों में बढ़ते हुए परिवर्तनों के परिणामस्वरूप उत्पादन जोखिम भी बढ़ेगा।
 
रिपोर्ट कहती है कि महज पानी की उपलब्धता में उतार चढ़ाव को ध्यान में रखकर योजना बनाने से कृषि उत्पादकता में मन मुताबिक फल नहीं मिलेगा। पानी को जलवायु परिवर्तन रोकने के दूसरे स्मार्ट तरीकों के साथ देखना होगा और जरूरी कदम उठाने होंगे। पूरे जल चक्र में बदलाव को इस तरह से लाना होगा ताकि यह कृषि की उत्पादकता पर सकारात्मक प्रभाव लाने के साथ ग्रीन हाउस गैस के उत्सर्जन को भी कम कर सके।