Sign up for our weekly newsletter

नदी, तालाब, चौरों की धरती क्यों हुई प्यासी

उत्तर बिहार, जहां 200 से अधिक छोटी-बड़ी नदियां, एक लाख तालाब और करीब 21 हजार छोटे-बड़े चौरा होने के बावजूद लोग पानी को तरस रहे हैं। इसकी वजह तलाशती एक श्रृंखला की पहली कड़ी - 

By Pushya Mitra

On: Tuesday 18 June 2019
 
नदी सूखने के बाद खड़ी नावों में खेलते बच्चे। फोटो: पुष्यमित्र
नदी सूखने के बाद खड़ी नावों में खेलते बच्चे। फोटो: पुष्यमित्र नदी सूखने के बाद खड़ी नावों में खेलते बच्चे। फोटो: पुष्यमित्र

एशिया में मीठे पानी की सबसे बड़ी और 15,594 एकड़ में फैली गोखुर श्रेणी की झील काबर इस साल पूरी तरह सूख गई है। गंडक के धारा बदलने से बनी इस झील में 106 किस्म के स्थानीय और 59 किस्म के प्रवासी पक्षी दिखते रहे हैं। यहां 41 तरह की मछलियां भी बड़ी संख्या में पाई जाती रही हैं। यह क्षेत्र के आसपास के मछुआरों के लिए आजीविका का बड़ा साधन रहा है।

उत्तर बिहार देश का जल संपन्न इलाका माना जाता है। यहां 200 से अधिक छोटी-बड़ी नदियां, लगभग एक लाख तालाब और करीब 21 हजार छोटे-बड़े चौरों (दलदली क्षेत्रों) की मौजूदगी है। यहां अमूमन हर साल बाढ़ आती है और बारिश भी ठीक-ठाक होती है। अब यह इलाका भीषण जल संकट की चपेट में है।

बात सिर्फ काबर झील की ही नहीं है। उत्तर बिहार के दरभंगा, मधुबनी, समस्तीपुर और मुजफ्फरपुर जिलों में जल स्तर तेजी से नीचे गिर रहा है और लोगों के हैंडपंप और बोरिंग सूख रहे हैं। दरभंगा और मुजफ्फरपुर शहर में टैंकर से पानी की आपूर्ति की जा रही है। दरभंगा से गांवों में हैंडपंप सूख रहे हैं। दरभंगा और मुजफ्फरपुर शहर में इन दिनों रोज दस-बीस जगह सबमर्सिबल बोरिंग होते दिख रहे हैं। कई जगह पानी 350 फीट तक पहुंच गया है। इन इलाकों में पानी अमूमन 60-70 फीट की गहराई में पानी मिल जाया करता था।

मिथिलांचल के सबसे प्रसिद्ध शहर दरभंगा की पहचान आज भी पग-पग पोखर, पान मखान से होती है। यानी यहां हर पग पर कोई न कोई तालाब मिल जाता है।इस शहर में आज पानी का गैलन लेकर लोग भटक रहे हैं। जिनके पास पैसा है वे धड़ल्ले से सबमर्सिबल बोरिंग करवा रहे हैं। शहर में आज की तारीख में नगर निगम टैंकरों से पानी की आपूर्ति करवा रहा है।महज चार-पांच साल पहले तक इसकी किसी ने कल्पना भी नहीं की थी।

इस विषय में बात करने पर दरभंगा के नगर निगम आयुक्त रवींद्र नाथ कहते हैं, “दरभंगा में पहली बार टैंकरों से पानी की नियमित आपूर्ति कराई जा रही है। इससे पहले टैंकर रहते थे, जो किसी आयोजन या आकस्मिक स्थिति में जलापूर्ति कराते थे। इस साल रोज 10 टैंकर और 11 ट्रैक्टरों पर पानी की टंकी लाद कर हमलोग उन इलाकों में जलापूर्ति करवा रहे हैं। ये टैंकर और ट्रैक्टर दिन में तीन से चार फेरे लगा रहे हैं।” उन्होंने कहा कि इसके अलावा हम लोगों को जागरूक भी कर रहे हैं कि वर्षा जल संचयन की विधि को अपनाएं ताकि जल संकट से मुकाबला किया जा सके।  

दरअसल ऐसा पहली बार हुआ है कि शहर में लगे हैंडपंप तक सूख गए हैं और लोगों को पीने के पानी के लिए अब नगर निगम के टैंकरों पर आश्रित होना पड़ रहा है।

उत्तर बिहार में बारिश में भी कमी आई है। यह भी पानी के संकट का बड़ा कारण माना जा रहा है। हालांकि 2001 के मुकाबले 2017 में कुछ जिलों में अधिक बारिश हुई है, लेकिन अधिकतर जिलों में औसत बारिश में कमी आई है। (देखें: आंकड़े )

नहीं ली जाती तालाबों की सुध 

पूरे राज्य में इसी तरह तालाबों पर अतिक्रमण किया जा रहा है। राज्य में कभी दो लाख से अधिक तालाब हुआ करते थे, लेकिन अब 98 हजार तालाब ही रह गए हैं। इस मामले में इकलौता सरकारी हस्तक्षेप यह हुआ कि 28 सितंबर, 2016 को पटना हाई कोर्ट ने तालाबों के अतिक्रमण के मसले पर चिंता व्यक्त की और राज्य सरकार से स्टेटस मांगा तो राज्य सरकार की ओर से पहली दफा राज्य के सभी जल निकायों का सर्वे हुआ। राज्य के भू-राजस्व विभाग ने हाई कोर्ट को 9 मार्च, 2017 को जानकारी दी कि इस वक्त राज्य में जल निकायों की कुल संख्या 1,99,248 है, इनमें 12,027 अतिक्रमण का शिकार हैं। अदालत ने सरकार को निर्देश दिया कि सिर्फ आदेश जारी करने से नहीं होगा, वह नियमित मॉनिटरिंग कर इन जल निकायों को 20 मई, 2017 तक अतिक्रमण से मुक्त कराए, मगर अदालत के आदेश के बावजूद जमीन पर इन जलनिकायों को अतिक्रमण मुक्त कराने के प्रयास कहीं नजर नहीं आए।

 

गदपुरा, बखारी रोड पर सूखा तालाब। फोटो: पुष्यमित्र