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मानसून का मिजाज

कई जगह में अनुमान से काफी ज्यादा बारिश दर्ज की गई। मानसून की गलत भविष्यवाणी अक्सर परेशानियों को सबब बनती है।

By Bhagirath Srivas, Akshit Sangomla

On: Wednesday 04 December 2019
 

भारत में इस साल मानसून की बिगड़ी चाल पर दस सवाल

सरकारी आंकड़ों के अनुसार, भारत में इस साल मानसून की क्या स्थिति है?

भारतीय मौसम विभाग (आईएमडी) ने अनुमान लगाया था कि इस साल मानसून सामान्य रहेगा। अब तक के रिकॉर्ड के मुताबिक, देश भर में मानसून की बारिश सामान्य से 5 प्रतिशत कम हुई है। भारत में मानसून का प्रवेश 30 मई को केरल में हुआ था। सितंबर के अंत तक इसके खत्म होने की उम्मीद है।
 
सामान्य मानसून क्या होता है?

19 प्रतिशत कम से 19 प्रतिशत अधिक बारिश तक को सरकार सामान्य मानसून मानती है। सरकार ने इस साल औसत से 4 प्रतिशत कम बारिश का अनुमान लगाया था। सरकार के अनुसार, यह आकलन सामान्य बारिश का द्योतक है।
 
मानसून पर सरकारी दावा कितनी सही है?

सरकार का औसत मानसून का अनुमान तो सही है लेकिन कई क्षेत्रों में बारिश की तीव्रता का अनुमान गलत साबित हुआ है। मतलब कई जगह में अनुमान से काफी ज्यादा बारिश दर्ज की गई। मानसून की गलत भविष्यवाणी अक्सर परेशानियों को सबब बनती है। दरअसल, भारत के ज्यादातर हिस्से में मौसम की भविष्यवाणी पर ही कृषि की बुआई निर्भर करती है। आईएमडी ने महाराष्ट्र के मराठवाडा में मानसून पूर्व बारिश को मानसून का आगमन बता दिया था। इस वजह से किसानों ने बुआई कर दी। सरकारी दावे के मुताबिक, बारिश नहीं हुई तो किसानों को भारी नुकसान पहुंचा। किसानों ने आईएमडी के खिलाफ पुलिस में शिकायत तक दर्ज करा दी थी।

 
बारिश की तीव्रता मापने के क्या पैमाने हैं?

आईएमडी के अनुसार, 0.1 से 2.4 मिलीमीटर बारिश को बहुत हल्की, 2.5 से 7.5 मिलीमीटर तक बारिश को हल्की, 7.6 से 35.5 मिलीमीटर बारिश को औसत, 35.6 से 64.4 मिलीमीटर बारिश को हल्की भारी, 64.5 से 124.4 मिलीमीटर बारिश को भारी, 124.5 से 244.4 मिलीमीटर बारिश को बहुत भारी, 244.5 मिलीमीटर से अधिक बारिश को अतिशय भारी बारिश कहा जाता है। इसके अलावा असाधारण भारी बारिश उस स्थिति को कहा जाएगा जब किसी खास जगह या उसके आसपास मासिक या मौसमी रिकार्ड के बराबर बारिश होती है।  लेकिन यह 120 मिलीमीटर से ज्यादा होनी चाहिए।
 
अतिशय (एक्सट्रीम) बारिश की इस साल कितनी घटनाएं हुई हैं?

भारत में इस साल अतिशय बारिश की 21 घटनाएं हुई हैं। माउंट आबू में 23 जुलाई को 24 घंटे के अंदर 770 मिलीमीटर बारिश हुई जबकि यहां का सालाना औसत 1600 मिलीमीटर है। दूसरे शब्दों में कहें तो साल की आधी बारिश एक दिन में हो गई। इसी तरह बैंगलोर, मुंबई और चंडीगढ़ में अतिशय घटनाएं हुईं। मुंबई में 29 अगस्त को 331.4 मिलीमीटर बारिश हुई। यह पिछले दो दशकों में एक दिन की सबसे ज्यादा बारिश थी। अतिशय बारिश की घटनाएं तो हर साल होती हैं। ये प्रत्याशित जगह पर होती रही हैं लेकिन अब अप्रत्याशित जगहों पर भी ऐसी घटनाएं हो रही हैं।
 
अतिशय बारिश के क्या नतीजे निकलते हैं?

अतिशय बारिश की स्थिति में पानी जल्दी-जल्दी बरसकर बह जाता है। यानी पानी ठहर नहीं पाता। इससे भूमिगत जलस्तर पर खास असर नहीं पडता। सरकार आंकड़ों में यह बारिश दर्ज हो जाती है लेकिन इसका कोई फायदा नहीं मिलता। भारी बारिश के कारण अक्सर बाढ़ आ जाती है और जनजीवन पर गहरा असर पड़ता है।
 
इस साल बाढ़ से जानमाल को कितना नुकसान हुआ है?

गृह मंत्रालय की रिपोर्ट के अनुसार, इस साल बाढ़ से अब तक 265 जिले प्रभावित हुए हैं। इनमें 2000 से ज्यादा लोगों की मौत हुई जबकि 46 लाख हेक्टेयर फसल बर्बाद हुई है। पशुधन को भी भारी नुकसान पहुंचा है।
 
भारी बारिश वाले जिलों में क्या सूखे की भी आशंका है?

हां, भारी बारिश वाले जिलों में सूखे का खतरा बना हुआ है। उदाहरण के लिए उत्तर प्रदेश के कुशीनगर में भारी बारिश के कारण बाढ़ आ गई। लेकिन आईएमडी के मानें तो यहां बारिश अब तक औसत से 63 प्रतिशत कम हुई है। देश के कई जिलों का यह हाल है। असम, बिहार, उत्तर प्रदेश आदि राज्यों में ऐसे हालात हैं।
 
सूखे की आशंका पर सरकार का क्या पक्ष है?  

राष्ट्रीय कृषि एवं सूखा आकलन तंत्र के अनुसार, भारत में 235 जिले में सूखे की आशंका है। लेकिन कृषि मंत्रालय का कहना है कि सिर्फ 95 जिलों में ही सूखे की आशंका है। मंत्रालय के मुताबिक, इस साल भी पिछले साल जितनी पैदावार होगी जबकि सबसे अधिक उपजाऊ राज्य पंजाब, हरियाणा और मध्यप्रदेश में इस साल क्रमश 20, 25 और 19 प्रतिशत कम बारिश हुई है।  
 
अतिशय बारिश और असामान्य मानसून के लिए क्या वैश्विक तापमान जिम्मेदार है?

जानकार अतिशय बारिश की घटनाओं के लिए वैश्विक तापमान को जिम्मेदार मान रहे हैं। 2011 में अर्थ सिस्टम साइंस जर्नल में प्रकाशित शोधपत्र के अनुसार, वैश्विक तापमान के कारण अतिशय बारिश की घटनाएं दक्षिण, पूर्व और उत्तर पूर्व भारत में बढ़ेंगी। इस संबंध में आए कई शोध भी इसे वैश्विक तापमान से जोड़ते हैं।

प्रस्तुति: भागीरथ और अक्षित