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क्या मध्य-पूर्व से आने वाली धूल से प्रभावित हो रहा है भारतीय मानसून

शोध से पता चला है कि मध्य-पूर्व से आने वाली धूल भारत में होने वाली मानसूनी बारिश में इजाफा कर सकती है

By Lalit Maurya

On: Thursday 01 April 2021
 

हाल ही में कंसास विश्वविद्यालय द्वारा किए शोध से पता चला है कि कैसे मध्य-पूर्व से आने वाली धूल भारत में मानसून को प्रभावित कर रही है। इससे जुड़ा शोध जर्नल अर्थ साइंस रिव्यु में प्रकाशित हुआ है। यदि भारतीय मानसून की बात करें तो यह दुनिया के सबसे शक्तिशाली मानसून सिस्टमों में से एक है।

भारत में मानसून न केवल जलवायु के दृष्टिकोण से बल्कि सामाजिक और आर्थिक रूप से भी बहुत महत्व रखता है। यह न केवल पीने के पानी की जरूरतों को पूरा करता है साथ ही बहुत हद तक कृषि भी इस पर निर्भर करती है। शोध से पता चला है कि मध्य पूर्व के रेगिस्तानी इलाकों से चलने वाली हवाओं और उसके साथ आने वाले वायुमंडलीय धूल कणों से भारत में मानसून कहीं ज्यादा शक्तिशाली हो जाता है।

इस शोध से जुड़े प्रमुख शोधकर्ता किंजियान जिन ने बताया कि, “हम जानते हैं कि रेगिस्तानी हवा के साथ आने वाले धूल कण सौर विकिरण को अवशोषित कर सकते हैं। सौर विकिरण को अवशोषित करने के बाद यह धूलकण बहुत ज्यादा गर्म हो जाते हैं। यह गर्म धूल कण वायुमंडल को इतना ज्यादा गर्म कर सकते हैं कि उससे हवा का दबाव बदल जाता है और हवाओं के सर्कुलेशन पैटर्न में बदलाव आ सकता है।” इस घटना को, 'एलिवेटेड हीट पंप' कहा जाता है, जो समुद्र से भारतीय उपमहाद्वीप पर नमी को बढ़ाता है।

एक तरफ यह धूल कर रही है मानसून को प्रभावित, वहीं इसका विपरीत भी पड़ रहा है असर

जिन के अनुसार गर्मियों में चलने वाली तेज हवाएं, भारतीय मानसून की बड़ी विशेषता है। एक बार जब हवाएं बदल जाएंगी तो समुद्र से आने वाली नमी की मात्रा भी बदल जाएगी, जिसके कारण वो भारी बारिश कर सकती है। एक तरफ मध्य-पूर्व से आने वाली धूल जहां भारतीय उपमहाद्वीप में मानसून को और शक्तिशाली करती है वहीं दूसरी तरफ इसका विपरीत असर भी पड़ता है। मानसून, मध्य-पूर्व से चलने वाली हवाओं को और बढ़ा सकता है, जिससे वो कहीं अधिक धूल लेकर आ सकती हैं। इस तरह यह लूप चलने लगता है।

इस बारे में जिन ने बताया कि मानसून, धूल की मात्रा को प्रभावित कर सकता है। जब मानसून मजबूत होता है तो ऊपरी वायुमंडल भी गर्म हो जाता है। मानसून से जुड़ा संवहन बहुत अधिक ऊंचाई लगभग 10 किलोमीटर तक जा सकता है। जब मानसून के ऊपर हवा का यह पैटर्न गर्म हो जाता है, तो इससे तरंगे उत्पन्न होने लगती हैं। इस क्षेत्र में पहले उच्च दबाव, फिर निम्न दबाव और फिर उच्च दबाव होता है। यह तरंगे हवा को मध्य-पूर्व की ओर ले जा सकती हैं।

भारतीय उपमहाद्वीप के ऊपर से जाने वाली यह हवाएं मध्य-पूर्व में जाकर नीचे की ओर आ जाती हैं और जब वो सतह से टकराती हैं तो वो अधिक मात्रा में एयरोसोल को उठा सकती हैं। उनके अनुसार इसके साथ-साथ ईरान का पठार भी इस धूल की मात्रा को प्रभावित करता है और वो भी मानसून में बारिश को और बढ़ा सकता है।

जिन के अनुसार उन्होंने इसके साथ-साथ तीन अन्य कारकों को भी समझने का प्रयास किया है जिसमे पहला स्नो-डार्कनिंग इफेक्ट है जिसमें ब्लैक कार्बन और धूल बर्फ की परावर्तनशीलता को कम करते हैं, इससे भूमि और ऊपरी क्षोभमंडल ज्यादा गर्म हो जाता है। दूसरा सोलर डिमिंग इफेक्ट है जिसमें वायुमंडल में मौजूद एयरोसोल भूमि की सतह को ठंडा कर देते हैं। तीसरा यह है कि एयरोसोल में बदल चुके धूल के कण किस तरह बारिश को प्रभावित करते हैं।

जिन ने बताया कि जिस तरह से जलवायु में परिवर्तन आ रहा है ऐसे में इसे समझना बहुत मायने रखता है। पता चला है कि एशिया में कई स्थानों पर भूमि सुख जाएगी। ऐसे में हमें उम्मीद है कि कहीं ज्यादा धूल का उत्सर्जन होगा और यह धूल यहां के मौसम में बहुत महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगी। यह सही है कि पूर्वी चीन, पूर्वी एशिया और भारत में वायु प्रदूषण बढ़ रहा है। लेकिन जैसे ही वायु प्रदूषण के स्तर में गिरावट आएगी तो उससे वातावरण में प्राकृतिक धूल का अनुपात बढ़ जाएगा, जिससे भविष्य में वो मानसून में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगी।