क्या जून 2019 अब तक का सबसे सूखा महीना साबित होगा

मानसून का एक चौथाई मौसम पूरा होने वाला है। मौसम का इतिहास बताता है कि यह अच्छे संकेत नहीं हैं 

By Akshit Sangomla, Raju Sajwan

On: Thursday 20 June 2019
 
Photo: Moyna
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जून के अंत तक मानसून का एक चौथाई मौसम पूरा हो जाएगा, लेकिन बारिश के अब तक के जो आंकड़े सामने आ रहे हैं, उसके मुताबिक जून से सितंबर तक चलने वाले मानसून सीजन में अब तक केवल 17 फीसदी बारिश हो जाती है, लेकिन मौसम विभाग के आंकड़े बताते हैं कि 18 जून तक मानसून में 44 फीसदी की कमी दर्ज की गई है।

हालांकि अभी महीने को समाप्त होने में 10 दिन का समय बचा है।  और उम्मीद की जा रही है कि अभी मानसून गति पकड़ेगा, लेकिन 18 जून तक केरल और कर्नाटक के बीच मानसून की जो गति रही है, वो काफी धीमी है। 

 18 जून तक जो बारिश हुई है यदि स्थिति ऐसी ही रहती है और उसमें सुधार नहीं होता है तो भारत को सबसे सूखे जून का सामना करना पड़ सकता है। 

 18 जून तक सामान्य बारिश 82.4 मिली मीटर होनी चाहिए थी, लेकिन केवल 46.1 मिलीमीटर की हुई है। 1901 में मौसम की गणना शुरू हुई थी और तब से लेकर अब तक 2014 में जून का महीना सबसे साबित हुआ था। उस साल 1 जून से लेकर 28 जून के बीच 85.8 मिलीमीटर बारिश हुई थी और उस समय औसत बारिश से 42 फीसदी कम रिकॉर्ड की गई थी।

 1901  से लेकर अब ऐसा केवल तीन बार हुआ है, जब जून के महीने में 100 मिलीमीटर से कम बारिश हुई। जून 1905 में 88.7 एमएम बारिश हुई थी उसके बाद 1926 में 97.6 एमएम बारिश हुई। दोबारा 83 साल बाद 2009 में जून माह में 85.7 एमएम बारिश हुई। वह साल अब तक का सबसे सूखा वर्ष साबित हुआ था।

इस बारे में स्काईमेट वेदर सर्विसेज के मुख्य वैज्ञानिक महेश पालावत बताते हैं कि मानसून की हवाएं जो अभी दक्षिणी कर्नाटक या कुछ उत्तरी पूर्वी भारत में पहुंची हैं। वह प्रारंभिक स्थिति में हैं। 21 जून के बाद हालात बदल सकते हैं।

 मानसून की वर्तमान दशा के लिए अरब सागर में बने वायु चक्रवात को कारण बताया जा रहा है यह हवाएं तब ही सामान्य स्थिति में आ सकती हैं जब भारतीय उपमहाद्वीप की तरफ मानसून की प्रगति तेज हो।

 डाउन टू अर्थ में कुछ समय पहले सूखे से संबंधित चेतावनी के बारे में एक रिपोर्ट में कहा था कि भारत का लगभग 44 फ़ीसदी हिस्सा सूखे की स्थिति में है। यह रिपोर्ट 10 जून को की गई थी, जो पिछले साल के मुकाबले 11 फीसदी अधिक है। इस बार मानसून ने देरी से प्रवेश किया है, बल्कि अब तक पिछले 65 साल के इतिहास में यह दूसरा सूखाग्रस्त प्री-मानसून वर्ष भी साबित हो रहा है।

इंडियन इंस्टिट्यूट ऑफ टॉपिकल मेट्रोलॉजी-2013 में वैज्ञानिकों ने 1871 तक के मानूसन आंकड़ों का अध्ययन किया था। जिसमें कहा गया है कि यदि जून में मानसून की बारिश कम होती है तो मानसून की बारिश में 77 फीसदी तक की गिरावट के आसार रहते हैं।

इससे पहले स्काईमेट वेदर ने चेतावनी जारी कर चुका है कि जून माह में देशभर के कम से कम 66 जिलों में 40 फीसदी कम बारिश हो सकती है, लेकिन मौसम विभाग के अपने आंकड़े बताते हैं कि जून माह में मानसून में कमी के आंकड़े और ज्यादा परेशान करने वाले हैं।

यहां यह उल्लेखनीय है कि जून माह शुरू होने वाले मानसून से हमारा फसल बुवाई का समय शुरू हो जाता है। जुलाई में मानसून पीक पर होता है और लगभग एक तिहाई मानसून जुलाई में ही पूरा हो जाता है।

इतिहास बताता है कि जुलाई में बारिश में कमी होने से सूखे की संभावना बढ़ जाती है। 1877 से 2005 के बीच देश को छह दफा भीषण सूखे का सामना करना पड़ा और इन सालों में जुलाई माह में कम मानसून की वजह से देश को सूखे का सामना करना पड़ा।