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जुदा है यह मानसून

लगातार तीन वर्षों से सूखे और की मार झेल रहे किसानों की आय में इस बार भी बढ़ोतरी मुश्किल है। बंपर पैदावार भी उनके आय की गारंटी नहीं रह गई। वहीं, सबसे करीबी मानसून ने भी उनका साथ छोड़ दिया है।

By Richard Mahapatra

On: Thursday 23 May 2019
 

मानसून भारतीय सीमा में दाखिल हो चुका है। भारतीय मौसम विभाग की मानें तो इस बार का मानसून एकदम सामान्य है और बारिश का वितरण भी सामान्य ही रहेगा। हमेशा की तरह इस बहुप्रतीक्षित मौसम का स्वागत किसान और सरकार दोनों करते हैं। लेकिन इस बार का मानसून दोनों के लिए बिल्कुल जुदा होगा।

यह साल उन चुनिंदा वर्षों की सूची में शामिल हो गया है, जिसमें मानसून ने तब प्रवेश किया है जब भारत के कई जिले सूखाग्रस्त हैं। इनमें से आधे से ज्यादा जिले ऐसे हैं जो लगातार पांचवी बार सूखे की मार झेल रहे हैं।

अक्षय तृतीया भारतीय कृषि चक्र की शुरुआत को माना जाता है। अच्छी बारिश न होने और मायूसी के कारण कई किसान बारिश का अनुमान लगाने के लिए अपनी पुरानी व्यवस्था की तरफ लौट आए हैं। हालांकि मानसून के अलग होने के कई और दूसरे कारण भी हैं।

सामान्य तौर पर मानसून सीजन भारत की सबसे बड़ी निजी इंटरप्राइजेज यानी कृषि क्षेत्र के लिए अप्रैजल (वेतन बढ़ोतरी) लेकर आता है। हमारी तरह किसान की भी आय में मानसून का वक्त बढ़ोतरी का समय है। इस बढ़ोतरी का कारक मानसून ही रहा है। वहीं, उत्पादन में सिर्फ किसानों का ही एकाधिकार है। हमें याद रखना चाहिए कि सिर्फ किसान ही दुनिया में एकमात्र उत्पादक हैं और इसके सिवा सबकुछ निर्मित है।

लेकिन इस वर्ष की एक चिंता है : मानसून इस बार किसानों की आय का प्रबल कारक नहीं बनेगा। यह भी नहीं होगा कि वे जितना उत्पादन करेंगे उसके एवज में उनकी आय में बढ़त हो जाए। क्या बीते वर्ष इस देश के इतिहास में किसानों ने सबसे ज्यादा उत्पादन नहीं किया था? लेकिन आधिकारिक आंकड़ा बताता है कि उनकी आय में कोई बढ़ोतरी नहीं हुई। आय बढ़ना तो दूर यह लगातार तीसरा वर्ष है जब किसानों की आय में गिरावट हुई है।

वे मानसून को लेकर उत्साह मना सकते हैं लेकिन अब यह मानसून उनकी आय को बढ़ाने का कारक नहीं रह गया है। यह सिर्फ सालाना एक छोटी अवधि का रोमांस भर बचा है। व्यावसायिक मापदंडो की तरह किसान भी व्यापार की कठिन शर्तों को पूरा करते हैं। अनुमानित   सामान्य मानसून को छोड़ दिया जाए तो अन्य सभी दूसरी शर्तें उनके पक्ष की नहीं होती।

वे अच्छी तरह से जानते हैं कि बंपर पैदावार के बावजूद बाजार उनको उचित दाम देने में सक्षम नहीं है। उपभोक्ता लगातार कम से कम खर्च की तरफ बढ़ रहे हैं जबकि खाद्य मुद्रास्फीति अपने सबसे निचले पायदान पर पहुंच गई है।

कुछ पल के लिए खाद्य मुद्रास्फीति में बढ़त हुई। व्यापार विशेषज्ञों ने आयात पर नियंत्रण की बात कही और घरेलू उत्पादकों को प्रतिकूल शर्तों के साथ छोड़ दिया गया। यह मानसून भी अनिश्चितता से भरा है। अल-नीनो भले ही कमजोर है लेकिन यह सामान्य मानसून के पैटर्न को नुकसान पहुंचा सकता है। इसका परिणाम असमय वर्षा, अतिशय मौसम और खड़ी फसलों का सीधे नुकसान के तौर पर हो सकता है। किसान के लिए यह कटाई से पहले ही यानी रिटर्न मिलने से पहले ही निवेश किए गए पैसे के डूबने जैसा है। बीते तीन वर्षों में करीब 500 मौके ऐसे रहे हैं।

उद्यमी किसान और उत्पादन का एकाधिकार भी मददगार नहीं : बीमा योजनाएं किसानों की चिंताओं का बहुत थोड़ा और अपर्याप्त हिस्सा ही कवर करती हैं। किसानों के जरिए होने वाले ज्यादातर पूंजी निवेश का स्रोत अनौपचारिक और उच्च ब्याज वाला होता है। ऐसे में आय न बढने की नाउम्मीदी के बीच शायद ही वे भविष्य के नुकसान की भरपाई कर सकते हैं।

इस वर्ष किसानों ने बेहद ही खराब स्थितियों में निवेश किया है। कई वर्ष से किसानों की आय नहीं हो रही है और वे लंबे समय से सूखे की मार भी झेल रहे हैं। मिट्टी में नमी भी नहीं है जो मानसून के खराब होने पर स्थिति को संभाल सके। एक बड़े उद्यम के चालक के तौर पर वे राजनीतिक शक्ति का आनंद लेते हैं लेकिन यह मानसून उनके एहसास को असहज बना देगा। वे उधार पर बेचे गए माल का सही दाम हासिल करने के लिए कई दिन धरना दे सकते हैं इसके बावजूद वे व्यापार की शर्तों को बदल नहीं सकते।  

वे उपभोक्ता को भी नहीं समझा सकते कि अनाज की थोड़ी सी बढ़ी हुई कीमत उत्पादक की मदद के लिए जरूरी है। व्यापार में शामिल हर एक व्यक्ति सामान्य तौर पर लाभ और फायदे की मांग को अधिकार के तौर पर रखता है। किसानों ने भी व्यापार के एक नई शुरुआत के लिए मदद की मांग की थी। जैसे हम एयर इंडिया के लिए बेलआउट पैकेज व बैंकों के जरिए डील किए जाने वाले नॉन प्रॉफिट एसेट के बारे में सुनते हैं। लेकिन यह भी उन्हें न मिल सका।  मानसून के समय वर्षा की बूंदे खेतों पर गिरेंगी उनमें से ज्यादातर उनकी उम्मीदों की तरह गायब हो जाएंगी। वे अकेलापन महसूस करेंगे। यह युद्ध हारने जैसा नहीं होगा बल्कि यह जीने के लिए जरूरी तरीके को खोने जैसा होगा। वे अल्पसंख्यक हैं। देश के 100 जिलों में सिर्फ 50 फीसदी लोग कृषि पर निर्भर हैं।