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जंगली मधुमक्खियों और देशी पौधों की 94% प्रजातियां हो गई गायब

एक अध्ययन में पाया गया कि पिछले 30 वर्षों में दुनिया भर में खासकर उत्तर-पूर्वी अमेरिका में जलवायु परिवर्तन और कृषि के बढ़ते दायरे से मधुमक्खियों के आवास समाप्त हो गए

By Dayanidhi

On: Thursday 16 July 2020
 
Photo: Flickr
Photo: Flickr Photo: Flickr

 

हाल ही में परागण करने वाले जीवों की तरफ ध्यान खींचने के लिए राष्ट्रीय परागणक सप्ताह मनाया गया था। दुनिया भर में कई कारणों से इनकी संख्या लगातार कम हो रही है। इनमें अधिकतर मधुमक्खियों और पौधों की प्रजातियों का जीवन एक दूसरे पर निर्भर करता है।    

इसी को लेकर अमेरिका की यॉर्क यूनिवर्सिटी के शोधकर्ताओं ने मधुमक्खियों और पौधों की प्रजातियों पर एक अध्ययन किया है। अध्ययन में पाया कि पिछले 30 वर्षों में दुनिया भर में खासकर उत्तर-पूर्वी अमेरिका में जलवायु परिवर्तन और कृषि के बढ़ते दायरे से मधुमक्खियों के आवास समाप्त हुए है। इसके कारण पौधों में परागणकर्ता (पॉलिनेटर) नेटवर्क का 94 प्रतिशत नुकसान हुआ है।  

शोधकर्ता और विज्ञान संकाय के प्रोफेसर सैंड्रा रेहान और न्यू हैम्पशायर विश्वविद्यालय के स्नातक छात्र मिन्ना माथियासन ने वर्तमान समय और आंकड़ों के माध्यम से 125 साल पहले के पौधों में परागणकर्ता नेटवर्क का विश्लेषण किया। नेटवर्क में जंगली मधुमक्खियों और देशी पौधे शामिल थे, उनमें से अधिकांश अब गायब हो गए हैं। यह अध्ययन इन्सेक्ट कंजर्वेशन एंड डाइवर्सिटी पत्रिका में प्रकाशित हुआ है।

लगभग 30 प्रतिशत पौधे-परागकण नेटवर्क से पूरी तरह से गायब हो गए थे, जिनमें से या तो मधुमक्खियां, पौधों अथवा दोनों के गायब होने के बारे में बताया गया है। एक और 64 प्रतिशत नेटवर्क के नुकसान से जंगली मधुमक्खियां, जैसे कि मजदूर मक्खियां, या देशी पौधे, जैसे सुमेक और विलो, अभी भी पारिस्थितिक तंत्र में मौजूद हैं, लेकिन मधुमक्खियां अब उन पौधों पर नहीं बैठती हैं। क्योंकि इनका आपसी जुड़ाव अब समाप्त हो गया है।

पौधों के परागणक नेटवर्क के शेष छह प्रतिशत अभी भी मौजूद हैं, यहां तक कि छोटी मधुमक्खियां जो परागण का काम करती हैं।

नेटवर्क में होने वाले नुकसान के कई कारण हैं। जिनमें से जलवायु परिवर्तन सबसे बड़ा कारण है। रेहान कहते हैं कि पिछले 100 वर्षों में वार्षिक तापमान में 2.5 डिग्री का बदलाव आया है। यह उस समय खिलने वाले पौधों में बदलाव करने के लिए पर्याप्त था।

एक मधुमक्खी के लिए जो महीनों बाहर रहती है, जो कि एक सामान्य परागणकर्ता है, यह वातावरण उसके लिए ठीक है, लेकिन एक मधुमक्खी जो वर्ष के केवल दो सप्ताह के लिए बाहर रहती है और केवल कुछ ही फूलों पर बैठती है, यह उसके लिए विनाशकारी हो सकता है। मधुमक्खियों की अलग प्रजातियों में और पौधों की आक्रामक (इनवेसिव) प्रजातियों में वृद्धि भी नेटवर्क में गिरावट का एक और कारण है।

रेहान कहते हैं हमें हर साल बहुत सारी आक्रामक प्रजातियां और इस प्रजाति के नए रिकॉर्ड मिल रहे हैं। यह आम तौर पर व्यापार और सजावटी पौधों के माध्यम से होता है। इनमें से बहुत सी मधुमक्खियां पेड़ों की शाखाओं में रहती हैं, इसलिए बिना जाने-समझे मधुमक्खी की प्रजातियां पौधों के साथ आयात हो जाती हैं।

शोधकर्ताओं का कहना है कि वन्य जीवों की जैव विविधता में सुधार के लिए आवासों की बहाली और कृषि भूमि में देशी फूलों के पौधों की वृद्धि महत्वपूर्ण है, लेकिन लोगों के लिए खाद्य सुरक्षा भी जरूरी है।

मधुमक्खियां और अन्य परागणकर्ता हमारे द्वारा खाए जाने वाली फसलों का परागण करके दुनिया भर में सैकड़ों अरबों रुपये के अनाज पैदा करने में मदद करते हैं। जंगली मधुमक्खियां 87 प्रतिशत या 308,006 से अधिक फूलों के पौधों की प्रजातियों में परागण करने वाली सूची में सबसे ऊपर हैं। इनमें से कई फसलें आर्थिक, व्यावसायिक रूप से महत्वपूर्ण हैं, जैसे सेब और ब्लूबेरी।

रेहान कहते हैं इन जंगली परागणकर्ताओं की आबादी और पौधों की प्रजातियों के साथ उनके विशेष, विकासवादी संबंधों को प्रभावित करने वाली, पर्यावरणीय परिस्थितियों की गहरी समझ हासिल करने की तत्काल आवश्यकता है।