साहित्य में पर्यावरण: सौंदर्य से महासंकट तक

साहित्य की प्रकृति और पर्यावरण के साथ जुड़ाव की परम्परा आधुनिक काल में छायावाद के कवियों में एक लम्बे अन्तराल के बाद प्रकट होती दिखती है

On: Monday 11 October 2021
 
सौंदर्य से महासंकट तक

रणेंद्र 

भारतीय इतिहास में प्रकृति और पर्यावरण आदिकाल से ही अपनी उपस्थिति दर्ज करवाते रहे हैं। वैदिक ऋचाओं के रचयिता आर्ष कवियों ने प्रकृति के विभिन्न रूपों का दैवीकरण किया, फिर उनके कार्य-व्यापार का सूक्ष्म निरूपण कर अपनी काव्य प्रतिभा का परिचय दिया है। ऋग्वेद में सबसे ज्यादा, ढ़ाई सौ (250) अद्भुत ऋचाएँ वर्षा के देवता इन्द्र की प्रशंसा में रची गई हैं। यथा,“इन्द्रस्य नु वीर्याणि प्रवोचं यानि चकार प्रथमानि वज्ररी। /अहन्नहिमन्वस्ततर्द प्रवक्षणा अभिनत् पर्वतानाम्।।

वज्र को धारण करने वाले इन्द्र ने जो पहले पराक्रम युक्त कार्य किए, उन्हीं को शीघ्र ही बताता हूँ। उन्होंने मेघ का वध किया। उसके पश्चात् उन्होंने वृष्टि की। प्रवहनशील पार्वत्य नदियों का मार्ग भिन्न किया”(एएल बाशम -अद्भुत भारत/पृ॰ 287)

वैदिक कवियों ने अपनी कल्पना के अद्भुत प्रसार से दैवीकृत प्राकृतिक शक्तियों के बीच विभिन्न प्रेम रूपों का विस्तृत चित्रात्मक विवरणियाँ प्रस्तुत की हैं, यथा; आकाश और उषा, धावा-पृथ्वी, धौस-सूर्य में क्रमशः पिता-पुत्री, पति-पत्नी, पिता-पुत्र के स्नेह सम्बन्ध अभिव्यक्त किए। किन्तु आकर्षण की पूर्ण गहनता और रसिकता इन प्राकृतिक दैवीकृत शक्तियों के बीच प्रेमी-प्रेमिका रूप के वर्णन में ही प्रकट होती है, यथा; शुभ्रवसना और हास्यवदना उषा प्रणय पात्र सूर्य के प्रति अपनी सौन्दर्य राशि को उसी प्रकार खोल देती है, जैसे पत्नी अपने पति के प्रति अपने लावण्य को अर्पित कर देती है : “जायेव पत्य उशती सुवासा उषा हस्रेव नि रिणीते अप्सः” (ऋग्वेद 1, 124.7)

संस्कृत साहित्य परम्परा में प्रकृति अपनी पूर्णता के साथ कालिदास और भवभूति के यहाँ उपस्थित होती है। ‘मेघदूतम्’ में प्राकृतिक वातावरण की स्वच्छन्दता-नैसर्गिकता के चित्र ‘कुमारसम्भवं’ के तीसरे सर्ग में वसन्त-वर्णन, ‘रघुवंशं’ के तेरहवें सर्ग में समुद्र का अत्यन्त सजीव-स्वाभाविक चित्रण आदि ही दरअसल उन्हें संस्कृत-काव्य का सिरमौर बनाते हैं।

जीवनीकार गोके भट के अनुसार, “भवभूति के प्रकृति वर्णन यह प्रकट करते हैं कि प्रकृति का एक ही पुत्र, कालिदास नहीं है; बल्कि दूसरा भी है भवभूति। किन्तु दोनों में एक अन्तर भी है।

कालिदास प्रकृति के कोमल-कान्त रूपों का वर्णन करने में अधिक रूचि लेते थे :

मृदु लताएँ और कुसुम; कोमल पत्र और कमल-नाल, प्रवाहमयी सरिताएँ और शान्त सरोवर; छाया-निकुंज और मन्द समीर; मनोहर चन्द्रमा और चन्दन की शीतल सुगंध।

ये बिम्ब भवभूति के प्रेमकाव्य में मिलते हैं अवश्य, किन्तु उनकी रूचि प्रकृति के भव्य भीतिकर, चित्र-विचित्र रूपों का चित्रण करने में अधिक है। यदि कालिदास के काव्य में प्रकृति प्रशान्त आनन्द की कल्पना-तरंग में निमग्न है, तो भवभूति के काव्य मे वह चेतना और भावना से उत्स्फूर्त तथा नाद और उद्वेग से निनादित है। वे प्रकृति के ऐसे चित्र खींचते हैं जिनमें भव्यता तथा प्रायः रोमांचकारी और विस्मयकारी सुन्दरता रहती है : उत्तर-रामचरित के दूसरे और तीसरे अंकों में पंचवटी और दंडक वन का वर्णन, अथवा मालती-माधव के पाँचवें अंक में श्मशान का वर्णन।” (गोके भट : भवभूति/ पृष्ठ 69-70)

तुलसीदास संस्कृत-साहित्य के सच्चे उत्तराधिकारी के रूप में सोलहवीं सदी में अन्य भक्त कवियों के साथ उपस्थित होते हैं। रामचरितमानस के अरण्यकांड में उनके यहाँ भी प्रकृति अपने विविध रूपों की छटा बिखरा रही है। समालोचक नंदकिशोर नवल का मानना है कि सीता-हरण के बाद उनके विरह में भटकते राम का वर्णन कालिदास के नाटक ‘विक्रमोर्वशीय’ से प्रभावित है।

उनके अनुसार, “सीता के विरह में राम जो भटकते हैं और वन के जीव-जंतुओं से उनका पता पूछते हैं, वह सीधे कालिदास के उक्त नाटक से लिया गया है वन में जब उर्वशी स्त्रियों के लिए निषिद्ध कुमार वन में चली गई और वहाँ लता-रूप में परिणत हो गई, तो पखु रवा उसके वियोग में व्याकुल हुआ। वह वन की सभी वस्तुओं से उसके बारे में पूछता चला। ...अरण्यकांड में राम के विरहाकुल मानवीयरूप का दर्शन करें, जो थोड़े बहुत अंतर के साथ पखु रवा की उक्तियों से प्रभावित हैं:

हे खग मृग हे मधुकर श्रेनी/ तुम्ह देखि सीता मृगनैनी। / खंजन सुख कपोत मृग मीना। / मधुप निकर कोकिला प्रवीना। / कुंद कली दाड़िम दामिनी। / कमल सरद ससि अहिभामिनी...आदि-आदि।” (नंद किशोर नवलः तुलसीदास/पृष्ठ - 101-102)

साहित्य की प्रकृति और पर्यावरण के साथ जुड़ाव की परम्परा आधुनिक काल में छायावाद के कवियों में एक लम्बे अन्तराल के बाद प्रकट होती दिखती है।

प्रसिद्ध आलोचक नामवर सिंह के अनुसार, “यह परम्परा हिन्दी में पहली बार, लगभग शताधिक वर्षों के बाद, हिन्दी के छायावाद में दिखाई पड़ी। हिमालय के तराई के कवि सुमित्रानन्दन पंत पहले कवि नहीं हैं। उनके पहले ‘एकान्तवासी योगी’ में भी यह आपको मिलेगी। ...छायावाद के बाद और उस दौर के सहृदय समालोचकों में गिने जाने वाले आचार्य रामचन्द्र शुक्ल के आलेखों में मिर्जापुर की पहाड़ियों, झाड़ियों, झरनों के अनेक दृश्य आपको मिल जायेंगे।“ (अज्ञेय और प्रकृति: नामवर सिंहः सम्पादक रूपा गुप्ता/पृष्ठ 75) नामवर सिंह छायावादोत्तर काल के कवियों में प्रकृति-पर्यावरण की सर्वांग उपस्थिति अज्ञेय की कविताओं में पाते हैं और उस दृष्टि से उनकी कविता ‘असाध्य वीणा’ को सर्वश्रेष्ठ मानते हैं।

उनके अनुसार ‘असाध्य वीणा’ कविता की पंक्तियों से जो ध्वनियाँ निकलती है, उनसे जो चित्र उभरते हैं, वे सारे चित्र प्रकृति के हैं और प्रकृति के सारे रूप का निचोड़ कोई एक जगह देखे, तो वह इस कविता में मिलेगा। ‘असाध्य वीणा’ की कुछ पंक्तियाँ ही नामवर सिंह के उक्त कथन को प्रमाणित करने में सक्षम हैं, केशकंवली नामक साधक वीणा बजाने के पहले स्मरण कर रहा है: “हाँ, मुझे स्मरण है;/बदली-कौंध-पत्तियों पर वर्षा-बूंदों की पट पट/घनी रात में महुए का चुपचाप टपकना। चौंके खग-शावक की चिहुँक/शिलाओं को दुलराते वन झरने के/द्रुत लहरीले जल का कल निनाह/कुहरे में छन कर आती/पार्वती गाँव के उत्सव ढ़ोलक की थाप/गड़रिये की अनमनी बाँसुरी/कठफोड़े का ठेका/फुलसुँघनी की आतुर फुरकनः/ओस बूँद की ढरकन-इतनी कोमल, तरल,/कि झरते-झरते मानो/हरसिंगार का फूल बन गई....।”

अब तक साहित्य की इस सुदीर्घ परम्परा में प्रकृति और पर्यावरण एक अवलम्बन के रूप में प्रस्तुत किया जा रहा था।

वह रचनाकार की कला के श्रेष्ठतम स्वरूप के प्रकटीकरण का माध्यम था। वह मुख्य रूप से उपमा-उपमेय के रूप में काव्य जगत में प्रयुक्त हो रहा है या फिर परिवेश के सूक्ष्म पर्यवेक्षण के क्रम में वर्णित हो रहा है। अज्ञेय या उनकी परम्परा के कवि-कथाकारों को आक्रामक उपभोक्तावाद के कारण या मुनाफे की अशेष चाह उजड़ते जंगल, बाँधी जाती नदियाँ, दरकते पहाड़ और बदलते मौसम की खबर ही नहीं थी।

वे श्रृंगार से अध्यात्म तक की यात्रा में ही आत्ममुग्ध थे या जन्म-मृत्यु के अनन्त चक्र से मुक्ति की ओर अग्रसर थे। उन्हें होमो सेपियन्स जाति के अगले 100 वर्ष में ही खत्म होने की सूचना ही नहीं थी। उन्हें यह भी नहीं पता था कि हमारे विभिन्न गतिविधियों में रसायनों के उपयोग से तीन से तीन सौ प्रजातियाँ प्रतिदिन संकटग्रस्त हो रही हैं या लुप्त हो रही हैं। लेकिन हमारे समय का काव्य-कथा साहित्य एवं गैर कथा साहित्य का रचनाकार अत्यन्त सजग और संवेदनशील है। वह समस्त जीवों-वनस्पतियों का पृथ्वी का बराबर का नागरिक मान रहा है और उनकी पीड़ा से दुखी तो हो रहा है किन्तु उनके विनाश के खिलाफ आवाज भी बुलन्द कर रहा है। दिवंगत केदारनाथ सिंह की ‘जड़ें’ कविता की इन काव्य पंक्तियों में इस प्रतिकार की अनुगूंज को महसूस किया जा सकता है :

“जड़ें चमक रही हैं / ढेले खुश / घास को पता है/चींटियों के प्रजनन का समय/ क़रीब आ रहा है/ दिन-भर की तपिश के बाद/ताज़ा पिसा हुआ गरम-गरम आटा/एक बूढ़े आदमी के कन्धे पर बैठकर/ लौट रहा है घर/मटमैलापन अब भी जूझ रहा है / कि पृथ्वी के विनाश की ख़बरों के खिलाफ / अपने होने की सारी ताकत के साथ / सटा रहे पृथ्वी से।” (केदारनाथ सिंह, पानी की प्रार्थना/पृष्ठ 104)

मुख्य रूप से बांग्ला में महाश्वेता देवी, उड़िया में गोपीनाथ मोहन्ती की तरह हिन्दी में भी रामदयाल मुण्डा एसंजीव, मनमोहन पाठक, मैत्रेयी पुष्पा, हरीराम मीणा, केदार मीणा, प्रमोद मीणा, राकेश कुमार सिंह, महुआ माजी, अश्विनी कुमार पंकज, रोज केरकेट्टा, वाल्टर भेंगरा, महादेव टोप्पो, निर्मला पुतुल, ग्रेस कुजूर, वन्दना टेटे, अनुज लुगुन, जसिन्ता केरकेट्टा आदि की रचनाओं से हिन्दी साहित्य जगत में आदिवासी विमर्श ने मुकम्मल स्वरूप ग्रहण किया है। आदिवासी दर्शन चिन्तन की यह विशेषता है कि वह अन्य दर्शनों की तरह मात्र ‘मानव’-मात्र के भौतिक-अधिभौतिक, दैहिक-दैविक कल्याण की चिन्ता नहीं करता। उनक े दर्शन-परम्परा में मानव इस कायनात का कोई ‘श्रेष्ठ’ प्राणी नहीं है बल्कि आदिवासी आध्यात्मिक परम्परा में मानव जीव-जगत, वनस्पति-जगत की अन्य जैविक इकाइयों की तरह एक ईकाई मात्र है। आदिवासी चिन्तन यह मानता है कि एक चींटी, एक लता, एक पौधे, एक लघु कीट का भी इस पृथ्वी पर उतना ही हक है जितना किसी इन्सान का। इसलिए जब मुनाफे की अन्तहीन हवस को विकास का पवित्र जामा पहना कर प्रकृति के उपादानों पर, जंगल, नदियों, पहाड़ों पर आतंक बरपाया जाता है तो आदिवासी स्वर हूँकार भरने लगता है वह उलगुलान का आववान करने लगता है।

युवा कवि अनुज लुगुन की कविता ‘शहर के दोस्त के नाम पत्र’ की पंक्तियों में प्रकृति विनाश की भयावहता को बहुत भीतर तक महसूस किया जा सकता है:

“हमारे जंगल में लोहे के फूल खिले हैं/बॉक्साईट के गुलदस्ते सजे हैं/अभ्रक और कोयला तो/...थोक और खुदरा दोनों भावों से/मण्डियों में रोज सजाए जाते हैं/यहाँ बड़े-बड़े बाँध भी/फूल की तरह खिलते हैं /इन्हें बेचने के लिए/सैनिकों के स्कूल खुले हैं;/...कल एक पहाड़ को टंक पर जाते हुए देखा/उससे पहले नदी गई/अब खबर फैल रही है कि/मेरा गाँव भी यहाँ से जाने वाला है,/ शहर में मेरे लोग तुमसे मिलें/ तो उनका ख़्याल जरूर रखना/यहाँ से जाते हुए उनकी आँखों में /मैंने नमी देखी थी ...।”

पर्यावरण-प्रकृति की रक्षा की लड़ाई में अखिल भारतीय स्तर पर विभिन्न आन्दोलनों का नेतृत्व महिलाओं के हाथों में देख उपन्यास ‘ग्लोबल गाँव के देवता’ में उपन्यासकार रणेन्द्र को यह एहसास होता है कि ‘धरती भी स्त्री, प्रकृति भी स्त्री, सरना माई भी स्त्री और उसके लिए लड़ाई लड़ती सत्यभामा, इरोम शार्मिला, सीके जानू, सुरेखा दलबी और यहाँ पाट में बुधनी दी और सहिया ललिता भी स्त्री। शायद स्त्री ही स्त्री की व्यथा समझती है। सीता की तरह धरती की बेटियाँ-धरती में समाने को तैयार। शिकारी जो समझता रहे।”(रणेन्द्र: ग्लोबल गाँव के देवता/ पृष्ठ- 92)

वन्दना शिवा के इकोफेमिनिज्य की तरह हिन्दी में चिन्तन-लेखन परम्परा अभी उस तरह स्थापित नहीं हो सकी है किन्तु सुप्रसिद्ध कवि भवानी प्रसाद मिश्र के पुत्र अनुपम मिश्र के पर्यावरण - चिन्तन की पुस्तकों ने हिन्दी और गैर हिन्दी क्षेत्र में भी आन्दोलन-सा खड़ा कर दिया। खासकर उनकी दो पुस्तकें, अब भी खरे हैं तालाब तथा राजस्थान की रजत बून्दों ने जल-संरक्षण के देशज उपक्रमों को समूचे देश में फिर से जीवन्त बना दिया।

विगत तीन दशकों में इन दो पुस्तकों की लोकप्रियता अभिनन्दनीय और अनुकरणीय रही है। पेशे से इंजीनियर रहे दिनेश कुमार मिश्र के अध्ययन-लेखन और एक्टिविज्म ने नदियों पर बाँध-निर्माण की अवैज्ञानिकता-अतार्किकता को रेखांकित किया और झूठे विकास के पीछे विद्यायिका-कार्यपालिका और पूँजी के नृशंस नाच पर पड़े पर्दे को नोच कर तार-तार कर दिया। उनकी 1994 में प्रकाशित पुस्तक ‘बन्दिनी महानन्दा’ ने एक पीढ़ी को उद्वेलित कर दिया था। उसी परम्परा में कुमाऊँ विश्वविद्यालय पूर्व प्राध्यापक शेखर पाठक की ‘चिपको आन्दोलन’ पर केन्द्रित वृहद पुस्तक ‘हरी भरी उम्मीद’ (2019) का उसी प्रकार स्वागत हो रहा है।

कई भाषाओं में अनुवाद हो रहे हैं और यह पुस्तक नई पीढ़ी की समझ की धार पर सान चढ़ाने में सफल दिख रही है। कल्याणकारी जनतंत्र के कॉरपोरेटीकरण से अँधेरा घना और गहरा होता जा रहा है किन्तु लेखनियाँ थकी नहीं हैं, आग बुझी नहीं है। सीने में और आँखों में संवेदना का जल अभी झिलमिला रहा है। उम्मीद की किरण बुझी नहीं है।

(लेखक बहुचर्चित उपन्यास ग्लाेबल गांव का देवता के रचियता हैं)

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