Sign up for our weekly newsletter

मिसाल: ठेंगापाली से हरियाली बचाने वाले शख्स के बारे में जानते हैं आप?

इस काम को भावी पीढ़ी भी जाने इसलिए छत्तीसगढ़ सरकार ने इस काम को राज्य के पाठ्यक्रम में जगह दी है

On: Tuesday 12 May 2020
 
ठेंगापाली से बची हरियाली
छत्तीसगढ़ के बस्तर के संघकरमरी गांव के ग्रामीण पौधारोपड़ के लिए थैलियों में मिट्टी भरने का काम करते हैं।  (सभी फोटो: बाबा मायाराम)
छत्तीसगढ़ के बस्तर के संघकरमरी गांव के ग्रामीण पौधारोपड़ के लिए थैलियों में मिट्टी भरने का काम करते हैं। (सभी फोटो: बाबा मायाराम)

बाबा मायाराम, बस्तर छत्तीसगढ़

अब तक हमनें जंगल लगाने की कई कहानियां पढ़ी और सुनी हैं। लेकिन दामोदर कश्यप एक ऐसा नाम है जिन्होंने पूरी जिंदगी जंगल बचाने में लगा दी। दामोदर बस्तर के संघकरमरी गांव के आदिवासी हैं। बचपन में वह पढ़ने के लिए अपने गांव से जगदलपुर गए। लौटने पर उन्होंने देखा कि उनके गांव के आसपास के जंगल पूरी तरह से साफ हो चुके हैं। यह काम सरकारी महकमे ने ही नहीं, बल्कि गांव के लोगों ने किया। तब से लेकर आज तक तक कश्यप ने 600 एकड़ से अधिक जंगल बचाया है।

उनकी यह गाथा केवल अखबारों या पत्र-पत्रिकाओं के पन्नों तक ही नहीं सीमित रही बल्कि इसको छत्तीसगढ़ सरकार ने राज्य की नई पीढ़ी को बताने के लिए पाठ्यक्रम में भी शामिल किया है। इस पर वह कहते हैं, “मुझे अब तक मिले तमाम तमगों से यह सबसे अच्छा पुरस्कार है।” बस्तर का यह गांव ऊपर से पर देखने में तो आम गांवों की तरह लगता है, पर इसे दामोदर कश्यप ने खास बना दिया।

जंगल बचाने के लिए कश्यप ने जंगल की रखवाली के लिए एक अनूठी पद्धति अपनाई, जिसका नाम “ठेंगापाली” पद्धति दिया गया। इसमें ठेंगा यानी एक खास तरह के बांस से निर्मित डंडा है। पाली यानी बारी, इसलिए इसे ठेंगापाली पद्धति कहा गया। इस डंडे पर गांव वाले झंडे की तरह कपड़ा लपेट देते हैं। ग्रामदेवी के मंदिर में रख इसकी पूजा-अर्चना की जाती है। इस ठेंगा को लेकर लोग जंगल की रखवाली करते हैं। जंगल की रखवाली करने के लिए सुबह निकलते हैं और शाम को लौटते हैं। शाम को यह ठेंगा पड़ोसी के घर रख दिया जाता है। फिर पड़ोसी और उसके बाजू वाले दो घर के लोग इसे लेकर दूसरे दिन रखवाली करने जाते हैं। इस तरह यह सिलसिला जारी रहता है। बरसों से यह क्रम चल रहा है।

चित्र में ग्रामीण पौधों को रोपने के लिए गड्ढा करते हुए

इस तरह दामोदर ने अपने गांव के आसपास 600 एकड़ से अधिक के जंगल की रक्षा की है। वह केवल जंगल की रक्षा ही नहीं करते बल्कि पौधारोपड़ भी करते हैं। उनके बचाए जंगल में 300 एकड़ जंगल कुदरती है, जिसे बाड़लाकोट के नाम से जाना जाता है। मावलीकोट का जंगल भी 100 एकड़ में फैला हुआ है। इस जंगल में आदिवासियों के ग्राम देवी व देवता हैं। यह जंगल ग्राम पंचायत संधकरमरी के बीचोंबीच स्थित है। यह एक सदाबहार वन है, जिसमें विभिन्न प्रकार के वन्य प्राणी निवास करते हैं, जैसे बंदर, खरगोश, चमगादड़ इत्यादि। यहां कई प्रकार के औषधीय पौधे व बहुमूल्य जड़ी-बूटियां भी बड़ी मात्रा में उपलब्ध हैं।

इसके अलावा करीब 200 एकड़ का जंगल है, जो धौड़ाडोंगरी, करापकना और डाउलसोरा क्षेत्र में फैला है। यह निस्तारी जंगल है। यह गांव ओडिशा की सीमा पर स्थित है। यहां की आबादी करीब 4,000 है। यह एक आदिवासी बहुल गांव है। इस गांव के बदले परिवेश को जानने के लिए 60 के दशक में जाना होगा। तब गांव के आसपास बहुत घना जंगल हुआ करता था। यहां हर्रा, बहेड़ा, आंवला, चार, महुआ के पेड़े इत्यादि थे। कई जंगली जानवर भी थे। दामोदर स्वयं भतरा आदिवासी हैं। जब वह पढ़ने के लिए जगदलपुर गए तब भी जंगल बहुत अच्छी स्थिति में था। लेकिन 1970 में जब वह इंटरमीडिएट करके गांव लौटे तब तक जंगल पूरी तरह से उजड़ चुका था। दामोदर यह सब देखकर मायूस हो गए, पर हार नहीं मानी।

चित्र में गांव के पास के ही बचाए जंगल में खड़े स्वयं दामोदर कश्यप तभी उन्होंने जंगल बचाने की ठानी। उन्होंने तय किया कि किसी भी सूरत में जंगल बचाना है और आने वाली पीढ़ियों को जंगल की धरोहर सौंपनी है। उन्होंने इस काम के लिए गांववालों को भी मनाया, जिन्होंने खुद भी जंगल काटा था। वन विभाग को भी इससे जोड़ा। इस काम को व्यवस्थित करने का मौका दामोदर को तब मिला जब खुद गांव के सरपंच बने। पहली बार 1976-77 में सरपंच बने। उनके सरपंच बनने के बाद जंगल बचाने की मुहिम शुरू हुई। इसके नियम कायदे बनाए गए। तय किया गया कि हम न केवल जंगल बचाएंगे बल्कि लगाएंगे भी। जंगल में ढोर नहीं चराएंगे, मनमर्जी से जंगल नहीं काटेंगे। अगर कोई जंगल काटेगा तो 500 रुपए का जुर्माना लगेगा। गांव के लोगों ने तय किया कि घर बनाने के लिए, घरेलू काम के लिए या सामाजिक काम के लिए सूखी लकड़ी काट सकते हैं। गीली लकड़ी काटने पर पाबंदी रहेगी।

संधकरमरी गांव के जंगल बचाने की कहानी कई और गांव के लोगों के लिए प्रेरणा बन गई है। ठेंगापाली पद्धति को कई आैर गांवों ने अपनाया है। बस्तर के अलावा ओडिशा के कई गांव इसे अपना रहे हैं। दामोदर के अनुसार, मोतीगांव, सिवनागुड़ा, गोईगुड़ा, कून्ना, सिरसियागुड़ा, केरागांव के लोगों ने भी ठेंगापाली पद्धति से जंगल बचाया है। कुल मिलाकर इससे गांव के आसपास जंगल हरा-भरा हुआ, भूजल स्तर बढ़ा। लोगों की निस्तारी की जरूरतें पूरी हो रही हैं। आदिवासियों को जंगल से पोषक वन खाद्य मिल रहा है। जैव विविधता और पर्यावरण का संरक्षण व संवर्धन हुआ है।

दामोदर इस काम के लिए देश-विदेश में सम्मानित किए गए। उन्हें वर्ष 2014 में स्विट्जरलैंड के पीकेएफ ( पाल के. फेयरवेंड फाउंडेशन) नामक संस्था द्वारा और वर्ष 2015 में ही सीसीएस संस्था ( कंजरवेशन कोर सोसायटी) द्वारा अवाॅर्ड से सम्मानित किया गया। इसके अलावा दामोदर कश्यप के वन संरक्षण व संवर्धन के काम को जन-जन तक पहुंचाने के लिए छत्तीसगढ़ शासन द्वारा सामाजिक विज्ञान के कक्षा 9वीं के पाठ्यक्रम में शामिल किया गया। संधकरमरी गांव अब जंगल सुरक्षा, प्रकृति व पर्यावरणप्रेमियों के लिए प्रेरणा का स्रोत बन गया है।