Sign up for our weekly newsletter

पतंगों के संसार में तीन नए नाम शामिल, भारत में की गई पहचान

बटरफ्लाई रिसर्च सेंटर के संस्थापक पीटर स्मेटाचेक बताते हैं कि भारत में तितली-कीट-पतंगों पर बहुत अधिक काम नहीं किया गया है। किसी नई प्रजाति को चिन्हित करना आसान नहीं होता, क्योंकि इसकी तुलना के लिए स्पेसमिन ही उपलब्ध नहीं हैं

By Varsha Singh

On: Friday 03 January 2020
 
मिजोरमा सालसा। फोटो: वर्षा सिंह
मिजोरमा सालसा। फोटो: वर्षा सिंह मिजोरमा सालसा। फोटो: वर्षा सिंह

तितलियों, कीट-पतंगों के संसार के बहुत से रहस्य अब भी हमारे सामने बहुत अच्छी तरह नहीं खुले हैं। विज्ञान इस दुनिया में प्रवेश तो कर चुका है लेकिन अब भी बहुत सारी बातें हमें जाननी हैं। एक बड़ा सा पतंगा जो मिज़ोरम में साल में महज एक बार नवंबर के महीने में मुश्किल से दस दिन के लिए उड़ता मिलता है, वो भी रात 12 से 2 बजे के बीच। जिसे अब हमने एक नाम दिया है। दिसंबर 2019 में पतंगों के संसार में तीन नए नाम दर्ज किए गए हैं।

 लोएपा नाइग्रा। फोटो: वर्षा सिंह

लोएपा मैक्रॉप्स (Loepa Macrops) नेपाल से हिमाचल प्रदेश तक अपनी मौजूदगी दर्ज करा रहा है और मिरांडा  समूह से जुड़ा, आकार में अपेक्षाकृत बड़ा (करीब 6 इंच तक) पतंगा है। जिसके चार पंख हैं। लोएपा नाइग्रा (Loepa Nigra) उत्तर पश्चिमी भारत के मिजोरम और त्रिपुरा में उड़ता दिखाई दिया। हिमालयी क्षेत्र में पाए जाने वाले सिक्किमा मूर के परिवार के नज़दीक। जर्मन कीट विज्ञानी स्टीफन नॉमन और नैनीताल के तितली विशेषज्ञ पीटर स्मेटाचेक ने इन दो पतंगों की पहचान की।

 लोएपा मैक्रॉप्स। फोटो: वर्षा सिंह

तीसरा पतंगा है सलासा मिजोरामा जो सिर्फ मिज़ोरम में पाया गया है। ये सिल्क मॉथ है,  जो रेशम बनाता है। स्टीफन नॉमन और एस्थर लैलमिंग्लियानी ने इनको पहचाना।  मिज़ोरम विश्वविद्यालय की प्रोफेसर एस्थर, सैटर्निडे (family Saturniidae) प्रजाति की इतने बड़े आकार के रेशम कीट को चिन्हित करने पहली भारतीय बन गई हैं। इससे पहले इस श्रेणी के सभी पतंगे विदेशियों ने पहचाने हैं। ई-पेपर बायोनोट्स के अक्टूबर-दिसंबर अंक में ये शोध रिपोर्ट प्रकाशित हुई हैं।     

  

भीम ताल में बटरफ्लाई रिसर्च सेंटर के संस्थापक पीटर स्मेटाचेक बताते हैं कि हमारे देश में तितली-कीट-पतंगों पर बहुत अधिक काम नहीं किया गया है। किसी नई प्रजाति को चिन्हित करना आसान नहीं होता क्योंकि इसकी तुलना के लिए स्पेसमिन ही उपलब्ध नहीं हैं। हैरत की बात है कि इन पतंगों के नमूने वर्ष 2011 में ही पकड़ लिए गए थे। लेकिन तुलनात्मक अध्यन न हो पाने के चलते इन्हें पहचानने और नाम देने में इतनी देरी हुई। पीटर बताते हैं कि जब स्टीफन नॉमन को इनकी तस्वीरें भेजी गईं तो अपने कलेक्शन के आधार पर उन्होंने बताया कि ये तो पतंगों के संसार के नए जीव हैं।

 

पीटर कहते हैं कि करीब 8 इंच तक आकार के बड़े पतंगे आपका ध्यान खींचते हैं और विज्ञान के लिए नए हैं, तो छोटे –छोटे कितने ही पतंगे होंगे, जिनकी जानकारी हमारे पास नहीं है। हमारे देश में 16-20 हज़ार तक तितली-पतंगों की मौजूदगी का अनुमान है। यानी करीब चार हज़ार के बारे में हमें जानकारी ही नहीं है। इनमें 1,325 के आसपास सिर्फ तितलियां हैं, बाकी पतंगें।

 

फॉरेस्ट रिसर्च इंस्टीट्यूट में भारत में तितली-पतंगों का सबसे अच्छा कलेक्शन है। यहां करीब 3,800 तितली-पतंगों की प्रजातियों की पहचान की है। हालांकि उनके पास बहुत कम होलोटाइप सहेजे गए हैं। इंडियन एग्रीकल्चर रिसर्च इंस्टीट्यूट के पास करीब 3,200 हैं। जो कि एफआरआई के कलेक्शन में पहले से मौजूद हैं। ज्यादातर भारतीय पतंगों के होलोटाइप हमारे देश में नहीं हैं बल्कि विदेशी कीट विज्ञानियों के पास है।

 

पीटर स्मेटाचेक सवाल करते हैं कि इतने बड़े कीट अब भी नए घूम रहे हैं, लेकिन इन्हें पहचानने के लिए हमारे देश में बहुत अधिक प्रयास नहीं हो रहा है। इंडियन एग्रीकल्चर रिसर्च इंस्टीट्यूट में फसलों को नुकसान पहुंचाने वाले कीट पर अधिक काम हो रहा है। इसके अलावा कुछ संस्थाएं स्वतंत्र तौर पर कार्य कर रही हैं लेकिन इस दिशा में जरूरी काम किया जाना अभी बाकी है।