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कहां लुप्त हो गई मधुमक्खियों की 25 फीसदी प्रजातियां, 1990 के बाद से नहीं आई सामने

हाल ही में जर्नल वन अर्थ में छपे एक शोध से पता चला है कि 1990 से 2015 के बीच मधुमक्खियों की करीब एक चौथाई प्रजातियों को फिर से नहीं देखा गया है

By Lalit Maurya

On: Monday 25 January 2021
 

हाल ही में जर्नल वन अर्थ में छपे एक शोध से पता चला है कि 1990 से 2015 के बीच मधुमक्खियों की करीब एक चौथाई प्रजातियों को फिर से नहीं देखा गया है। हर साल जंगली मधुमक्खियों से जुड़े यह आंकड़ें इंटरनेशनल डेटाबेस ऑफ लाइफ ऑन अर्थ द्वारा रिकॉर्ड किए जाते हैं, जिनके विश्लेषण के बाद यह निष्कर्ष सामने आए हैं।

अनुमान है कि 1990 में जंगली मधुमक्खियों की जितनी प्रजातियां सामने आई थी वो 2006 से 2015 के बीच एकत्र किये आंकड़ों में तीन चौथाई रह गई हैं। शोधकर्ताओं ने म्यूजियम, विश्वविद्यालयों और वैज्ञानिकों द्वारा मधुमक्खियों के बारे में एकत्र किए आंकड़ों के विश्लेषण के बात यह बात कही है। यह शोध जर्नल वन अर्थ में प्रकाशित हुआ है।

इस शोध में तीन शताब्दियों से एकत्र आंकड़ों और मधुमक्खियों की 20,000 से ज्यादा प्रजातियों का विश्लेषण किया गया है। वैज्ञानिकों का मानना है कि उष्णकटिबंधीय देशों में कीटों और उनकी गिरावट से जुड़े आंकड़ों का आभाव है। यह कमी मधुमक्खियों की प्रजातियों में आई गिरावट को समझने में एक बड़ी बाधा है।

ग्लोबल बायोडायवर्सिटी इनफार्मेशन फैसिलिटी (जीबीआईएफ) ने जो आंकड़ें एकत्र किए हैं वो ज्यादातर उत्तरी अमेरिका और यूरोप से जुड़े हैं। जबकि अफ्रीका और एशिया के विषय में अभी भी डाटा की कमी है।

हालांकि यह कहना जल्दबाजी होगा कि जो प्रजातियां सामने नहीं आई हैं वो विलुप्त हो चुकी हैं। पर इतना तो जरूर है कि वो इतनी दुर्लभ हो गई है कि सामने नहीं आ रही हैं। इस रिपोर्ट के प्रमुख लेखक और जीव विज्ञानी एडुआर्डो जट्टारा के अनुसार "अभी तक यह मधुमक्खियों के लिए प्रलय तो नहीं है पर हम इतना जरूर कह सकते हैं कि जंगली मधुमक्खियों की संख्या नहीं बढ़ रही है।"

85 फीसदी खाद्यान्न फसलों के लिए महत्वपूर्ण हैं मधुमक्खियां

जंगली मधुमक्खियां पर्यावरण के लिए बहुत महत्वपूर्ण होती हैं। इनके द्वारा किया परागण हजारों जंगली पौधों के विकास के लिए जरुरी होता है। यह 85 फीसदी खाद्य फसलों की पैदावार के लिए मायने रखती हैं।

मधुमक्खी प्रजातियों की विविधता और गिरावट स्थानीय, राष्ट्रीय और महाद्वीपों के आधार पर अलग-अलग है, लेकिन आंकड़ें कुल मिलकर इनकी संख्या कमी की ओर इशारा करते हैं। 1990 के दशक में मधुमक्खियों की जिन प्रजातियों के नमूने एकत्र किये जाते रहे हैं उनकी संख्या में कमी आती जा रही है।

इसका मतलब है कि यदि इनकी प्रजातियां विलुप्त नहीं तो दुर्लभ तो जरूर होती जा रही हैं और उनके कम ही पाए जाने की सम्भावना है।

मधुमक्खियों में जो कमी आ रही है वो प्रजातियों के आधार पर अलग-अलग है। यदि हैलिकिड मधुमक्खियों की बात करें जोकि मधुमक्खियों की दूसरी सबसे आम प्रजाति है तो उनमें 90 के दशक से 17 फीसदी की गिरावट आई है। वहीं मेलिटिडे जोकि एक दुर्लभ प्रजाति की मधुमखी है उसमें करीब 41 फीसदी तक की कमी आई है।

इससे पहले किए शोधों में भी कीटों के विलुप्त होने की बात सामने आई थी। अप्रैल 2019 में जर्नल बायोलॉजिकल कंज़र्वेशन में छपे शोध के अनुसार अगले कुछ दशकों में 40 फीसदी से भी ज्यादा कीटों पर विलुप्त होने का खतरा मंडरा रहा है। जिसका सबसे ज्यादा असर तितलियों, मधुमक्खियों और गुबरैला पर पड़ रहा है।

आंकड़ों के मुताबिक हर वर्ष 2.5 फीसदी की दर से कीट विलुप्त हो रहे हैं। इनके विलुप्त होने की यह गति स्तनधारियों, पक्षियों और सरीसृपों की तुलना में आठ गुना तेज है। अनुमान है कि इस गति से अगली एक सदी में यह कीट पूरी तरह विलुप्त हो जाएंगे।

जट्टारा के अनुसार मधुमक्खियों के साथ कुछ तो ऐसा हो रहा है जिस पर ध्यान देने की जरुरत है। हम पूरे आंकड़ें सामने आने तक इंतजार नहीं कर सकते। हमारे पास अभी भी समय है इसलिए नीति निर्माताओं को इस बारे में सोचना होगा, लेकिन मधुमक्खियां इस बाबत इंतज़ार नहीं कर सकती।