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छत्तीसगढ़ में वन अधिकार दावे वाली जमीन से बॉक्साइट खनन पर हाईकोर्ट ने लगाई रोक 

आदिवासियों के वन अधिकार वाली जगह पर बॉक्साइट खनन किया जा रहा है, जिस पर अदालत ने रोक लगा दी है 

By Ishan Kukreti

On: Thursday 05 December 2019
 
अपना लैंड टाइटल दिखाती एक आदिवासी महिला। फाइल फोटो: कुमार संभव श्रीवास्तव
अपना लैंड टाइटल दिखाती एक आदिवासी महिला। फाइल फोटो: कुमार संभव श्रीवास्तव अपना लैंड टाइटल दिखाती एक आदिवासी महिला। फाइल फोटो: कुमार संभव श्रीवास्तव

छत्तीसगढ़ के सरगुजा जिले में सीतापुर ब्लॉक स्थित पथरई गांव में छत्तीसगढ़ खनिज विकास निगम (सीएमडीसी) के बॉक्साइट खनन पर सूबे के उच्च न्यायालय ने 3 दिसंबर को अंतरिम आदेश के तहत रोक लगा दिया है। निगम के जरिए 50 लोगों के वन अधिकार दावे वाली जमीन पर बॉक्साइट खनन किया जा रहा था।

वहीं, वन अधिकार कानून (एफआरए), 2006 के अधीन अभी अन्य 50 लोगों के दावे लंबित भी हैं। अधिवक्ता किशोर नारायण के मुताबिक एफआरए कानून, 2006 के प्रावधान के मुताबिक दावेदार तब तक किसी जगह से निष्कासित नहीं किए जा सकते जब तक उनके दावों का निस्तारण नहीं किया जाता।

नारायण के मुताबिक सीएमडीसी ने झूठ और धोखे के आधार पर ग्राम सभा से अनापत्ति प्रमाण पत्र हासिल कर लिया। जबकि ग्राम सभा के सदस्यों ने खनन योजना को निरस्त करने के लिए हस्ताक्षर किए थे न कि अनापत्ति प्रमाण पत्र के दस्तावेजों पर हस्ताक्षर किए थे। करीब 15 दिन पहले सीएमडीसी के जरिए खनन काम शुरु हुआ, उसके बाद गांव वालों ने अदालत का दरवाजा खटखटाया।

गांव में अधिकांश ओरांव और मांजी आदिवासी समुदाय के लोग है। भारतीय संविधान की पांचवी अनसूची के अधीन यह आदिवासी समुदाय आते हैं। पांचवी अनुसूची वाले क्षेत्रों में पंचायत के प्रावधान (अनुसूचित क्षेत्रों में विस्तार) अधिनियम, 1996 यानी पेसा कानून लागू होता है। पेसा कानून के तहत बिना ग्राम सभा की अनुमति के वहां कोई भी विकास कार्य नहीं किया जा सकता है।

सीएमडीसी के जरिए केवल झूठा अनापत्ति प्रमाण पत्र ही नहीं हासिल किया गया था बल्कि एफआरए के तहत जमीन पाने वाले ग्रामीणों को सब-डिविजनल अधिकारी के जरिए नोटिस भेजकर कहा गया कि वे एफआरए के तहत जमीन पाने के योग्य नहीं हैं। ऐसे में ग्रामीण उनके समक्ष पेश होकर जवाब दें।

ग्रामीण निवासी पीटर घिंचा, जिन्हें एफआरए के तहत 0.2 हेक्टेयर वन जमीन आवंटित की गई थी। वे इस मामले के याचीकर्ता हैं। उनकी याचिका के मुताबिक एसडीओ के द्वारा ग्रामीणों को नोटिस इसलिए दिए गए थे ताकि वन क्षेत्र में एफआरए और खनन कानूनों से बचा जा सके।

वन अधिकार कानून (एफआरए) में ऐसा कोई प्रावधान नहीं है जिससे वन क्षेत्र में जारी किए जाने वाले पट्टों को रद्द किए जा सके।  यह भी गौर करने लायक है कि 27 अगस्त, 2015 के जिलाधिकारी के एक पत्र के आधार पर सीएमडीसी की खनन परियोजना को 19 जून, 2018 को दूसरे चरण की वन मंजूरी भी दे दी गई। जिलाधिकारी ने अपने पत्र में लिखा था कि खनन वाले क्षेत्र में किसी भी एफआरए के तहत कोई दावा लंबित नहीं है। सभी एफआरए दावे की प्रक्रिया पूरी की जा चुकी है