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खास रिपोर्ट: कोयले का काला कारोबार-एक

कोविड-19 लॉकडाउन के बावजूद जून 2020 में कोयले की खानों की नीलामी की प्रक्रिया शुरू हुई, लेकिन इसके पीछे पूरी कहानी क्या है?

By Ishan Kukreti

On: Tuesday 01 September 2020
 
काला कारोबार
आदिल साई  आर्मो  और जैरंद पोर्ते घबरवा गांव (सरगुजा, छत्तीसगढ़) में कोयला खदान के कारण विलुप्त हुए जंगल से गुजरते हुए आदिल साई आर्मो और जैरंद पोर्ते घबरवा गांव (सरगुजा, छत्तीसगढ़) में कोयला खदान के कारण विलुप्त हुए जंगल से गुजरते हुए

जून में जब नए कोयला ब्लॉकाें की नीलामी शुरू हुई, तब प्रधानमंत्री ने कहा कि इससे कोयला क्षेत्र को कई वर्षों के लॉकडाउन से बाहर आने में मदद मिलेगी। लेकिन समस्या यह है कि कोयले के भंडार घने जंगलों में दबे पड़े हैं और इन जंगलों में शताब्दियों से सबसे गरीब आदिवासी बसते हैं। कोयले के लिए नए क्षेत्रों का जब खनन शुरू होगा, तब आदिवासियों और आबाद जंगलों पर अनिश्चितकालीन लॉकडाउन थोप दिया जाएगा। डाउन टू अर्थ ने इसकी पड़ताल की। प्रस्तुत है इस पड़ताल करती रिपोर्ट की पहली कड़ी-

 

18 जून को,वाणिज्यिक खनन के लिए 41 कोयला ब्लॉकों की नीलामी के एक कार्यक्रम में बोलते हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा कि भारत को ऊर्जा जरूरतों के लिए अपने घरेलू कोयले का उपयोग करने की आवश्यकता है। इस आयोजन ने इस क्षेत्र को निजी निवेशकों के लिए खोल दिया। 100 प्रतिशत प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (एफडीआई) और कोयले के अंतिम उपयोग पर लगे सारे प्रतिबंध हटाकर। अब तक, खनिकों को बाजार में कोयले का व्यापार करने की अनुमति नहीं थी। कोयला का खनन या तो सार्वजनिक क्षेत्र के कोल इंडिया लिमिटेड या अन्य कंपनियों द्वारा खनन आवंटन या नीलामी के जरिए किया जाता था।

कोविड-19 के बाद सरकार के एजेंडे में ऊर्जा सुरक्षा सबसे ऊपर है। प्रधानमंत्री ने जोर देकर कहा कि यह नीलामी “कोयला क्षेत्र को कई वर्षों के लॉकडाउन से बाहर लाएगी”। उन्होंने कहा, “भारत में दुनिया का चौथा सबसे बड़ा कोयला भंडार है और हम कोयले के दूसरे सबसे बड़े उत्पादक हैं तो फिर हम दुनिया के सबसे बड़े उत्पादक क्यों नहीं बन सकते?”

कोयले को “हरित” बनाने के लिए सरकार ने 2030 तक 100 मिलियन टन कोयले को गैस में बदलने के लिए चार परियोजनाओं में 20,000 करोड़ का निवेश करने की घोषणा की है। समस्या यह है कि कोयले के भंडार देश के सबसे घने जंगलों में पाए जाते हैं, जहां बहुत गरीब लोग और इनमें भी ज्यादातर आदिवासी रहते हैं। इसका मतलब यह है कि जब अधिक कोयले के लिए नए क्षेत्रों का खनन शुरू होगा तो इन अनछुए जंगलों और उनके निवासियों पर मुसीबतों का पहाड़ टूट पड़ेगा। 

सवाल यह है कि भारत को कोयले के लिए अधिक खुदाई करने की आवश्यकता क्यों है? क्या देश की वर्तमान कोयला खदानें अपर्याप्त हैं? या हमें घरेलू कोयले को आयातित कोयले से बदलने की आवश्यकता है? वह आंतरिक तर्क क्या है जो इस नीति को संचालित करता है?

इस परिवर्तन के पीछे की वजह छुपी हुई नहीं है। 2010 में, कोयला मंत्रालय (एमोसी ) और पर्यावरण एवं वन मंत्रालय (एमओईएफ), (जिसे अब पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय (एमओईएफसीसी) का नाम दिया गया है) ने एक वृहद अध्ययन के उपरांत भारत के कोयला भंडार को “गो” एवं “नो-गो” क्षेत्रों में वर्गीकृत किया था। अध्ययन ने कहा कि जंगलों को बचाने के लिए नो-गो क्षेत्रों में खनन को प्रतिबंधित किया जाना चाहिए। ये जैव विविधता से भरपूर घने वन क्षेत्र थे और इसलिए, यहां खनन पर प्रतिबंध आवश्यक था। मंत्रालयों ने कुल अध्ययन किए गए क्षेत्रों में से 47 प्रतिशत (222) इलाकों को नो-गो क्षेत्रों के रूप में सीमांकित किया लेकिन 2010 से 2014 के बीच, संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन (यूपीए) सरकार के कार्यकाल में यह संख्या 16 प्रतिशत या सिर्फ 35 ब्लॉकों तक सिमटकर रह गई।

मौजूदा नेशनल डेमोक्रेटिक अलायंस (एनडीए) के सत्ता में आने के बाद भी यह काट पीट जारी रही। 2015 के बाद कई संरक्षित क्षेत्रों को खनन के लिए खोल दिया गया। इस साल जून में, 41 कोयला ब्लॉकों को नीलामी के लिए डाला गया था।

ध्यान रहे कि इनमें से 12 की पहचान 2010 के अध्ययन में नो-गो क्षेत्र के रूप में की गई थी। लेकिन अगर “गो” क्षेत्र देश की जरूरतों के लिए पर्याप्त हैं तो “नो-गो” क्षेत्रों को बर्बाद क्यों करें ? वैसे भी पिछले एक दशक के दौरान सरकार ने निजी निवेशकों और सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों (पीएसयू ) को 91 कोयला खानें नीलामी या आवंटन के माध्यम से दी हैं। उनमें से 30 “गो” के रूप में सीमांकित क्षेत्रों में हैं। क्या ये सभी खदानें चालू हो गई हैं?



क्या नीलाम की गई खदानें चालू हैं?

इस साल जून में नीलामी के लिए घोषित 41 खदानों का एक बड़ा हिस्सा पहली बार तत्कालीन यूपीए सरकार द्वारा अलग-अलग पीएसयू और निजी निवेशकों को आवंटित किया गया था, जिसे बाद में सुप्रीम कोर्ट द्वारा रद्द कर दिया गया था। 25 अगस्त और 24 सितंबर 2014 को, सर्वोच्च न्यायालय ने 204 कैप्टिव कोयला खदानों को “अवैध” घोषित कर दिया। एनडीए सरकार ने तब कोल माइंस (विशेष प्रावधान) अधिनियम, 2015 को पेश किया और इन खानों की नीलामी और आवंटन का कार्य शुरू किया।

डाउन टू अर्थ द्वारा दायर किए गए राइट टू इन्फर्मेशन (आरटीआई) आवेदन के उत्तर में एमओसी ने बताया कि निजी निवेशकों को 33 और पीएसयू को 49 खदानें नीलामी द्वारा दी गईं थीं। हालांकि, मंत्रालय का कहना है कि वर्तमान में केवल 13 निजी और 14 सार्वजनिक क्षेत्र की खदानें चल रही हैं। इसका मतलब यह है कि 55, या लगभग 67 प्रतिशत नीलाम की गई खदानें विभिन्न कारणों से परिचालन में नहीं है, इसका कारण है कि कहीं अधिक लागत और प्रबंधन के मुद्दे तो कहीं वैधानिक वन मंजूरी की अनुपस्थिति।

2015 के बाद से, सरकार ने और नौ खानों की नीलामी की है और उनके संचालन की जानकारी सार्वजनिक डोमेन में नहीं है। एकमात्र जानकारी का स्रोत वन सलाहकार समिति (एफएसी) द्वारा 2015 में आयोजित एक बैठक है। एफएसी मुख्यतः एक “बिना किसी चेहरे मोहरे वाली” संस्था है जो वन मंजूरी का आकलन और सिफारिश करती है। हालांकि, यह खनन पट्टे, खनन योजनाओं और खदानों के संचालन पर कोई विवरण नहीं देता है, लेकिन यह दर्शाता है कि 2015 के बाद से, कुल 49 कोयला खनन परियोजनाओं को जंगलों के उपयोग के लिए चरण एक (24 खदानें) या चरण दो (25 खदानें ) की मंजूरी दी गई है। इन 49 परियोजनाओं में से नौ मूल “नो-गो” क्षेत्रों में हैं। चरण एक के तहत, मंजूरी तो दी जाती है, लेकिन उपयोगकर्ता एजेंसी या निजी कंपनी को नेट वर्तमान मूल्य का भुगतान करना है और स्थानीय समुदायों के अधिकारों एवं शर्तों को पूरा करना है। स्टेज दो के तहत, वनभूमि के इस्तेमाल के लिए अंतिम अनुमति दी जाती है और उपयोगकर्ता एजेंसी या कंपनी को एक वर्ष के भीतर प्रतिपूरक वनीकरण (कटे पेड़ों के बदले में नए पेड़) करना पड़ता है।

सरकार के अपने रिकॉर्ड के अनुसार जिन 49 कोयला परियोजनाओं के लिए वनों के “डायवर्जन” की अनुमति दी गई है, उसके कारण 19,614 हेक्टेयर वनभूमि प्रभावित होगी, 1.02 मिलियन पेड़ों की कटाई और 10,151 परिवार बेदखल होंगे।

आगे पढ़ें : कोयला खनन के लिए हर बार जंगल ही दांव पर लगते हैं