विश्व पर्यावरण दिवस 2021: महामारी में पर्यावरण की फिक्र

कोविड-19 वैश्विक महामारी के इस भयावह दौर में विश्व पर्यावरण दिवस की तार्किकता बयान करता सुनीता नारायण का आलेख

By Sunita Narain

On: Friday 04 June 2021
 

महामारी के दौरान विश्व पर्यावरण दिवस मनाने के बारे में सोचना भी मुश्किल है। अपार मानवीय पीड़ा और हानि के इस समय में पर्यावरण की आखिर क्या बिसात है? लेकिन आइए इस विषय में सोचने के लिए हम थोड़ा समय निकालें। पिछले एक महीने में हमें जिस चीज की कमी सर्वाधिक खली वह था ऑक्सीजन। आइए हम उन दिनों एवं घंटों के बारे में सोचें जो हमने अपने प्रियजनों के लिए ऑक्सीजन खोजने में बर्बाद किए। अस्पतालों की ऑक्सीजन की टंकियां खाली होने के कारण कई मरीजों की जानें चली गईं। हालात यहां तक पहुंच गए कि देशभर के उद्योगों से ऑक्सीजन के परिवहन को विनियमित करने के लिए अदालतों को संज्ञान लेना पड़ा। यह वह दौर था जब हमें ऑक्सीजन कनसेन्ट्रेटर के व्यवसाय के बारे में पता चला।

यह एक ऐसा यंत्र है जो हवा को अंदर खींचता है और हमें आवश्यकतानुसार ऑक्सीजन देता है। हमने लोगों को एक-एक सांस के लिए तरसते देखा है और हम इसकी कीमत का अनुभव कर चुके हैं। अतः हमें विश्व पर्यावरण दिवस के इस अवसर पर इन चीजों को याद रखने की आवश्यकता है। प्रकृति से हमें जो ऑक्सीजन मिलती है, वह हरित आवरण को बढ़ाने और हवा, यानि हमारी हर एक सांस को प्रदूषित न करने पर आधारित है। यह एक ऐसी चीज है जिसके बारे में हम बात तो अवश्य करते हैं लेकिन कोई ठोस कदम नहीं उठाते।

हर साल 5 जून को मनाए जाने वाले इस वर्ष के विश्व पर्यावरण दिवस का विषय पारिस्थितिकी तंत्र की मरम्मत है। वृक्षों के घनत्व में वृद्धि और पारिस्थितिकी तंत्र की देखभाल के फलस्वरूप हमारी धरती कार्बन डाईऑक्साइड को अलग करके ऑक्सीजन रिलीज करने में सफल हो पाएगी। यह गैस हमारे वातावरण को लगातार भरे जा रही है और जलवायु परिवर्तन की समस्या को भयावह बना रही है। हमें यह समझने की जरूरत है कि पेड़ लगाने या पारिस्थितिक तंत्र को बहाल करने के लिए हमें पहले प्रकृति और समाज के साथ अपने संबंधों को बहाल करना होगा। तथ्य यह है कि पेड़ मुख्यतः भूमि पर आधारित होते हैं। कौन इसका मालिक है? कौन इसकी रक्षा करता है और कौन उसे पुनर्जीवित करता है? उपज पर अधिकार किसका होता है यह भी एक महत्वपूर्ण पहलू है। भारत में, वन विभाग के पास सामान्य वन भूमि के विशाल क्षेत्रों का “स्वामित्व” है। लेकिन भारत जैसे देशों में “जंगल” नहीं है।

इसके बजाय, हमारे पास ऐसे आवास हैं जहां लोग जंगलों में जंगली जानवरों के साथ रहते हैं। ये वही वन जिले हैं जिन्हें सबसे पिछड़े और सबसे गरीब के रूप में वर्गीकृत किया गया है। यह भी सच है कि तमाम कानूनी एवं प्रशासनिक और कभी-कभी बाहुबल का इस्तेमाल करते हुए हमारे देश का वन विभाग ग्रीन कवर को बरकरार रखने में कुछ हद तक सक्षम रहा है। यह विभाग लोगों और उनके जानवरों को जंगलों से बाहर रखने के लिए हर दिन कड़ी मेहनत करता है। निचले पायदान पर आने वाले संतरियों से लेकर शीर्ष नौकरशाहों के बीच फाइलों के आदान-प्रदान की गति को धीमा करके खदानों एवं बांधों जैसी “विकास परियोजनाओं” के लिए पेड़ों की कटाई को भी यह विभाग भरसक रोकता है ।

वृक्ष लगाने के लिए इसके प्रबंधन का स्वामित्व लेने की आवश्यकता होती है ताकि पौधों को नुकसान न पहुंचे। इससे भी महत्वपूर्ण बात यह है कि पेड़ों का एक मूल्य होता है, चाहे उनकी पारिस्थितिकी तंत्र सेवाओं के लिए या लकड़ी के लिए जिसका उत्पादक को भुगतान करने की आवश्यकता होती है। यह एक वृक्ष आधारित नवीकरणीय भविष्य की तैयारी होगी, जहां लकड़ी का उपयोग घर बनाने और ऊर्जा पैदा करने के लिए किया जा सकता है। यह एक सदाबहार क्रांति होगी जो गरीबों के हाथ में पैसे देने के साथ-साथ आजीविका एवं ऊर्जा सुरक्षा सुनिश्चित करके जलवायु परिवर्तन का मुकाबला करेगी। आज पूरी दुनिया प्रकृति आधारित समाधानों के बारे में बात कर रही है, जिनका मैंने ऊपर वर्णन भी किया है लेकिन यह गरीब समुदाय को समाधान के केंद्र में रखे बिना किया जा रहा है।

इसका कारण समझना मुश्किल नहीं है। यह लैन्ड टेन्यर की राजनीतिक अर्थव्यवस्था के बारे में है, सबसे बेजुबान और हाशिए पर खड़े लोगों की ताकत और इंसानों की कीमत पर वनों की रक्षा के बारे में भी। इस योजना में भूमि और श्रम के मूल्य का भुगतान हवा से कार्बन डाईऑक्साइड को कम करने के सबसे सस्ते विकल्पों के संदर्भ में नहीं बल्कि उस आजीविका के संदर्भ में किया जाना चाहिए जो यह समाधान प्रदान करेगा। इससे सस्ते कार्बन ऑफसेट खरीदने का पूरा विचार अव्यवहारिक हो जाएगा। इसके अलावा एक और चुनौती जो है वह यह है कि हम हर सांस के साथ ऑक्सीजन न लेकर जहर खींच रहे हैं। हम हर साल इस पर चर्चा करते हैं जब सर्दी आती है और प्रदूषण भारी हवा और नमी की वजह से वातावरण में फंस जाता है। तब हमें इसकी भयवाहता महसूस होती है।

हम हताशा में चिल्लाते हैं। लेकिन फिर हम भूल जाते हैं। इसलिए,जैसे ही इस साल सर्दी समाप्त हुई, भारत सरकार ने कोयला आधारित ताप विद्युत संयंत्रों के नियम बदल दिए, जिससे उन्हें प्रदूषण फैलाने में असुविधा न हो। सीधे शब्दों में कहें तो आप गैर-अनुपालन के लिए भुगतान कर सकते हैं और यह जुर्माना प्रदूषण नियंत्रण उपकरणों पर आपके द्वारा किए जाने वाले खर्च से कम होगा। बिजली कंपनियों के लिए ऑक्सीजन और बाकी लोगों के लिए दमघोंटू सांसें, नियम कुछ ऐसे ही हैं।

हमारे ऑक्सीजन को एक सिलेंडर में या एक ऑक्सीजन कंसंट्रेटर मशीन द्वारा सुरक्षित नहीं किया जा सकता है। मुझे संदेह है कि हर अमीर भारतीय अब इसे खरीदेगा और रखेगा। इसे एयर प्यूरीफायर से भी सुरक्षित नहीं किया जा सकता है जिसे हमने पहले ही अपने घरों और कार्यालयों में खरीदा और स्थापित किया है। इसके बजाय, ऑक्सीजन को हमें इसे अपनी दुनिया की सबसे जरूरी और महत्वपूर्ण जीवन-समर्थन प्रणाली के रूप में महत्व देना चाहिए।

इसलिए, इस विश्व पर्यावरण दिवस पर जब महामारी के कहर ने हमें क्रोधित और हताश छोड़ दिया है, आइए अब समय बर्बाद करना बंद करें। आज हम पहले से कहीं बेहतर तरीके से जानते हैं कि बात करने से जान नहीं बचती है। हमें इन बातों पर अमल भी करना होगा। हरित और अधिक समावेशी कल के लिए इस लड़ाई में ऑक्सीजन हमारी वैश्विक पीड़ा है। यह हमारे अस्तित्व की लड़ाई है, इससे कम कुछ नहीं।

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