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छत्तीसगढ़ के गारे पेलमा कोयला खदान की पर्यावरणीय मंजूरी अटकी, अडानी समूह के पास है ठेका

पर्यावरण मंत्रालय की एक्सपर्ट अप्रेजल कमेटी ने सुनवाई के दौरान जल, जंगल और ग्रामीण के ऊपर होने वाले दुष्प्रभावों को लेकर शोध की कमी की वजह से मंजूरी को टाल दिया है

By Manish Chandra Mishra

On: Tuesday 17 December 2019
 

 

कोयला खदानों को दी जाने वाली पर्यावरणीय मंजूरी के लिए पर्यावरण मंत्रालय की एक्सपर्ट अप्रेजल कमेटी की बैठक में अडानी समूह द्वारा संचालित गारे पेलमा कोयला खदान को शुरू करने की मंजूरी नहीं मिल पाई। हालांकि, कमेटी ने कंपनी को दोबारा दस्तावेजों के साथ आवेदन करने को कहा है। छत्तीसगढ़ के रायगढ़ जिले के घरघोड़ा तहसील में मौजूद गारे पेलमा का कोयला खदान महाराष्ट्र स्टेट पावर जेनरेशन कंपनी के पास है और इससे कोयला निकालने का काम अडानी ग्रुप के पास है।

डाउन टू अर्थ ने पांच दिसंबर को हुई बैठक के दौरान हुई चर्चा और उसके फैसले की रिपोर्ट का विश्लेषण कर पाया कि विशेषज्ञों ने खदान पर कई गंभीर चिंता जाहिर की है। इस खदान के पास से केलो नदी बहती है और कंपनी का दावा है कि इस नदी पर खनन का कोई असर नहीं होगा, लेकिन इस दावे की पुष्टि के लिए कोई रिपोर्ट सामने न होने की वजह से एक्सपर्ट अप्रेजल कमेटी ने इस दावे को खारिज कर दिया और रिपोर्ट लाने की बात कही। इस प्रोजेक्ट के लिए 2245 परिवारों को यहां से विस्थापित भी करना होगा। विस्थापन के बाद लोगों पर होने वाले सामाजिक प्रभावों की रिपोर्ट भी कंपनी पेश नहीं कर पाई। इस खदान से प्राप्त कोयला चांदपुर थर्मल पावर स्टेशन, कोराडी थर्मल पावर स्टेशन और पार्ली थर्मल पावर स्टेशन तक पहुंचाया जाएगा।

कमेटी के फैसले का स्वागत करते हुए छत्तीसगढ़ के सामाजिक कार्यकर्ता आलोक शुक्ल कहते हैं कि इस खदान का आवंटन रद्द कर दिया जाना चाहिए। आलोक ने आशंका जताई कि खनन शुरू होने से केलो नदी का अस्तित्व खत्म हो जाएगा और प्रदूषित जल से रायगढ़ शहर और तमनार के लोगों का स्वास्थ्य खराब होगा।  

खदान में 77 वर्षों तक चलने वाला कोयले का रिजर्व

जंगल, खेत, जल स्त्रोत और रहवासी इलाके को मिलाकर इस खदान का क्षेत्र 2483.48 हेक्टेयर में फैला हुआ है, जिमें 22 मिट्रिक टन प्रति वर्ष खुले में और 1.6 मिट्रिक टन प्रति वर्ष जमीन के भीतर से कोयला उत्पादन करने की क्षमता है। इस खदान के भीतर तकरीबन 214 हेक्टेयर में जंगल फैला हुआ है और तकरीबन 56 हेक्टेयर में जल का स्त्रोत है। यहां जमीन के भीतर 1059.29 मिट्रिक टन कोयला होने का अनुमान है जिसमें से 655.15 मिट्रिक टन अगले 77 वर्षों तक कोयला निकाला जा सकता है।

न वन्य जीव बचाने की योजना, न स्वास्थ्य का ख्याल

इस प्रोजेक्ट के भीतर 214.869 हेक्टेयर जंगल की जमीन आती है और इसको वन्य गतिविधियों के इतर उपयोग में लाया जाना है। इसके लिए पहले चरण की मंजूरी आवश्यक है जो कि कंपनी के पास अभी नहीं है। इसके अलावा वर्ष 2018 में राष्ट्रीय अनुसूचित जनजाति आयोग ने कुछ शोध को खत्म हो जाने के लिए जन सुनवाई को कुछ समय के लिए टाला था। भारतीय आयुर्विज्ञान अनुसंधान परिषद के द्वारा कोयला खदान के संपर्क में आने वाले इलाके तमनार के लोगों पर इससे पड़ने वाले स्वास्थ्य संबंधी प्रभावों पर एक रिसर्च चल रही है। इसके अलावा जंगली जीव बचाने की योजना भी किसी संबंधित विभाग से पारित नहीं कराई गई है।

आवेदन में सुधारों की जरूरत

एक्सपर्ट अप्रेजल कमेटी ने पाया कि आवेदन को जल्दबाजी में अधूरा ही दिया गया है जिसमें फॉर्म 2 अधूरा होने के साथ गलत भी है। पर्यावरण प्रभाव आकलन भी बैठक में प्रस्तुत दस्तावेजों के मुताबिक नहीं हैं। कमेटी ने कंपनी को यह रिपोर्ट 2006 के नोटिफिकेशन के मुताबिक तैयार करने को कहा है। इसके अलावा जंगल पर काम करने के लिए जरूरी मंजूरी, फॉर्म 2 में पूरी जानकारी, ऊर्जा प्रदान करने वाली कंपनी के साथ हुए करार की प्रति, वन्य प्राणी संरक्षण की जरूरी मंजूरी के साथ कई दस्तावेजों की मांग की है। कमेटी ने पानी के उपयोग और उससे पड़ने वाले प्रभावों पर भी एक विशेषज्ञ कमेटी की राय मांगी है। इसके अलावा भूजन और नदी के पानी के उपयोग के लिए जरूरी मंजरी की मांग भी की है। लोगों को विस्थापित करने के बाद उनके ऊपर होने वाले सामाजिक बदलावों की रिपोर्ट भी इन दस्तावजों में शामिल है। खनन से होने वाले प्रदूषण और केनो नदी पर होने वाले दुष्प्रभावों पर भी कमेटी ने रिपोर्ट मांगी है। इसके अलावा कोयले की ढुलाई के समय होने वाले प्रदूषण की बात भी कमेटी ने प्रमुखता से सामने लाने के लिए कहा।