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अनिल अग्रवाल डायलॉग 2020: कितना भरोसेमंद है भारत में जंगलों का आंकड़ा

राजस्थान के नीमली स्थित अनिल अग्रवाल एनवायरनमेंट ट्रेनिंग इंस्टीट्यूट में चल रहे कार्यक्रम के आखिरी दिन जंगल से संबंधित चर्चा हुई

By Manish Chandra Mishra

On: Tuesday 11 February 2020
 
मैसूर के स्वतंत्र शोधकर्ता एमडी मधुसूदन नीमली में चल रहे अनिल अग्रवाल डायलॉग में बोलते हुए। फोटो: सीएसई
मैसूर के स्वतंत्र शोधकर्ता एमडी मधुसूदन नीमली में चल रहे अनिल अग्रवाल डायलॉग में बोलते हुए। फोटो: सीएसई मैसूर के स्वतंत्र शोधकर्ता एमडी मधुसूदन नीमली में चल रहे अनिल अग्रवाल डायलॉग में बोलते हुए। फोटो: सीएसई

तीन दिवसीय अनिल अग्रवाल डायलॉग 2020 का आखिरी दिन जंगल पर केंद्रित रहा, जिसमें अलग-अलग सत्रों में विशेषज्ञों ने जंगल, जंगली जीव और वहां निवास करने वाले लोगों के जीवन पर चर्चा की। पहले सत्र की शुरुआत में मैसूर के स्वतंत्र शोधकर्ता एमडी मधुसूदन ने भारतीय वन की स्थिति बताने वाले आंकड़ों की विश्वसनीयता पर सवाल उठाते हुए कहा कि जंगल को लेकर जारी आंकड़ों में कई भिन्नताएं हैं और इससे लगता है कि ये आंकड़े सही स्थिति नहीं दिखाते।

उन्होंने उदाहरण देते हुए कहा कि सर्वे की रिपोर्ट में 2,15,000 वर्ग किलोमीटर रिकॉर्डेड वन क्षेत्र में से तकरीबन 67 प्रतिशत क्षेत्र में ही जंगल दिखाया गया है। इससे दिखता है कि लगातार जंगल के क्षेत्र में हरियाली में कमी आ रही है। वह कहते हैं कि जंगल के भीतर दो तिहाई हिस्से में फॉरेस्ट कवर न होना यह दिखाता है कि घने जंगल तेजी से कम हो रहे हैं। जंगल के जो आंकड़े बढ़े हुए दिखते हैं, उनमें जंगल के बाहर का हिस्सा भी शामिल है।

उपग्रह से मिली तस्वीर से जंगल की गणना पर सवाल उठाते हुए वह कहते हैं कि ऐसे कई इलाके हैं जो ऊपर से जंगल की तरह दिखते हैं पर असल में जंगल हैं ही नहीं। उसे वन क्षेत्र की तरह गणना में शामिल करने से जंगल बढ़ने का भ्रम पैदा होता है। इसमें यह महत्वपूर्ण है कि आप जंगल को कैसे पारिभाषित करते हैं।

पर्यावरणविद् और सीएसई की डायरेक्टर सुनीता नायारण ने कहा कि आंकड़ों के साथ दो महत्वपूर्ण बात है कि वे कितने भरोसेमंद और सुलभ हैं। जब भी वन क्षेत्र का आकलन किया जाता है तो उसमें कई बातें छिपाई जाती हैं। बाद में जो अंतिम आंकड़ा सामने आता है, उस पर भरोसा करना मुश्किल होता है। इसी तरह भारत में बाघों की गणना का आंकड़ा है, जिसमें गणना के तरीके को इतना पेचीदा बनाया गया है कि आंकड़ों पर मुश्किल से भरोसा होता है।  

बाघों को चाहिए बड़ा वन क्षेत्र

भारतीय वन्यजीव संस्थान, देहरादून के वैज्ञानिक ‘जी’ कमर कुरैशी ने बाघों की संख्या को लेकर संरक्षित इलाके के कम क्षेत्र में होने को लेकर चिंता जाहिर की। उन्होंने कहा कि भारत में औसतन बाघ के लिए संरक्षित इलाक 200 वर्ग किमोमीटर के आसपास होता है और इतने कम क्षेत्र में किसी इकोलॉजी के काम करने की संभावना कम ही रहती है।

वह कहते हैं कि बाघ के लिए 1400 वर्ग किमोमीटर का इलाका अच्छा होता है और जब बाघ को कम इलाके में अलग-थलग करके रखते हैं तो उनकी संख्या में कमी आने लगती है। उनके रहने के स्थान की गुणवत्ता में प्रभावित होती है। एक और चुनौती के बारे में बताते हुए कुरैशी ने कहा कि बाघ और इंसानों को साथ जंगल में रहने से कई दिक्कतें आ रही है। सरकारों के वन क्षेत्र में रहने वाले लोगों के लिए सुविधाएं भी देनी होती है और साथ-साथ बाघ के संरक्षण के इंतजाम भी करने होते हैं। दोनों काम एक साथ करना काफी मुश्किल होता है।

बाघों की गणना में पारदर्शिता लाने की कोशिश

बाघों की गणना के क्षेत्र में हो रहे तकनीकी सुधार के बारे में कमर कुरैशी बताते हैं कि पहले 20 से 30 प्रतिशत आंकड़ा फैक्ट शीट पर जुटाने की वजह से आगे-पीछे हो जाता था, जिस वजह से पारदर्शिता में कमी आती थी। पारदर्शिता के लिए अब कई भाषाओं में उपलब्ध मोबाइल एप का उपयोग किया जाता है, ताकि आंकड़ों को बिना गड़बड़ी के जुटाया जा सके।