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उत्तराखंड: नए पौधे लगाने के लिए जमीन नहीं, फिर भी कट रहे हैं पेड़

उत्तराखंड में 150 करोड़ रुपए से अधिक लागत की 32 परियोजनाओं पर काम चल रहा है, जिनके लिए बड़ी तादात में पेड़ काटे जा रहे हैं

By Varsha Singh

On: Monday 23 November 2020
 
उत्तराखंड की राजधानी देहरादून से सटे थानो का जंगल। फोटो: वर्षा सिंह
उत्तराखंड की राजधानी देहरादून से सटे थानो का जंगल। फोटो: वर्षा सिंह उत्तराखंड की राजधानी देहरादून से सटे थानो का जंगल। फोटो: वर्षा सिंह

उत्तराखंड में विकास कार्यों के लिए बड़े पैमाने पर पेड़ों की कटाई चल रही है। इसकी जगह पौधरोपण का मरहम लगाया जाता है। ये पौधरोपण कितने सफल होते हैं इसकी कोई मॉनीटरिंग या आधिकारिक जानकारी नहीं है, लेकिन ये जरूर पता है कि विकास के नाम पर उखाड़े जा रहे पेड़ों के बदले नए पौधे लगाने के लिए उत्तराखंड में जगह ही नहीं बची है।

उत्तराखंड में 150 करोड़ से अधिक लागत वाली 32 विकास परियोजनाएं इस समय चल रही हैं। इनमें चारधाम परियोजना, ऋषिकेश-कर्णप्रयाग रेल लाइन परियोजना, जौलीग्रांट एयरपोर्ट विस्तार परियोजना, सड़क-परिवहन और राजमार्ग मंत्रालय की सड़कें चौड़ी करने, डबल लेन करने के प्रोजेक्ट, जलविद्युत परियोजनाएं शामिल हैं। केंद्रीय सांख्यिकी एवं कार्यक्रम क्रियान्वयन मंत्रालय के मुताबिक इन परियोजनाओं की कुल अनुमानित लागत करीब 45,922.43 करोड़ रुपये है।

इन परियोजनाओं में बड़े पैमाने पर वन भूमि का हस्तांतरण और पेड़ों का कटान हो रहा है। अकेले चारधाम परियोजना में 40-50 हजार पेड़ काटे जाने का अनुमान है। ऋषिकेश-कर्णप्रयाग रेल लाइन परियोजना में 63.422 हेक्टेयर वनभूमि का इस्तेमाल किया जा रहा है। देहरादून में जौलीग्रांट एयरपोर्ट विस्तार के लिए थानो क्षेत्र के 87 हेक्टेयर वनभूमि का सीमांकन किया गया है। जिसमें विभिन्न प्रजाति के लगभग 9,745 पेड़ों को काटने की योजना है। थानो रेंज के वन क्षेत्राधिकारी ने बताया कि भूमि स्थानांतरण प्रस्ताव में दोगुनी जमीन पर वृक्षारोपण का प्रस्ताव है। प्रति हेक्टेयर 2,000 पौधे रोपे जाएंगे।

राज्य में नए पौधे लगाने के लिए जमीन नहीं

विकास कार्यों के लिए पेड़ों के काटने की स्थिति में दोगुने से अधिक पौधरोपण का नियम है। उत्तराखंड सरकार इसका दावा भी करती है। मुश्किल ये है कि पौधरोपण होगा कहां?  राज्य में क्षतिपूर्ति के तौर पर किए जाने वाले पौधरोपण के लिए जमीन उपलब्ध ही नहीं है। देहरादून की संस्था सिटीजन फॉर ग्रीन दून के हिमांशु अरोड़ा ने पौधरोपण को लेकर वन विभाग में आरटीआई लगाई। जवाब मिला कि क्षतिपूर्ति पौधरोपण के लिए अभी 9 हजार हेक्टेयर का बैकलॉग चल रहा है। इस बैकलॉग में कुमाऊं क्षेत्र का 4809.70 हेक्टेयर, गढ़वाल जोन का 3648.91 हेक्टेयर और वाइल्ड लाइफ जोन का कुल 635.11 हेक्टेयर शामिल है।

चारधाम परियोजना मामले में सुप्रीम कोर्ट तक गए हिमांशु अरोड़ा कहते हैं “पौधरोपण के नाम पर जंगल में ही पौधे लगा दिए जाते हैं। जब आपने 80 हेक्टेयर वनभूमि ली है तो 80 हेक्टेयर मिलनी भी चाहिए। जब जगह की कमी है तो थानो जैसे जैव विविधता के लिहाज से बेहद समृद्ध जंगल उजाड़ने की कोशिश क्यों की जा रही हैं।” जौलीग्रांट एयरपोर्ट विस्तार के लिए उत्तराखंड सरकार थानो क्षेत्र के जंगल हटाना चाहती है। जिस पर केंद्रीय वन एवं पर्यावरण मंत्रालय ने आपत्ति जतायी। राज्य सरकार केंद्र की आपत्तियों पर जवाब तैयार कर रही है।

हिमांशु अरोड़ा रिस्पना पुनर्जीवन अभियान के लिए रोपे गए 59 लाख पौधों का सवाल भी उठाते हैं। उनमें से ज्यादातर पौधे दम तोड़ चुके हैं। खुद वन विभाग के अधिकारी मानते हैं कि एक हजार पौधे रोपे गए और उसमें से 100 भी जीवित बच जाएं तो ये बड़ी बात है।

उत्तराखंड कैंपा के सीईओ और अपर प्रमुख वन संरक्षक जेएस सुहाग डाउन टु अर्थ को बताते हैं “राज्य में क्षतिपूरक पौधरोपण का बैकलॉग है। हम दूसरे राज्य में पौधरोपण नहीं करते। न ही दूसरे राज्य क्षतिपूर्ति के तौर पर हमारे यहां पौध रोपण करते हैं। चारधाम परियोजना, मेडिकल कॉलेज या अन्य विकास कार्यों के लिए जंगल की जमीन ली गई तो उसके दोगुने क्षेत्र में पौधरोपण का नियम है। लेकिन बैकलॉग के चलते ये अभी नहीं हो पा रहा है। हालांकि सामान्य पौधरोपण का कार्य किया जा रहा है”।

वन विभाग के  मुताबिक राज्य में वर्ष 2014-15 से अब तक वन भूमि के 83898.61 हेक्टेयर क्षेत्र में पौधरोपण किया गया। इसमें कुमाऊं का 36646.31 हेक्टेयर और गढ़वाल का 47252.30 हेक्टेयर शामिल है। इस दौरान 230.88 लाख पौधे रोपे जा चुके हैं।

बागेश्वर के अड़ौली वन पंचायत के अध्यक्ष पूरन सिंह रावल अपने अनुमान से बताते हैं कि वन विभाग के पौधरोपण 80-90 प्रतिशत तक असफल होते हैं। हर वर्ष ही मनरेगा, कैंपा, हरेला जैसे पर्व पर पौधे लगाए जाते हैं। लागत और रखवाली की वजह से ये पौधे जंगल के भीतर नहीं लगाए जाते। अगर जंगल में फलदार पौधे लगाए जाते तो गांवों में जंगली सूअऱों और बंदरों का आतंक नहीं होता।

पिथौरागढ़ के मुनस्यारी तहसील के सरमौली वन पंचायत की सरपंच मल्लिका विर्दी कहती हैं “ किसी जंगल को संरक्षित रखें तो उसकी रि-जनरेटिव कैपेसिटी ही सबसे ज्यादा कारगर साबित होती है। अपने क्षेत्र में मैंने वन विभाग की नर्सरी देखी है लेकिन पौधरोपण का कार्य करते पिछले 25 वर्षों से नहीं देखा। वन पंचायत में हम हर साल ही पौधरोपण करते हैं। पौधों की सीमाबंदी-दीवारबंदी पौधे लगाने से ज्यादा जरूरी है। पूरी देखरेख के बाद हमारे यहां तकरीबन 50 प्रतिशत पौधे सरवाइव करते हैं।”

उत्तराखंड में हर साल पौधरोपण में लाखों रुपए खर्च किए जाते हैं। नासा लैंड कवर और लैंड यूज चेंज प्रोग्राम के तहत हिमाचल के कांगड़ा में की गई एक स्टडी बताती है कि वनभूमि में किए गए पौधरोपण का जंगल के घनत्व पर खास फर्क नहीं पड़ता, बल्कि इसका नकारात्मक असर ही पड़ता है।