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पर्यावरण मुकदमों की डायरी: दिल्ली में वन भूमि अतिक्रमण पर एनजीटी ने अधिकारियों को लगाई लताड़

देश के विभिन्न अदालतों में विचाराधीन पर्यावरण से संबंधित मामलों में क्या कुछ हुआ, यहां पढ़ें-

By Susan Chacko, Dayanidhi

On: Tuesday 10 November 2020
 

9 नवंबर, 2020 को नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (एनजीटी) के जस्टिस आदर्श कुमार गोयल और श्यो कुमार सिंह की दो सदस्यीय पीठ ने कहा कि अधिकारियों द्वारा अतिक्रमण की अनुमति देने और फिर इनके ही द्वारा कानून लागू करने में विवशता जताने से वन कानूनों को निष्फल बनाया जा रहा है। न्यायाधीश याचिकाकर्ता अमरजीत सिंह नलवा द्वारा दायर याचिका की सुनवाई कर रहे थे। याचिका में कहा गया कि एनजीटी के 11 दिसंबर, 2015 के आदेश के बावजूद दक्षिण दिल्ली के कुछ स्थानों पर वन भूमि से अतिक्रमण हटाने में अधिकारी विफल रहे हैं।

दिल्ली के दक्षिण जिले के उपायुक्त, दिल्ली सरकार द्वारा सौंपी गई स्टेटस रिपोर्ट को लेकर इस मामले पर विचार किया गया। स्टेटस रिपोर्ट से पता चला कि लगभग 5000 अतिक्रमण करने वाले और 750-800 अवैध निर्माण के रूप शिविर / झुग्गी झोपड़ी बस्तियां समय-समय पर बनाई गई हैं और लगभग 3000 अतिक्रमणकारी महरौली के दूसरे शिविरों में रह रहे हैं। वन भूमि के बहुत बड़े हिस्से पर अतिक्रमण किया गया है।

एनजीटी ने कहा कि इस तरह के अतिक्रमण को हटाना एक चुनौती है लेकिन "यदि कानून सही से लागू नहीं किए जाते हैं, तो हमारा समाज कानूनविहीन हो जाएगा"। एनजीटी ने निर्देश दिया कि कानून के अनुसार आगे की कार्रवाई की जाए और 31 मार्च, 2021 तक स्टेटस रिपोर्ट सौंपी जाए।

चंद्रपुरा थर्मल पावर स्टेशन में तेल रिसाव

तेल (हाइड्रोकार्बन) उतारने के दौरान झारखंड के चंद्रपुरा थर्मल पावर स्टेशन (सीटीपीएस) में तेल रिसाव के कारण शायद ही कोई पर्यावरणीय क्षति हुई हो। हालांकि तेल के रिसाव (हाइड्रोकार्बन) के वातावरण में मिल जाने पर वाष्पीकरण, रासायनिक ऑक्सीकरण, बायोकेम्यूलेशन, मिट्टी के कणों के द्वारा सोखना और माइक्रोबियल गिरावट जैसे विभिन्न रूपों से गुजरना पड़ता है।

इसके अलावा आसपास के क्षेत्र में जांच करने से पता चलता है कि कृषि क्षेत्र या पौधों को कोई नुकसान नहीं हुआ है। तेल को कम विषाक्त माना जाता है और भले ही यह वनस्पति पर तत्काल प्रभाव नहीं डालता है, दीर्घकालिक प्रभाव का पता लगाने के लिए नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (एनजीटी) के आदेश के अनुपालन में 15 जून 2020 को गठित एक समिति द्वारा सौंपी गई निरीक्षण रिपोर्ट में एक विस्तृत अध्ययन करने की आवश्यकता जताई गई थी।

तेल रिसाव की घटना 15 अक्टूबर, 2019 को हुई थी। हल्दिया के इंडियन ऑयल कॉरपोरेशन (आईओसीएल) के रेल रेक से तेल प्लांट के अंदर पहुंचाया गया था। एक नए उतारने वाली प्रणाली (अनलोडिंग सिस्टम) के माध्यम से सीटीपीएस साइट पर इसे उतारा जा रहा था, इस दौरान कुछ तकनीकी कारणों से प्रणाली में तेल उतारने में काफी समय लग रहा था।

नई प्रणाली के सही से काम न करने के परिणामस्वरूप, इसे बाद में पुरानी प्रणाली के माध्यम से उतारा गया था। इस बदलाव के दौरान, कुछ मात्रा में तेल का रिसाव हुआ, जिसे एक टैंक में एकत्र किया गया और बाद में पंप द्वारा मुख्य भंडारण टैंक में डाला गया। हालांकि जोड़ने वाले ह्यूम पाइप में पड़ी दरार से तेल का रिसाव हुआ और पास के जलनिकास के लिए बनाई गई नालियों (ड्रेनेज सिस्टम) में प्रवेश कर गया। इन नालियों से  बारिश का पानी दामोदर नदी से मिलता है। हालांकि नाला एक तेल को जमा करने वाली प्रणाली से होकर गुजरता है जो उक्त तेल के उतराई प्रणाली और दामोदर नदी के संगम बिंदु के बीच है।

जैसे ही तेल रिसाव का पता चला, मेसर्स सीटीपीएस ने झारखंड राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (जेएसपीसीबी) के अधिकारियों की मौजूदगी में जल निकासी के नालों और नदी से तेल निकालने के लिए आवश्यक उपाय शुरू किए। जेएसपीसीबी के निर्देशानुसार तेल चढाने / उतारने की यह प्रणाली 15 अक्टूबर, 2019 से संचालित नहीं की गई है।

गिरे हुए तेल को जल निकासी नालों और नदी से एकत्र किया गया था और इस तेल को 18 ड्रमों में एक सुरक्षित स्थान पर रखा गया था। तेल के रिसाव को नियंत्रित करने के लिए और तेल को सोखने के लिए फ्लाई ऐश का उपयोग भी किया गया था। इसके बाद इसे कंक्रीट टैंक में रखा गया।

सिजोसा वन रेंज में लकड़ियों की अवैध कटाई और तस्करी

सिजोसा वन रेंज में लकड़ियों की अवैध कटाई कर लकड़ी को असम पहुंचाने के बारे में एनजीटी के समक्ष दायर एक याचिका के जवाब में खेलोंग वन प्रभाग, भालुकपोंग के तत्कालीन प्रभागीय वनाधिकारी द्वारा एक रिपोर्ट प्रस्तुत की गई।

पापुम के जंगल में अवैध रूप से गिरे पेड़ों का पता लगाया गया और सिजोसा वन रेंज के रेंज फॉरेस्ट ऑफिसर ने कहा कि सिजोसा रेंज में असम के साथ अंतर्राज्यीय सीमा है। घने जंगल के कारण पेड़ों की अवैध कटाई का जल्द पता लगाना मुश्किल हो रहा है, इस समस्या से तब तक निजात नहीं मिल सकती जब तक कि इस रेंज के अंदर बीट नहीं बनाए जाते हैं और यहां फॉरेस्टर और डिप्टी रेंजर्स की पोस्टिंग नहीं हो जाती है।