हसदेव अरण्य की रक्षा में उमड़ा देशव्यापी समर्थन

हसदेव अरण्य को बचाने के लिए अब केवल आदिवासी ही नहीं लड़ रहे हैं, बल्कि उन्हें देश के कई हिस्सों से समर्थन मिलने लगा है

By Satyam Shrivastava

On: Wednesday 04 May 2022
 
हसदेव अरण्य की रक्षा के लिए आंदोलन कर रहे आदिवासियों के समर्थन में 4 मई 2022 को देशव्यापी प्रदर्शन किए गए
हसदेव अरण्य की रक्षा के लिए आंदोलन कर रहे आदिवासियों के समर्थन में 4 मई 2022 को देशव्यापी प्रदर्शन किए गए हसदेव अरण्य की रक्षा के लिए आंदोलन कर रहे आदिवासियों के समर्थन में 4 मई 2022 को देशव्यापी प्रदर्शन किए गए

छत्तीसगढ़ में हसदेव अरण्य को बचाने का संघर्ष अब आर-पार की लड़ाई में तब्दील होता जा रहा है। गांव के गांव अब साल्ही गांव बने धरना स्थल पर ही अपना निवास बना चुके हैं। तीन-चार गांवों के बच्चे, युवा, महिलाएं और बुजुर्ग अब उसी स्थान पर रहे हैं और दिन -रात जंगल में घूम घूम कर पहरा दे रहे हैं। उनके समर्थन में 4 मई को देशव्यापी प्रदर्शन किए जा रहे हैं। 

हसदेव अरण्य संघर्ष समिति के अध्यक्ष उमेश्वर सिंह ने बताया कि देश के सभी राज्यों में कम से कम पांच सौ से ज्यादा जगहों पर हसदेव अरण्य के समर्थन में प्रदर्शन किए गए हैं।    

हाल ही में 25 अप्रैल, 2022 को रात के समय चोरी से करीब 300 पेड़ काट दिये जाने की घटना के बाद गांव वालों को अब यह डर सता रहा है कि अगर कहीं उनकी आंखों में झपकी भी आयी तो उनके जंगल काट दिये जाएंगे। इसलिए वे दिन रात धरना दे रहे हैं।

बहरहाल, चोरी से रात में पेड़ काटने की घटना ने राज्य सरकार को नैतिक रूप से ज़रूर फिलहाल बैक फुट पर ला दिया है और उसके बाद से पेड़ों की कटाई पर फिलहाल एक अघोषित रोक लगी है। 

आधी रात को पेड़ों की कटाई को लेकर छत्तीसगढ़ के माननीय उच्च न्यायालय ने भी राज्य सरकार पर तल्ख टिप्पणी की है उसके इस कदम की आलोचना की है। उच्च न्यायालय ने 30 अप्रैल को इस मामले की सुनवाई के दौरान कहा है कि -अगर ज़मीन अधिग्रहण की प्रक्रिया ही गैर-कानूनी साबित हो गयी तब क्या इन कटे हुए पेड़ों को वापिस पुनर्जीवित किया जा सकेगा? आखिर राज्य सरकार को पेड़ काटने की इतनी जल्दबाज़ी क्यों है? 

इसी मामले को लेकर राष्ट्रीय ब्याघ्र संरक्षण प्राधिकरण व राष्ट्रीय वन्य जीव परिषद ने भी राज्य सरकार की भर्तस्ना की है और इस तरह पेड़ काटने को लेकर कड़ी आपत्ति दर्ज़ की है। हसदेव अरण्य मध्य प्रदेश में मौजूद कान्हा टाइगर रिज़र्व और झारखंड में अवस्थित पलामू टाइगर रिज़र्व के बीच का हिस्सा है इन दोनों महत्वपूर्ण अभयारण्यों को जोड़ता है। इसलिए बिना राष्ट्रीय ब्याघ्र संरक्षण प्राधिकरण को भरोसे में लिए और उनकी सहमति लिए जंगलों को नहीं काटा जा सकता।

हसदेव अरण्य का संघर्ष दिनों दिन धार पकड़ रहा है और इसे देशव्यापी समर्थन मिल रहा है। परसा कोयला खदान को अंतिम मंजूरी दिये जाने का आधार संबंधित ग्राम सभाओं के फर्जी प्रस्ताव हैं जिनकी जांच के लिए ग्राम सभाएं लगातार आवाज़ उठातीं आ रही हैं।

इन्हीं फर्जी ग्राम सभाओं की जांच कराने के लिए हसदेव अरण्य के लोगों ने अक्तूबर 2021 में 300 किलोमीटर की पदयात्रा की थी और राज्यपाल व मुख्यमंत्री को ज्ञापन सौंपा था। चूंकि पाँचवीं अनुसूची क्षेत्र के लिए प्रदेश के राज्यपाल को अभिभावक की भूमिका संपी गयी है तो इनका संज्ञान लेते हुए छत्तीसगढ़ की राज्यपाल सुश्री अनुसुईया उइके ने जिला कलेक्टर को जांच के आदेश भी दिये थे। 

तीन गांवो  को प्रत्यक्षत: प्रभावित कर रही इस खदान के खिलाफ ये तीनों गाँव साल्ही, हरिहरपुर और फतेहपुर पुन: ग्रामसभा पारित कर चुकी हैं जिसमें स्पष्ट रूप से यह कहा गया है कि समस्त ग्रामीण और ग्राम सभा इस खदान के खिलाफ हैं और वनधिकार मान्यता कानून, 2006 के तहत प्राप्त अपने जंगल बचाने, उनके प्रबंधन और पुनरुत्पादन के लिए प्रतिबद्ध हैं। इस प्रतिबद्धतता के लिए भी ये ग्राम सभाएं सत्याग्रह कर रही हैं।

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