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गुणों की वजह से खैर के पेड़ों पर वन माफिया की नजर, तेजी से सिमट रहा जंगल

देशभर से आए दिन खैर की लकड़ी तस्करी की खबरें आती रहती हैं। औषधीय गुण, कत्था बनाने और चमड़ा उद्योग में उपयोगिता के लिए मांग तेज होने की वजह से खैर की प्रजाति पर संकट आ गया है

By Manish Chandra Mishra

On: Thursday 23 January 2020
 
फोटो: मनीष कुमार मिश्र
फोटो: मनीष कुमार मिश्र फोटो: मनीष कुमार मिश्र

देशभर में खैर का जंगल तेजी से सिमट रहा है और वन विभाग ने इसे दुर्लभ वृक्ष की श्रेणी में रखा है। राष्ट्रीय वन नीति 1988 में पेड़ों की प्रजातियों को संतुलित रूप से इस्तेमाल में लाने की बात कही गई है जिससे वे खत्म न हों।अंतर्राष्ट्रीय प्रकृति संरक्षण संघ (IUCN) ने वर्ष 2004 में विश्व में तकरीबन 552 पेड़ों की प्रजातियों को खतरे में माना गया जिसमें 45 प्रतिशत पेड़ भारत से थे। इन्हीं में खैर का नाम भी शामिल है। इस पेड़ का इस्तेमाल औषधि बनाने से लेकर पान और पान मसाला में इस्तेमाल होने वाले कत्था, चमड़ा उद्योग में इसे चमकाने के लिए किया जाता है। प्रोटीन की अधिकता के कारण ऊंट और बकरी के चारे के लिए इसकी पत्तियों की काफी मांग है। चारकोल बनाने में भी इस लकड़ी का उपयोग होता है। आयुर्वेद में इसका इस्तेमाल डायरिया, पाइल्स जैसे रोग ठीक करने में होता है। मांग अधिक होने की वजह से खैर के पेड़ों को अवैध रूप से जंगल से काटा जाता है।

तस्करी के मामलों में पुलिस व वन विभाग द्वारा वाइल्ड लाइफ एक्ट 1972 की धारा 50 के अंतर्गत गिरफ्तारी करके कार्रवाई होती है। तस्करों के पकड़े जाने पर तीन वर्ष की सजा व जुर्माने का भी प्रावधान है।

कम हो रहे खैर के जंगल

आए दिन देश के हर कोने से वन विभाग द्वारा ऐसे तस्करों को पकड़ने की खबरें आती है। वन विभाग के सूत्रों के मुताबिक अकेले मध्यप्रदेश मसान पिछले पांच महीनों में 20 हजार खैर के पेड़ काट दिए गए। दूसरे राज्यों से आए दिन तस्करी की खबरें आती रहती है। हालांकि, कितना जंगल कम हुआ है इसका ठोस आंकड़ा वमन विभाग के पास उपलब्ध नहीं है। उत्तरप्रदेश, उत्तराखंड, हरयाणा, पंजाब, छत्तीसगढ़ खैर तस्करी के प्रमुख केंद्र बन रहे हैं।

यह है कानूनी तरीका 

खैर के हरे पेड़ को काटने की सख्त मनाही है। उत्तराखंड में नदियों के किनारे लगे पेड़ जो बाढ़ में बह जाते हैं, उन्हें वन विभाग बेचता है। इसी तरह अन्य स्थानों पर भी वन विभाग खराब हुई पेड़ों को बेचते है, जिससे बाजार में इसकी उपलब्धता के साथ जंगल भी बचाया जा सके। हरयाणा में हर 10 साल में वन विभाग खैर के वयस्क पेड़ काटते हैं और नया पौधा लगा देते हैं। मांग अधिक होने की वजह से वन तस्कर बेहताशा इस पेड़ को काटते हैं। बाजार में लकड़ी की कीमत 5000 से 10 हजार रुपए प्रति क्विंटल तक है। इस तरह एक वयस्क पेड़ से 5 से 7 लाख रुपए तक का फायदा हो जाता है।

पहली बार सामने आया जंगल का आंकड़ा

वन विभाग के मुताबिक किसी जंगल में 25 प्रतिशत से अधिक खैर के पेड़ हों तो उसे खैर का जंगल माना जाता है। लगातार कटाई की वजह सर और नए पेड़ न लगाने की वजह से जंगल लगातार सिमट रहे हैं। हालिया वन सर्वेक्षण में पहली बार खैर के जंगल की गणना भी सामने आई है। सर्वे के मुताबिक देश में सबसे अधिक खैर के जंगल मध्यप्रदेश (1.67%) में मौजूद हैं और सबसे कम हिमाचल प्रदेश (0.01 %) में।

कहां कितना खैर
राज्य- खैर वन का प्रतिशत
असम- 0.08
हिमाचल प्रदेश- 0.01
बिहार-0.06 %
पंजाब- 0.23
पश्चिम बंगाल - 1.18
जम्मू कश्मीर और लद्दाख- 0.12
मध्यप्रदेश- 1.67
राजस्थान- 1.52
असम- 0.08
उत्तराखंड- 0.97
उत्तरप्रदेश- 1.08

(स्त्रोत- वन सर्वेक्षण 2019)